विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ९२२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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परश्वधनखः श्रीमान् मृदङ्गापूरितध्वनिः ॥ १३ ॥ तिष्ठते दानवश्रेष्ठः संयुगे व्याघ्रवद् बली।
देवताओंकी सेनाको अपना ग्रास बनाते हुए उस प्रतापी असुरके बाण ही उसकी दाढ़ थे। तलवार ही उसकी जिह्वा थी। चक्र ही हाथ थे। तना हुआ धनुष ही उसका खुला हुआ मुख था। फरसे उसके नख थे। मृदङ्ग आदि वाद्योंकी ध्वनि ही उसके दहाड़नेकी आवाज थी। इस प्रकार वह बलवान् दानवशिरोमणि असिलोमा उस युद्धस्थलमें व्याघ्रके समान खड़ा था ॥ १२-१३॥
मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कः प्रथितो महान् ॥ १४ ॥ धनुर्विद्युद्गणश्चापो महामेघ इवापरः।
वह दानव दूसरे महामेघके समान प्रतीत होता था। प्रत्यञ्चाकी टंकार ही उसकी गर्जना थी। सुविख्यात बाणोंका महान् समूह ही उसके द्वारा बरसाये जानेवाले जलकी बूँदें थीं तथा उसका धनुष ही इन्द्रधनुष एवं विद्युत्का समुदाय था ॥ १४॥
इष्वस्त्रसागरो घोरो बाहुग्राहो दुरासदः ॥ १५ ॥ कार्मुकोर्मितरङ्गौघो बाणावर्तमहाह्रदः। गदासिमकरो रौद्रो ज्यावेलः शिक्षयोद्धतः ॥ १६ ॥ पदातिमीनः सुमहान् गर्जितोत्कृष्टघोषवान्।
जिसमें बाण आदि अस्त्रोंका प्रयोग होता था, वह संग्राम एक भयङ्कर समुद्रके समान था। उसकी भुजाएँ ही उसमें ग्राह थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। धनुष ही उस सागरकी छोटी-बड़ी लहरोंका समुदाय था। बाणोंका जो आवर्तन है, वही भँवरोंसे युक्त महान् ह्रद था। गदा और तलवार उसमें मगरके समान थीं। वह देखनेमें रौद्र प्रतीत होता था। धनुषकी प्रत्यञ्चा ही उस समुद्रकी वेला (तटभूमि) थी। शिक्षारूपी वायुके वेगसे उसमें ज्वार-सा उठता था। पैदल सैनिक उस सागरके मत्स्य थे। वह महान् रणसागर योद्धाओंके गर्जने और चीखने-चिल्लानेके गम्भीर घोषसे परिपूर्ण था ॥ १५-१६॥
हयान् गजान् पदातींश्च रथांश्च सहसा वहून् ॥ १७ ॥ न्यमज्जयत समरे परवीरान् महारथान्। आप्लावयत् स देवौघान् दारुणो दानवेश्वरः ॥ १८ ॥
उस दारुण दानवराज असिलोमाने शत्रुपक्षके महारथी वीरों, घोड़ों, हाथियों, पैदलों और बहुसंख्यक रथोंको तथा कितने ही देवताओंको भी सहसा उस समरसागरमें निमज्जित एवं आप्लावित कर दिया ॥ १७-१८ ॥
प्रावर्तत युधि श्रीमान् युधि श्रेष्ठो युधि स्थिरः। अपश्यंस्त्रिदशाः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभम् ॥ १९ ॥ सन्नद्धं तत्र युध्यन्तं ज्वलन्तमिव पावकम्। संलग्न रहा। समस्त देवताओंने देखा—उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। वह कवच धारण करके वहाँ युद्ध करते समय प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था ॥ १९॥
मध्यंदिनगतं सूर्य ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ २० ॥ न शेकुः सर्वभूतानि दानवं प्रसमीक्षितुम्।
वह दानव अपने तेजसे दोपहरके सूर्यकी भाँति देदीप्य-मान हो रहा था। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे कोई भी उसकी ओर आँख उठाकर देख नहीं पाता था ॥ २०॥
यथा प्ररूढं धर्मान्ते दहेत् कक्षं हुताशनः ॥ २१ ॥ तथा सुरचरान् दैत्यो दहति स्म सुतेजसः।
जैसे ग्रीष्मऋतुमें आग बढ़े और सूखे हुए घास-फूसको शीघ्र ही जला देती है, उसी प्रकार वह दैत्य अपने तेजसे उन श्रेष्ठ देवताओंको दग्ध कर रहा था ॥ २१॥
देवानां दानवानां च बलं नर्दति दारुणम् ॥ २२ ॥ विरुद्धमभवत् सर्वमाकुलं च समन्ततः।
देवताओं और दानवोंकी सेनाएँ बड़ी भयंकर गर्जनाएँ कर रही थीं। वे सारी सेनाएँ सब ओरसे परस्पर चढ़ आयीं और आपसमें घोल-मेल हो गयीं ॥ २२ ॥
शूराश्च ते बलोदग्रा हस्त्यश्वरथधूर्गताः ॥ २३ ॥ आर्यां बुद्धिं समास्थाय न त्यजन्ति महार णम्।
वे सभी सैनिक प्रचण्ड बलशाली और शूरवीर थे। हाथी, घोड़े तथा रथोंपर बैठे हुए वे उभय पक्षके वीर श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर उस महासमरका त्याग नहीं करते थे ॥ २३॥
तदुत्पिञ्जलकं युद्धमभवद् रोमहर्षणम् ॥ २४ ॥ देवदानवयोः संख्ये रुधिरास्रावकर्दमम्।
देवता और दानव-जातिका वह युद्ध अमर्यादित तथा रोमाञ्चकारी था। उस युद्धस्थलमें अधिक रक्त बहनेके कारण कीच मच गयी थी ॥ २४॥
न दिशः प्रत्यजानन्त भयग्राहनिपीडिताः। शस्त्रपातांश्च विविधान् दानवानां महारणे ॥ २५ ॥
उस महासमरमें भयरूपी ग्राहसे पीड़ित हुए देवसैनिक न तो दिशाओंको जान पाते थे और न दानवोंके चलाये हुए नाना प्रकारके शस्त्रोंको ही समझ पाते थे ॥ २५ ॥
अन्योन्यं मूढचित्तास्ते निजघ्नुर्व्याकुलीकृताः। स्वान् परान्नाभिजानन्ति विमूढाः शस्त्रपाणयः॥ २६॥
उनके चित्तमें मोह छा गया था। वे व्याकुल होकर हाथमें शस्त्र ले एक दूसरेको मार रहे थे और इतने मूढ़ हो गये थे कि अपने-परायेकी भी पहचान नहीं कर पाते थे ॥
शिरोरुहेषु संगृह्य कश्चिच्छूरस्य संयुगे। शूरश्छिनत्ति मूर्धानं संदष्टौष्ठपुटाननम् ॥ २७॥
कोई शूरवीर युद्धस्थलमें दूसरे शूरवीरके केश पकड़कर
भविष्यपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ १२१
उसका मस्तक काट लेता था। वह मस्तक, जिसका मुख दाँतोतले दबे हुए ओष्ठसे सुशोभित था ॥ २७ ॥
बाहुभिर्मुष्टिभिश्चैव वज्रकल्पैः सुदारुणैः ।
प्रहरन्ति रणे वीरा आत्तशस्त्राः परस्परम् ॥ २८ ॥
हाथोंमें हथियार लिये वीर रणभूमिमें एक दूसरेपर भुजाओं तथा अत्यन्त भयंकर वज्रतुल्य मुक्कोंसे प्रहार करते थे ॥ २८ ॥
योधप्राणहरे रौद्रे स्वर्गद्वारेऽनपावृते ।
संकुले तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ॥ २९ ॥
हयो हयं गजो नागं वीरो वीरं महाहवे ।
अभ्यद्रवज्जिघांसन्तो ह्यसमञ्जसमाहवे ॥ ३० ॥
वह वर्तमान महाभयंकर तुमुल युद्ध उभय पक्षके योद्धाओं-से व्याप्त था। वह रौद्र संग्राम सभी योद्धाओंके प्राण हर लेने-वाला तथा उनके लिये स्वर्गका खुला हुआ द्वार था । उस महासमरमें घुड़सवारने घुड़सवारपर, हाथीसवारने हाथीसवार-पर और पैदल वीरने पैदल वीरपर आक्रमण किया। वे सब-के-सब एक दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे अमर्यादितरूपसे परस्पर टूट पड़े ॥ २९-३० ॥
असुराश्च सुराश्चैव विक्रमाढ्या महारथाः ।
जुहुधुः समरे प्राणान् निजघ्नुश्चेतरेतरम् ॥ ३१ ॥
बल-पराक्रमसे सम्पन्न महारथी देवता और असुर एक दूसरेको मारने और समराग्निमें प्राणोंकी आहुति देने लगे ॥
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः ।
हस्तैः पादैश्च युध्यन्ते दानवास्त्रिदशैः सह ॥ ३२ ॥
जिनके रथ नष्ट हो गये और धनुष कट गये थे, वे कवचरहित दानव केश खोले हुए वहाँ देवताओंके साथ केवल हाथों और पैरोंसे ही युद्ध करते थे ॥ ३२ ॥
हरिस्तु निशितं भल्लं प्रेषयामास संयुगे ।
स तस्य धनुषः कोटिं छित्त्वा भूमावपातयत् ॥ ३३ ॥
इसी समय हरिने युद्धस्थलमें असिलोमापर एक तेज धारवाला भल्ल चलाया । उस भल्लने उसके धनुषकी कोटिका छेदन करके उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ३३ ॥
पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ।
प्राहिणोत् सहसा तस्य दानवेन्द्रस्य संयुगे ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने पुनः रणभूमिमें उस दानवराजको लक्ष्य करके सहसा झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण चलाये ॥ ३४ ॥
तस्य देहे विमुक्तास्ते मारुतेन समीरिताः ।
मग्नार्धकाया विविशुः पन्नगा इव पर्वते ॥ ३५ ॥
उनके छोड़े हुए वे बाण वायुसे प्रेरित हो उस दानवके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे पर्वतमें सर्प घुस जाते हैं। उन सभी बाणोंका आधा-आधा भाग उसके शरीरमें धँस गया था ॥ ३५ ॥
स तैर्निपतितैर्गात्रैः क्षरद्भिरसृगावलीः ।
बभौ दैत्यो महाबाहुर्मेरुर्धातुमिवोत्सृजन् ।
पुनश्चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ॥ ३६ ॥
उन बाणोंकी मार पड़नेसे उसके सारे अङ्गोंसे खूनकी धाराएँ बह चलीं । उस समय वह महाबाहु दैत्य गेरूकी धारा बहानेवाले मेरुगिरिके समान शोभा पाता था । तदनन्तर पुनः उसपर झुकी हुई गाँठवाले सौ बाणोंका प्रहार हुआ ॥
ततोऽसिलोमा संक्रुद्धः प्रगृह्यान्यन्महाधनुः ।
रुक्मपुङ्खांश्च निशितान् प्रेषयामास सायकान् ॥ ३७ ॥
तब असिलोमाको बड़ा क्रोध हुआ। उसने दूसरा विशाल धनुष लेकर हरिपर सोनेके पंखवाले बहुत-से पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ ३७ ॥
तैस्तु मर्मसु विव्याध सर्पानलविषोपमैः ।
गात्रं संछादयामास महाभ्रैरिव पर्वतम् ॥ ३८ ॥
वे बाण सर्प, अग्नि और विषके समान प्राणनाशक थे । उनके द्वारा उसने हरिके मर्मस्थानोंमें आघात किया तथा बड़े-बड़े बादलोंसे पर्वतकी भाँति अपने उन बाणोंसे उनके शरीरको ढक दिया ॥ ३८ ॥
भूयः संधाय च शरं सुमोचान्तकसंनिभम् ।
सुपुङ्खं सूर्यसंकाशं बाणमप्रतिमं रणे ॥ ३९ ॥
इसके बाद उसने पुनः रणभूमिमें सुन्दर पंखयुक्त सूर्य-सदृश तेजस्वी, अनुपम एवं कालके समान भयंकर बाणका संधान करके उसे हरिपर छोड़ दिया ॥ ३९ ॥
तेन बाणप्रहारेण संयुगे भीमकर्मणा ।
मुमोह सहसा देवो भूमौ चापि पपात ह ॥ ४० ॥
भयंकर कर्म करनेवाले उस दानवके उस बाणप्रहारसे युद्धस्थलमें हरिदेवता सहसा मूर्च्छित हो गये और पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४० ॥
ततो हाहाकृतः सर्वै देवै भूतलमाश्रिते ।
जगत् संदेवमाविग्नं यथार्कपतनं तथा ॥ ४१ ॥
हरिदेवके धराशायी होते ही सब लोग हाहाकार करने लगे । देवताओंसहित सारा जगत् उद्विग्न हो उठा, मानो साक्षात् सूर्यदेव आकाशसे पृथ्वीपर टूट गिरे हों ॥ ४१ ॥
परिवारं तु समरे तस्य हत्वा महासुरः ।
एकत्रिंशत्सहस्राणि योधानां दानवोत्तमः ॥ ४२ ॥
हरिको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए जो सैनिक थे, उन सबको मारकर उस दानवराजने समराङ्गणमें देवपक्षके इकतीस हजार योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ ४२ ॥
जयश्रिया सेव्यमानो दीप्यमान इवाचलः ।
प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति ॥ ४३ ॥
विजयश्रीसे सेवित हो दीप्तिमान् पर्वतकी भाँति प्रतीत होनेवाला असिलोमा घोर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया ॥ ४३ ॥
तथैव तु महायुद्धे ससैन्यावश्विनावुभौ ।
९२४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
प्रयुक्तौ सह वृत्रेण बलिना देवतारिणा ॥ ४४ ॥
इसी प्रकार उस महायुद्धमें सेनासहित दोनों अश्विनीकुमार बलवान् देवद्रोही वृत्रासुरके साथ युद्ध कर रहे थे ॥
बाणखड्गधनुष्पाणिः समरे त्यक्तजीवितः ।
आसाद्य सोऽश्विनौ दैत्यः स्थितो गिरिरिवाचलः ॥ ४५ ॥
वृत्रासुरके हाथमें बाण, खड्ग और धनुष थे। वह जीवनका मोह छोड़कर समरभूमिमें आया था। वह दैत्य दोनों अश्विनीकुमारोंके पास पहुँचकर पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा हो गया ॥ ४५ ॥
सतः शङ्खमुपाध्माय द्विषतां लोमहर्षणम् ।
ज्याघोषतलशब्दैश्च सर्वभूतान्यवेजयत् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाले शङ्खको बजाकर धनुषकी प्रत्यञ्चाके टङ्कार-घोषसे उसने सम्पूर्ण प्राणियोंको कम्पित कर दिया ॥ ४६ ॥
ततः संहृष्टरोमाणः शङ्खशब्दं विशुश्रुवुः ।
यक्षराक्षसदेवौघा वृत्रस्यापि च निःस्वनम् ॥ ४७ ॥
उस समय यक्ष, राक्षस और देवताओंके समुदायने रोमाञ्चित शरीरसे उस शङ्खकी ध्वनि और वृत्रासुरकी गर्जना सुनी ॥ ४७ ॥
गदातोमरनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः ।
प्रगृहीता व्यराजन्त यक्षराक्षसबाहुभिः ॥ ४८ ॥
फिर तो यक्षों और राक्षसोंके हाथोंमें गदा, तोमर, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे शोभा पाने लगे ॥ ४८ ॥
तैः प्रयुक्तान् महाकायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ।
भल्लैर्वृत्रः प्रचिच्छेद भीमवेगरवैस्तथा ॥ ४९ ॥
उन महाकाय यक्ष आदिके द्वारा छोड़े गये उन शूल, शक्ति और फरसोंको वृत्रासुरने भयंकर वेग और शब्दवाले भल्लोंसे काट डाला ॥ ४९ ॥
अन्तरिक्षचराणां च भूमिस्यानां च गर्जताम् ।
शरैर्विंन्याध गात्राणि देवानां प्रियदर्शिनाम् ॥ ५० ॥
अन्तरिक्षमें विचरने और पृथ्वीपर खड़े होकर गर्जनेवाले प्रियदर्शी देवताओंके सारे अङ्गोंमें उस दैत्यने अपने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५० ॥
वृत्रासुरभुजोत्सृष्टैर्वहुधा यक्षरक्षसाम् ।
निकृत्तान्येव दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ॥ ५१ ॥
वृत्रासुरकी भुजाओंसे छोड़े गये उन अस्त्रोंद्वारा बहुधा यक्ष और राक्षसोंके शरीर और मस्तक कटे हुए ही देखे जाते थे ॥ ५१ ॥
अथ रक्तमहावृष्टिरभ्यवर्षत मेदिनीम् ।
गदापरिघभिन्नानां देवानां गात्रसम्भवा ॥ ५२ ॥
तदनन्तर पृथ्वीपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी । गदा और परिघसे घायल हुए देवताओंके शरीरसे ही वह रक्तवर्षा हो रही थी ॥ ५२ ॥
प्रच्छादयन्तं बाणौघैर्वृत्रं भीमपराक्रमम् ।
ददृशुः सर्वभूतानि भानुमन्तमिवांशुभिः ॥ ५३ ॥
अपने बाणसमूहोंद्वारा शत्रुओंको आच्छादित करते हुए भयंकर पराक्रमी वृत्रासुरको समस्त प्राणियोंने अपने किरण-जालसे सारे जगत्को ढकनेवाले सूर्यदेवके समान देखा ॥ ५३ ॥
तीक्ष्णरश्मिरिवादित्यः प्रतपन् सर्वदेवताः ।
अविध्यद् बलवान् क्रुद्धः सायकैर्मर्मभेदिभिः ॥ ५४ ॥
प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यके समान सम्पूर्ण देवताओंको ताप देते हुए उस बलवान् दैत्यने कुपित होकर मर्मभेदी सायकोंद्वारा उन सबको घायल कर दिया ॥ ५४ ॥
नदतो विविधान् नादानर्दितस्यापि सायकैः ।
न मोहमसुरेन्द्रस्य ददृशुस्त्रिदशा रणे ॥ ५५ ॥
देवताओंके सायकोंसे पीड़ित होनेपर भी वह नाना प्रकारसे सिंहनाद करता रहा । रणभूमिमें देवताओंने असुरराज वृत्रको कभी मोह या मूर्च्छामें पड़ते नहीं देखा ॥ ५५ ॥
तेऽसिचर्मगदाभिश्च परिघप्रासतोमरैः ।
परश्वधैश्च शैलैश्च प्रववर्षुर्महारथाः ॥ ५६ ॥
वे महारथी देवता उसके ऊपर ढाल, तलवार, गदा, परिघ, प्रास, तोमर, फरसे और शूलोंकी वर्षा करने लगे ॥
ततो वृत्रः सुसंक्रुद्धस्तैस्तदाभ्यर्दितो बली ।
अभ्यवर्षच्छितैर्बाणैस्तान् सर्वान् सत्यविक्रमः ॥ ५७ ॥
उनके द्वारा इस प्रकार पीड़ित होनेपर बलवान् एवं सत्यपराक्रमी वृत्रासुर अत्यन्त कुपित हो उठा । उस समय उसने उन सब लोगोंपर पैने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
तेन वित्रासिता देवा विप्रकीर्णमहायुधाः ।
घोरमर्तस्वरं चक्रुर्वृत्रासुरभयार्दिताः ॥ ५८ ॥
उसके द्वारा आतंकित हुए देवताओंके बड़े-बड़े आयुध हाथसे छूटकर बिखर गये । वृत्रासुरके भयसे पीड़ित हुए वे देवता घोर आर्तनाद करने लगे ॥ ५८ ॥
उत्सृज्य ते गदाशक्तिशूलर्ष्टिपरिघाशनीन् ।
उत्तरां दिशमाजग्मुस्त्रासिता दृढधन्विना ॥ ५९ ॥
सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले उस दैत्यसे त्रास पाकर वे देवता गदा, शक्ति, शूल, ऋष्टि, परिघ और अशनि आदि अस्त्रोंको त्यागकर उत्तर दिशाकी ओर आ गये ॥ ५९ ॥
शूलशक्तिगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः ।
प्रावर्तत रणे वृत्रस्त्रासयानश्चराचरान् ॥ ६० ॥
चौड़ी छातीवाला महाबाहु वृत्रासुर शूल, शक्ति और गदा हाथमें लेकर चराचर प्राणियोंको त्रास देता हुआ युद्धमें प्रवृत्त हुआ था ॥ ६० ॥
तत्रैकस्तु महाबाहुरसिशूलधरः प्रभुः ।
अभ्यधावत दैत्येन्द्रं वृत्रमप्रतिमं रणे ॥ ६१ ॥
उन दोनों अश्विनीकुमारोंमेंसे एक सामर्थ्यशाली महाबाहु नासत्य हाथमें तलवार और त्रिशूल लिये रणक्षेत्रमें अनुपम
भविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२५
वीरता प्रकट करनेवाले दैत्यराज वृत्रासुरकी ओर दौड़े ॥ ६१॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य निर्भिन्नमिव वारणम् ।
वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे विव्याध सुरसत्तमम् ॥ ६२ ॥
मदकी धारा बहानेवाले हाथीके समान सुरश्रेष्ठ नासत्यको आक्रमण करते देख वृत्रासुरने उनके पार्श्वभागमें तीन वत्सदन्त नामक बाणोंका प्रहार किया ॥ ६२ ॥
सोऽपि विद्धो महेष्वासः शरैरमितविक्रमः ।
गदां जग्राह बलवान् गदायुद्धविशारदः ॥ ६३ ॥
तब नासत्यने वृत्रासुरको भी अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया। उनके बाणोंसे विद्ध हो अमित पराक्रमी, महाधनुर्धर, गदायुद्धविशारद, बलवान् वृत्रासुरने गदा हाथमें ले ली ॥ ६३ ॥
तां प्रगृह्य गदां भीमामयःसारमयीं दृढाम् ।
अश्विनं सहसाऽऽगम्य ताडयामास वीर्यवान् ॥ ६४ ॥
लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई उस सुदृढ़ एवं भयंकर गदाको लेकर वह पराक्रमी दैत्य सहसा अश्विनीकुमारके पास आया और आते ही उसने उनपर उस गदाका प्रहार किया ॥ ६४ ॥
दीप्यमानं ततः शूलमश्वी सुविपुलं दृढम् ।
प्रासृजद् वृत्रदैत्याय सहसा रोमहर्षणम् ॥ ६५ ॥
तब अश्वी (नासत्य) ने अत्यन्त विशाल सुदृढ़ दीप्तिमान् और रोमाञ्चकारी शूल लेकर सहसा उसे वृत्रासुरपर दे मारा ॥ ६५ ॥
भङ्क्त्वा शूलं गदाग्रेण गदायुद्धविशारदः ।
अश्विनं सहसाभ्येत्य गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ ६६ ॥
गदायुद्धमें कुशल वृत्रासुर गदाके अग्रभागसे उस शूलके टुकड़े-टुकड़े करके सहसा अश्विनीकुमारके पास आ पहुँचा, मानो गरुड़ सर्पके पास आ गये हों ॥ ६६ ॥
सोऽन्तरिक्षात् समुत्पत्य विधूय महतीं गदाम् ।
नासत्योपरि चिक्षेप गिरिशृङ्गोपमां बली ॥ ६७ ॥
उस बलवान् वीरने अन्तरिक्षसे उछलकर पर्वतशिखरके समान उस विशाल गदाको घुमाकर नासत्यके ऊपर दे मारा ॥ ६७ ॥
गदयाभिहतः सोऽश्वी त्यक्त्वा शूलमनुत्तमम् ।
प्रयातः सहसा तत्र यत्र युध्यति वासवः ॥ ६८ ॥
उस गदासे आहत होकर अश्वी (नासत्य) अपने परम उत्तम शूलको त्यागकर सहसा उस स्थानको भाग गये जहाँ इन्द्र युद्ध कर रहे थे ॥ ६८ ॥
पराजित्य तु संग्रामे अश्विनं भीमविक्रमम् ।
जयश्रिया सेव्यमानो वृत्रो युद्धे व्यवस्थितः ॥ ६९ ॥
भयंकर पराक्रमी अश्वीको युद्धमें पराजित करके विजयलक्ष्मीसे सेवित वृत्रासुर उस समरभूमिमें स्थिरभावसे खड़ा हो गया ॥ ६९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनावतारे देवासुरयुद्धे वृत्रासुरोत्कर्षवर्णने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें वृत्रासुरके उत्कर्षका वर्णनविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
रणाजि और एकचक्रके, मृगव्याध और वलासुरके, अजैकपाद् और राहुके तथा सुधूम्राक्ष एवं केशी दैत्यके युद्धका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
तत्रैव तु महायुद्धे रणाजिर्देवसत्तमः ।
युध्यते सह दैत्येन एकचक्रेण धीमता ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उसी महायुद्धमें देवशिरोमणि रणाजि नामक साध्यदेवता बुद्धिमान् दैत्य एकचक्रके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १ ॥
प्रच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशंश्च महाबलः ।
एकचक्रस्य सैन्यं तच्छरवर्षैरवाकिरत् ॥ २ ॥
महाबली रणाजिने रथके मार्गको आच्छादित करके जोर-जोरसे गर्जना करते हुए एकचक्रकी सेनापर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २ ॥
महासुरा महावीर्या महापट्टिशयोधिनः ।
शूलानि च भुशुण्डीश्च क्षिपन्ति स्म महारणे ॥ ३ ॥
महापराक्रमी और महान् पट्टिशद्वारा युद्ध करनेवाले महान् असुर उस महासमरमें शूलों और भुशुण्डियोंका प्रहार करते थे ॥ ३ ॥
तच्छूलवर्षं सुमहद्गदाशक्तिसमाकुलम् ।
अविशद् दितिजैर्मुक्तं दुर्निवार्यं चराचरैः ॥ ४ ॥
दैत्योंद्वारा की गयी गदा और शक्तियोंसहित शूलोंकी वह बड़ी भारी वर्षा देवसेनामें व्याप्त हो गयी; समस्त चराचर प्राणियोंके लिये उसका निवारण करना कठिन था ॥ ४ ॥
अन्योन्यमभिवर्तन्ते देवासुरगणा युधि ।
महाद्रिशिखराकारा वीर्यवन्तो महाबलाः ॥ ५ ॥
उस युद्धस्थलमें देवता और असुरगण एक दूसरेके सामने खड़े थे; उनके आकार विशाल पर्वतोंके समान थे और वे सभी महाबलवान् तथा पराक्रमी थे ॥ ५ ॥
| ९२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तुरङ्गमाणां तु शतं युक्तं तस्य महारथे ।
महासुरवरस्येव हिरण्यकशिपोर्युधि ॥ ६ ॥
महान् असुरशिरोमणि एकचक्र युद्धमें हिरण्यकशिपुके समान था। उसके विशाल रथमें सौ घोड़े जुते हुए थे ॥ ६ ॥
तेषां चरणपातेन चक्रनेमिस्वनेन च ।
तस्य बाणनिपातैश्च हता वै शतशः सुराः ॥ ७ ॥
उन घोड़ोंकी टापोंके आघातसे, रथके पहियोंकी घरघराहटसे तथा एकचक्रके बाणोंकी मारसे सैकड़ों देवता नष्ट हो गये ॥ ७ ॥
ततः स लघुभिश्चित्रैः शरैः संनतपर्वभिः ।
सायुधानच्छिनत् क्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥
रणाजिने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले शीघ्रगामी विचित्र बाणोंद्वारा, आयुधोंसहित सैकड़ों और हजारों दैत्योंको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ८ ॥
वध्यमानाः शरैस्तीक्ष्णै रथद्विरदवाजिनः ।
गमिताः प्रक्षयं केचित् त्रिदशैर्दानवा रणे ॥ ९ ॥
देवताओंने अपने तीखे बाणोंकी मारसे रथ, हाथी और घोड़ोंसहित कितने ही दानवोंका समराङ्गणमें संहार कर डाला ॥
ततः प्रक्षीयमाणांस्तानुप्रेक्ष्य दितेः सुताः ।
त्यक्त्वा प्राणान् न्यवर्तन्त प्रगृहीतवरायुधाः ॥ १० ॥
उन दानवोंका इस प्रकार विनाश होता देख वे दैत्य हाथोंमें श्रेष्ठ आयुध लिये प्राणोंका मोह छोड़कर वहाँ लौट पड़े ॥ १० ॥
ते दिशो विदिशश्चैव प्रतियुद्धप्रहारिणः ।
अभ्यघ्नन् निशितैः शस्त्रैर्देवान् दितिसुता रणे ॥ ११ ॥
युद्धमें शत्रुाका सामना और शत्रुसेनापर प्रहार करनेवाले उन दैत्योंने रणभूमिमें अपने तीखे शस्त्रोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंमें खड़े हुए देवताओंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ११ ॥
रणाजिर्ज्वलितं घोरं परमं तिग्मतेजसम् ।
मुमोचास्त्रं महाबाहुर्मथनं नाम संयुगे ॥ १२ ॥
यह देख महाबाहु रणाजिने प्रचण्ड तेजवाले अत्यन्त घोर मथन नामक प्रज्वलित अस्त्रका उस युद्धस्थलमें प्रयोग किया ॥ १२ ॥
ततः शस्त्राणि शूलानि निशितानि सहस्रशः ।
अस्त्रवीर्येण महता दितिजः सम्प्रचिच्छिदे ॥ १३ ॥
तदनन्तर उससे निकले हुए सहस्रों तीखे शूल आदि शस्त्रोंको एकचक्र दैत्यने अपने महान् अस्त्रबलसे काट डाला॥
छित्त्वा शूलेन तान् सर्वानैकचक्रो महासुरः ।
अभ्यविध्यत तं साध्यं दशभिर्निशितैः शरैः ॥ १४ ॥
उस महान् असुर एकचक्रने शूलसे उन सब अस्त्रोंको छिन्न-भिन्न करके साध्यदेवता रणाजिको दस पैने बाणोंसे अच्छी तरह घायल किया ॥ १४ ॥
अस्त्रवेगं निहत्यैवं सोऽस्त्रैस्तांस्तनुसैनिकान् ।
ज्वलितैरपरैः शीघ्रैस्तानविध्यत् सहस्रशः ॥ १५ ॥
उस दैत्यने अपने अस्त्रोंसे साध्यदेवताके अस्त्रवेगका इस प्रकार निवारण करके उनके पीछे चलनेवाले सहस्रों सैनिकोंको दूसरे शीघ्रगामी प्रज्वलित अस्त्रोंद्वारा बींध डाला ॥ १५ ॥
तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् ।
प्रावृषीवाम्बुवृष्टीनि शृङ्गाणि धरणीभृताम् ॥ १६ ॥
उन सैनिकोंके छिदे हुए अङ्ग वर्षाकालमें जलकी वृष्टि करनेवाले पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति रक्त बहा रहे थे ॥१६॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्निपतद्भिरजिह्मगैः ।
दितिजैर्वध्यमानास्ते वित्रेसुः सुरसत्तमाः ॥ १७ ॥
जिनका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह था, उन सीधे जानेवाले बाणोंके प्रहारसे दैत्योंद्वारा पीड़ित किये गये वे श्रेष्ठ देवता अत्यन्त भयभीत हो गये ॥ १७ ॥
एकचक्रो रथे तिष्ठन्नपश्यद् गजयूथपान् ।
वराभरणनिर्ह्रादान् समुद्रस्वननिःस्वनान् ॥ १८ ॥
मत्तान् सुविहितान् दृप्तान् महामात्रैरधिष्ठितान् ।
कुलीनान् वीर्यसम्पन्नान् प्रतिद्विरदघातिनः ॥ १९ ॥
शिक्षितान् गजशिक्षायामैरावतसमान् युधि ।
न्यहनत् सुरसैन्यस्य गजान् गज इवासुरः ॥ २० ॥
एकचक्रने रथमें बैठे हुए ही देखा कि देवताओंके गजयूथपति चले आ रहे हैं, उनके श्रेष्ठ आभूषणोंकी झंकार सुनायी पड़ती है। उनके चिग्घाड़नेका शब्द समुद्रकी गर्जनाको लज्जित करता है। वे मतवाले और बलाभिमानी गजराज अच्छी तरह सजाये गये हैं; उनके ऊपर महावत बैठे हैं। वे उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और प्रतिद्वन्द्वी हाथियोंको मार डालनेकी शक्ति रखते हैं। गज-शिक्षामें पूर्णतः शिक्षित हैं तथा युद्धमें ऐरावतके समान पराक्रमी हैं। तब उसने गजासुरके समान देवसेनाके उन हाथियोंको मार डाला ॥ १८–२० ॥
विक्षरन्तो महानागान् भीमवेगांस्त्रिधा मदम् ।
मेघस्तनितनिर्घोषान् महाद्रीनिव चोदितान् ॥ २१ ॥
वे सब विशालकाय हाथी कण्ठ, सूँड और कुम्भस्थल—इन तीन स्थानोंसे मद बहा रहे थे; उनका वेग बड़ा भयंकर था। वे मेघकी गर्जनाके समान चिग्घाड़ते थे और खड़े विशाल पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ २१ ॥
सहस्रसम्मितान् दिव्याञ्जाम्बूनदपरिष्कृतान् ।
सुवर्णजालैर्विततांस्तरुणादित्यवर्चसः ॥ २२ ॥
उन दिव्य हाथियोंकी संख्या लगभग एक सहस्र थी। वे सब-के-सब सुवर्णके अलंकारोंसे विभूषित थे। उनपर सोनेकी
भविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२७
जालियोंसे युक्त झूलें पड़ी हुई थीं तथा वे प्रातःकालके सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देते थे ॥ २२ ॥
एकचक्रो गदापाणिर्बलवान् गदिनां वरः।
उत्सारयामास गजान् महाभ्राणीव मारुतः ॥ २३ ॥
हाथमें गदा लिये गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलवान् एकचक्रने उन समस्त गजराजोंका उसी प्रकार संहार कर डाला, जैसे वायु महान् मेघोंको छिन्न-भिन्न कर देती है ॥ २३ ॥
निहत्य गदया सर्वांस्तान् गजान् गजमर्दनः।
भूयोऽश्वसंघान् स बली निरैक्षत महासुरः ॥ २४ ॥
गजॉंका मर्दन करनेवाले उस महान् बलवान् असुरने अपनी गदाके द्वारा उन समस्त हाथियोंको मौतके घाट उतारकर पुनः अश्वसमूहोंपर दृष्टिपात किया ॥ २४ ॥
शुकवर्णानृष्यवर्णान् मयूरसदृशांस्तथा।
पारावतसवणांश्च हंसवर्णांस्तथैव च ॥ २५ ॥
कुछ घोड़ोंके रंग तोतोंके समान हरे थे; कुछ मृगके समान धूसर वर्णवाले थे। कितने ही घोड़ोंके रंग मोरोंके समान थे; कितने ही कबूतरों और हंसोंके समान वर्णसे विभूषित थे ॥ २५ ॥
मल्लिकाक्षान् विरूपाक्षान् क्रौञ्चवर्णान् मनोजवान्।
अश्वसैन्यं महाबाहुस्तदप्रतिमपौरुषः।
निष्पेदयामास बली गदया भीमविक्रमः ॥ २६ ॥
किन्हींकी आँखें मल्लिकाके समान थीं और किन्हींकी विरूप । कुछ घोड़ोंके वर्ण क्रौञ्च पक्षीके समान थे। वे सभी मनके समान वेगशाली थे। अनुपम पुरुषार्थ और भयंकर पराक्रमसे युक्त बलवान् महाबाहु एकचक्रने पूर्वोक्त अश्वोंकी सेनाको अपनी गदाके आघातसे नष्ट कर दिया ॥ २६ ॥
रणाजिर्व्यस्य समरे सर्वान् दृष्ट्वा सुरद्विपः।
अचिन्त्यविक्रमः श्रीमान् स युद्धाद् विरराम ह ॥ २७ ॥
अचिन्त्यपराक्रमी श्रीमान् रणाजि उस समरमें समस्त देवद्रोहियोंको उपस्थित देख उन सबको त्यागकर युद्धसे विरत हो गये ॥ २७ ॥
गदायुद्धेषु कुशलो रथेन रथयूथपः।
नष्टसैन्यो महाबाहुः प्रस्थितः शक्रसंनिधौ ॥ २८ ॥
गदायुद्धमें कुशल तथा रथ-यूथपति महाबाहु रणाजि, जिनकी सेना प्रायः नष्ट हो गयी थी, रथके द्वारा इन्द्रके समीप चले गये ॥ २८ ॥
त्रिंशच्छतसहस्राणि रथानां विनिहत्य सः।
रणेऽतिष्ठत दैत्येन्द्रो विधूम इव पावकः ॥ २९ ॥
दैत्यराज एकचक्र वहाँ तीस लाख रथियोंका संहार करके रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान स्थित हो गया ॥ २९ ॥
तस्मिन्नेव तु संग्रामे बलो दृप्तो महासुरः।
मृगव्याधं महात्मानं योधयत्यजितं रणे ॥ ३० ॥
उसी युद्धमें महान् असुर बल, जिसे अपने बलपर घमंड था, अपराजित महात्मा मृगव्याध (रुद्र) के साथ युद्ध करने लगा ॥ ३० ॥
मृगव्याधस्य रुद्रस्य महापारिषदस्तथा।
समुत्पेतुर्बलं दृष्ट्वा हुताग्निसमतेजसः ॥ ३१ ॥
मृगव्याध नामक रुद्रदेवके महान् पार्षद घीकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुए अग्निके समान तेजस्वी थे। वे बलको देखते ही वहाँ उछलते-कूदते हुए आ पहुँचे ॥ ३१ ॥
गजैर्मत्तै रथैर्दिव्यैर्वाजिभिश्च महाजवैः।
अस्त्रैश्च निशितैर्बाणैः शरैश्चानलसंनिभैः ॥ ३२ ॥
कुछ पार्षद मतवाले हाथियोंसे, कुछ दिव्य रथोंसे और कुछ महान् वेगशाली घोड़ोंसे आये। वे सब-के-सब अग्निके समान तेजस्वी, तीखे अस्त्र एवं बाणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३२ ॥
ददृशुस्ते ततो वीरा दीप्यमानं महासुरम् ।
रश्मिवन्तमिवोद्यन्तं सुतेजोरश्मिमालिनम् ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् उन वीरोंने उस महान् असुरको उगते हुए सूर्यके समान तेजोमयी किरणमालाओंसे अलंकृत एवं देदीप्यमान देखा ॥ ३३ ॥
संग्रामस्थं महावेगं महासत्त्वं महाबलम्।
महामतिं महोत्साहं महाकायं महारथम् ॥ ३४ ॥
समीक्ष्य तं महायोधं दिक्षु सर्वासववस्थितम् ।
ततः प्रहरजैर्घोरैरभिपेतूः समन्ततः ॥ ३५ ॥
युद्धस्थलमें खड़े हुए उस महान् वेग, महान् सत्त्व, महान् बल, महती बुद्धि, महान् उत्साह और विशाल कायासे सम्पन्न महारथी महायोद्धाको सम्पूर्ण दिशाओंमें अवस्थित देख वे रुद्रपार्षद घोर अस्त्र-शस्त्र लिये चारों ओरसे उसपर टूट पड़े ॥ ३४-३५ ॥
तस्य सर्वांयसास्तीक्ष्णाः शराः पीतमुखाः शिताः।
शिरस्यद्रिप्रतीकाशे मृगव्याधेन पातिताः ॥ ३६ ॥
मृगव्याधने उसके पर्वत-सदृश मस्तकपर पूर्णतः लोहेके बने हुए तीखे और तेज धारवाले बाण बरसाये। जिनके मुख (धार) पर पानी चढ़ाया गया था ॥ ३६ ॥
तैश्च सप्तभिराविद्धः शरैः शिरसि चार्पितैः।
उत्पपात तदा व्योम्नि दिशो दश विनादयन् ॥ ३७॥
मृगव्याधके वे सात बाण उसके सिरमें धँस गये। उन बाणोंसे आविद्ध होकर महान् असुर बल अपने चीत्कारसे दसों दिशाओंको निनादित करता हुआ आकाशमें उड़ गया ॥३७॥
ततस्तं त्रिदशो वीरः सरथः सज्जकार्मुकः।
अनुवव्राज संहृष्टः खे तदा स महाबलः ॥ ३८ ॥
तब उन देववीर महाबली मृगव्याधने रथ और धनुष-सहित बड़े हर्षके साथ आकाशमें उस समय उस दानवका पीछा किया ॥ ३८ ॥
असुरं छादयामास तं व्योम्नि शरवृष्टिभिः।
वृष्टिमानिव जीमूतो निदाघान्ते धराधरम् ॥ ३९ ॥
| ९२८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जैसे वर्षाकालमें पानी बरसानेके लिये उद्यत हुआ मेघ पर्वतको अपनी जलधाराओंसे ढक देता है, उसी प्रकार मृगव्याधने आकाशमें अपने बाणोंकी वर्षासे उस असुरको आच्छादित कर दिया ॥ ३९ ॥
अर्द्यमानस्ततस्तेन मृगव्याधेन दानवः।
चकार निनदं घोरमम्बरे जलदो यथा ॥ ४० ॥
मृगव्याधसे पीड़ित किये जानेपर उस दानवने आकाशमें ही मेघकी भाँति घोर गर्जना की ॥ ४० ॥
स दूरं सहसोत्पत्य मृगव्याधरथं प्रति।
निपपात महावेगः पक्षवातैर्गिरिर्यथा ॥ ४१ ॥
तदनन्तर वह महान् वेगशाली दानव सहसा दूरतक उछलकर मृगव्याधके रथपर पाँखोंकी हवासे युक्त पर्वतकी भाँति कूद पड़ा ॥ ४१ ॥
बभञ्ज च ततो दैत्यो भग्नेषाकूवरं रथम्।
मृगव्याधः परित्यज्य स्थितो भूमौ महाबलः ॥ ४२ ॥
ऐसा करके उस दैत्यने उस रथके ईषादण्ड और कूबरको तोड़ दिया तथा उस रथको भी चौपट कर दिया। महाबली मृगव्याध वह रथ त्यागकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥
विरथं प्रेक्ष्य रुद्रं तु तस्य पारिषदाः शुभाः।
उत्थिता घोररक्ताक्षा व्योम्नि मुद्गरपाणयः ॥ ४३ ॥
रुद्रको रथहीन हुआ देख उनके शुभ पार्षद आकाशमें मुद्गर लिये खड़े हो गये। उनकी भयंकर आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं ॥ ४३ ॥
स तु तैः सहसोत्थाय वेष्टितो विमलेऽम्बरे।
मुद्गरैरर्दितो भीमैर्वृक्षः परशुभिर्यथा ॥ ४४ ॥
उन सबने सहसा ऊपर उठकर निर्मल आकाशमें वलासुरको घेर लिया और जैसे फरसोंसे वृक्ष काटा जाता है, उसी प्रकार भयंकर मुद्गरोंसे उसे पीड़ित करना आरम्भ किया ॥
तेषां वेगवतां वेगं निहत्य स महारथः।
निपपात पुनर्भूभौ सुपर्णसमविक्रमः ॥ ४५ ॥
परंतु वह महारथी बल गरुड़के समान पराक्रमी था। वह उन वेगवानोंका वेग नष्ट करके पुनः पृथ्वीपर कूद पड़ा ॥
स शालवृक्षमुत्पाट्य महाशाखं महाबलः।
सर्वान् पारिषदान् संख्ये सूदयामास दानवः ॥ ४६ ॥
वहाँ विशाल शाखावाले एक शाल वृक्षको उखाड़कर उस महाबली दानवने युद्धस्थलमें उन समस्त पार्षदोंपर उसका प्रहार किया ॥ ४६ ॥
स तैर्विशतदेहस्तु रुधिरौघपरिप्लुतः।
शुशुभे दानवश्रेष्ठो बालसूर्य इवोदितः ॥ ४७ ॥
उन पार्षदोंने बलके शरीरको क्षत-विक्षत कर दिया था, अतः खूनसे लथपथ हुआ दानवशिरोमणि बल उगे हुए बालसूर्यके समान शोभा पाने लगा ॥ ४७ ॥
अथोत्पाट्य गिरेः शृङ्गं समृगव्यालपादपम्।
जघान तान् पारिषदान् समरे दानवेश्वरः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर मृगों, सर्पों और वृक्षोंसहित एक पर्वतशिखरको उखाड़कर दानवराज बलने समराङ्गणमें उन पार्षदोंपर आघात किया ॥ ४८ ॥
ततस्तेषु च भग्नेषु महापारिषदेषु वै।
बलं तदवशेषं तु नाशयामास वीर्यवान् ॥ ४९ ॥
तत्पश्चात् उन महान् पार्षदोंके व्यूह टूट जानेपर उस पराक्रमी असुरने शेष सेनाका नाश कर दिया ॥ ४९ ॥
अश्वैरश्वान् गजैर्नागान् योधान् योधै रथैन् रथैः।
दानवः सूदयामास युगान्तेऽन्तकवत् प्रजाः ॥ ५० ॥
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक यम सारी प्रजाका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस दानवने घोड़ोंसे घोड़ोंको, हाथियोंसे हाथियोंको, पैदल योद्धाओंसे पैदल योद्धाओंको तथा रथोंसे रथोंको नष्ट कर दिया ॥ ५० ॥
हतैरश्वैश्च नागैश्च भग्नाक्षैश्च महारथैः।
त्रिदशैश्चाभवद् भूमी रुद्धमार्गा समन्ततः ॥ ५१ ॥
वहाँ मारे गये घोड़ों, हाथियों, टूटे धुरेवाले विशाल रथों और देवताओंसे वहाँकी भूमिका मार्ग सब ओरसे अवरुद्ध हो गया था ॥ ५१ ॥
एवं बलः स दैत्येन्द्रो मृगव्याधश्च वीर्यवान्।
युधि प्रवृद्धौ बलिनौ प्रभिन्नाविव वारणौ ॥ ५२ ॥
इस प्रकार दैत्यराज बल और पराक्रमी मृगव्याध दोनों बलवान् वीर मदकी धारा बहानेवाले हाथियोंके समान युद्धमें बढ़े-चढ़े थे ॥ ५२ ॥
वैशम्पायन उवाच
तत्रैव युध्यते रुद्रो द्वितीयो राहुणा सह।
विश्रुतस्त्रिषु लोकेषु क्रोधात्मा ह्यज एकपात् ॥ ५३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वहीं तीनो लोकोंमें प्रसिद्ध क्रोधात्मा अजैकपात् नामक द्वितीय रुद्र राहुके साथ युद्ध करते थे ॥ ५३ ॥
तद् यथा सुमहद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।
आसीत् प्रतिभयं रौद्रं वीराणां जयमिच्छताम् ॥ ५४ ॥
विजयकी इच्छा रखनेवाले वीरोंका वह महान् युद्ध तुमुल, रोमाञ्चकारी, भयानक तथा रौद्ररूप था ॥ ५४ ॥
देवदानवदेहैस्तु दुस्तरा केशशाद्वला।
शरीरसंघातवहा प्रसुता लोहितापगा ॥ ५५ ॥
देवताओं और दानवोंके शरीरोंसे वहाँ खूनकी एक दुस्तर नदी बह चली, जो विभिन्न शरीरसमूहोंको बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके केश उसमें घास और सेवारके समान जान पड़ते थे ॥ ५५ ॥
आजघानाथ संक्रुद्धो रुद्रो रौद्राकृतिः प्रभुः।
राहुं शतमुखं युद्धे शत्रुसैन्यनिवारणम् ॥ ५६ ॥
भविष्यपर्व ] अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९२९
प्रभावशाली रुद्रदेवकी आकृति बड़ी ही रौद्र थी। उन्होंने कुपित होकर युद्धमें शत्रुसेनाका निवारण करनेवाले शतमुख राहुपर गहरा आघात किया ॥ ५६ ॥
तस्य काञ्चनचित्राङ्गं रथं साश्वं ससारथिम् ।
जघान समरे श्रीमान् क्रुद्धो दैत्यस्य सायकैः ॥ ५७ ॥
क्रोधमें भरे हुए श्रीमान् रुद्रदेवने समरभूमिमें अपने सायकोंद्वारा उस दैत्यके सुवर्णमय विचित्र अङ्गवाले रथको घोड़ों और सारथिसहित नष्ट कर दिया ॥ ५७ ॥
तस्य पारिषदस्त्वेकः शरशक्त्या महाबलः ।
बिभेद समरे हृष्टो दानवं तं स्तनान्तरे ॥ ५८ ॥
उनके हर्ष और उत्साहमें भरे हुए एक महाबली पार्षदने समरमें बाणोंकी शक्तिसे उस दानवकी छातीमें घाव कर दिया ॥ ५८ ॥
स भिन्नगात्रो रुद्रेण तथा पारिषदैरपि ।
रुद्रस्य रथमायान्तं स राहुर्दानवोत्तमः ॥ ५९ ॥
प्रममाथ तलेनाशु सहसा क्रोधमूर्च्छितः ।
भिन्नगात्रं शरैस्तीक्ष्णैर्मेरुं सूर्य इवांशुभिः ॥ ६० ॥
रुद्र तथा उनके पार्षदोंसे शरीरके क्षत-विक्षत कर दिये जानेपर दानवशिरोमणि राहु सहसा क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने रुद्रदेवके आते हुए रथको शीघ्रतापूर्वक थप्पड़से मारकर चूर-चूर कर डाला। जैसे सूर्य अपनी तीखी किरणोंसे मेरु-पर्वतको संतप्त करते हैं; उसी प्रकार वह दानव घायल अङ्गोंवाले रुद्रदेवको अपने तीखे बाणोंसे पीड़ा देने लगा ॥
हतैर्दानवमुख्यैस्तु रुद्रेणामिततेजसा ।
रुद्रपारिषदान् सर्वान् निजघान महासुरः ॥ ६१ ॥
जब अमिततेजस्वी रुद्रदेवके द्वारा मुख्य-मुख्य दानव मारे गये, तब महान् असुर राहुने रुद्रदेवके समस्त पार्षदोंको भी मारना आरम्भ किया ॥ ६१ ॥
सृजन्तं शरवर्षाणि दानवं घोरदर्शनम् ।
बिभेद समरे रुद्रो बाणैः संततपर्वभिः ॥ ६२ ॥
बाणोंकी वर्षा करते हुए उस घोर दृष्टिवाले दानवको रुद्रदेवने युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ६२ ॥
वर्तमाने महाघोरे संग्रामे लोमहर्षणे ।
रुधिरौघा महावेगा महानद्यः प्रसुस्रुवुः ॥ ६३ ॥
उस रोमाञ्चकारी महाघोर संग्रामके होते समय वहाँ रक्तके प्रवाहसे युक्त महावेगशालिनी बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६३ ॥
दानवं समरे रुद्रो नीलाञ्जनचयोपमम् ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैर्मेरुं सूर्य इवांशुभिः ॥ ६४ ॥
रुद्रदेवने समरभूमिमें काले कोयलेकी राशिके 'समान कान्तिवाले दानव राहुको अपने तीखे बाणोंसे उसी प्रकार क्षत-विक्षत कर दिया, जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे मेरु पर्वतको संतप्त करते हैं ॥ ६४ ॥
हतैर्दानवमुख्यैश्च शक्तिशूलपरश्वधैः ।
पतितैः पर्वताभैश्च दानवैः कामरूपिभिः ॥ ६५ ॥
वर्तमाने महाघोरे संग्रामे लोमहर्षणे ।
विरेजुस्ते तदा दैत्याः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ ६६ ॥
शक्ति, शूल और फरसोंकी मारसे जब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले पर्वताकार मुख्य-मुख्य दानव मरकर धरा-शायी हो गये और वह महाघोर रोमाञ्चकारी संग्राम चालू ही रह गया, तब उसमें घायल हुए दैत्य फूले हुए पलास वृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ६५-६६ ॥
महाभेरीमृदङ्गानां पणवानां च निःस्वनः ।
शङ्खवेणुस्वनोन्मिश्रः सम्बभूवाद्भुतोपमः ॥ ६७ ॥
उस समय महाभेरी, मृदङ्ग तथा पणवोंका गम्भीर नाद जब शङ्ख और वेणुकी ध्वनिसे मिल गया, तब अद्भुत-सा ही प्रतीत होने लगा ॥ ६७ ॥
हतानां स्वनतां तत्र दैत्यानां चापि निःस्वनः ।
देवानां च तथा तत्र शुश्रुवे दारुणो महान् ॥ ६८ ॥
वहाँ आहत होकर आर्तनाद करते हुए दैत्यों तथा देवताओंका अत्यन्त दारुण शब्द सुनायी दे रहा था ॥ ६८ ॥
तुरङ्गमखुरोत्कीर्णं रथनेमिसमुत्थितम् ।
रुरोध मार्गं योधानां चक्षूंषि च धरारजः ॥ ६९ ॥
घोड़ोंके टापों तथा रथके पहियोंसे उठी हुई धरतीकी धूलने वहाँ जूझते हुए योद्धाओंके मार्ग तथा नेत्रोंको अवरुद्ध कर दिया ॥ ६९ ॥
शस्त्रपुष्पोपहारा सा तत्रासीद् युद्धमेदिनी ।
दुर्दशा दुर्विगाह्या च मांसशोणितकर्दमा ॥ ७० ॥
वहाँ रणभूमिको अस्त्र शस्त्ररूपी पुष्पोंका उपहार अर्पित हो रहा था। उसमें मांस और रक्तकी ऐसी कीच जम गयी थी कि उसकी ओर देखना कठिन हो गया था और उसमें प्रवेश करना या चलना-फिरना तो और भी कठिन था ॥७०॥
भग्नैः खड्गैर्गदाभिश्च शक्तितोमरपट्टिशैः ।
अपविद्धैश्च भग्नैश्च रथैः सांग्रामिकैर्हतैः ॥ ७१ ॥
निहतैः कुञ्जरैर्मत्तैस्तथा त्रिदशदानवैः ।
चक्राक्षयुगशङ्खैश्च भग्नैरवनिपातितैः ॥ ७२ ॥
बभूवायोधनं घोरं पिशिताशनसंकुलम् ।
उत्पेतुश्च पयन्ध्वानि दिक्षु सर्वासु संयुगे ॥ ७३ ॥
टूटी हुई तलवारों, गदाओं, शक्ति, तोमर और पट्टिशों, टूटे-फूटे होनेके कारण फेंके गये रथों, नष्ट हुए युद्धसम्बन्धी उपकरणों, मारे गये मतवाले हाथियों तथा देवताओं और दानवों, खण्डित होकर पृथ्वीपर पड़े हुए पहियों, धुरों, जूओं और शंखोंसे भरा हुआ वह भयंकर युद्धक्षेत्र मांसाहारी
मं० १० ४. १७० -
९३० | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे
जन्तुओंसे व्याप्त हो रहा था। उस समराङ्गणमें चारों ओर कबन्ध (बिना सिरके धड़) उछल रहे थे ॥ ७१-७३॥
अन्योन्यबद्धवैराणां दैत्यानां जयगृद्धिनाम्।
सम्पहारस्तथा युद्धे वर्ततेऽतिभयंकरः ॥ ७४ ॥
विजयकी अभिलाषा रखनेवाले देवता और दैत्य परस्पर वैर बाँधकर लड़ते थे। उस युद्धमें एक दूसरेके प्रति होनेवाला उनका प्रहार बड़ा भयंकर था ॥ ७४ ॥
सैन्यानां संप्रयुद्धानां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
अजस्य चैकपादस्य राहोश्चैव महात्मनः ॥ ७५ ॥
तेषां तु तत्र पततां क्रुद्धानामतिनिःस्वनः।
उद्धतं इव भूतानां समुद्राणां तु शुश्रुवे ॥ ७६ ॥
उस युद्धमें सम्मिलित हुए शूरवीर सैनिक पीछे हटनेवाले नहीं थे। महात्मा अजैकपाद तथा महामनस्वी राहुकी भी यही स्थिति थी। वे सब क्रोधमें भरकर जब वहाँ एक दूसरेपर आक्रमण करते थे, उस समय उनका अत्यन्त घोर कोलाहल प्रलयकालमें प्राणियोंके भीषण आर्तनाद तथा समुद्रोंके महान् गर्जनकी भाँति सुनायी पड़ता था ॥७५-७६॥
तत्रैकस्तु सुधूम्राक्षः श्रीमान् रुद्रो मुनीश्वरः।
बिभेद केशिनं शक्त्या गदापरिघशूलभृत् ॥ ७७ ॥
वहाँ एक तेजस्वी रुद्र सुधूम्राक्ष नामसे प्रसिद्ध एवं मुनीश्वर थे। वे शक्तिके साथ ही गदा, परिघ और शूल धारण करते थे। उन्होंने शक्तिके द्वारा केशीको घायल कर दिया ॥ ७७ ॥
नानाप्रहरणा घोरा भीमाक्षा भीमविक्रमाः ।
निष्पेतु रुद्रदयिता महापारिपदास्तथा ॥ ७८ ॥
उस समय नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले, भयानक नेत्रवाले, भयंकर पराक्रमी तथा रुद्रदेवके प्रिय घोर महापार्षद वहाँ आ पहुँचे ॥ ७८ ॥
रथमास्थाय च श्रीमांस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः ।
दानवैः संवृतः केशी युध्यते युद्धदुर्जयः ॥ ७९ ॥
केशी नामक दैत्य तपाये हुए सुवर्णके कुण्डलोंसे अलंकृत और उत्तम शोभासे सम्पन्न था। वह रणदुर्जय दानवोंसे घिरा हुआ रथपर आरूढ़ होकर युद्ध करता था ॥ ७९ ॥
तस्य संग्रामशौण्डस्य संग्रामेषु युयुत्सतः ।
निपेतुरुग्रवीर्यस्य ज्वाला हि प्रस्रुता मुखात् ॥ ८० ॥
वह संग्राममें कुशल और उग्र बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। जिस समय वह युद्धमें प्रवृत्त होता था, उस समय उसके मुखसे ज्वालाएँ प्रकट होकर फैलने लगती थीं ॥ ८० ॥
स तु सिंहर्षभस्कन्धः शार्दूलसमविक्रमः ।
महाजलदसंकाशो मृदङ्गध्वनिनिःस्वनः ॥ ८१ ॥
उसके कंधे सिंह और बैलोंके समान थे। उसका पराक्रम भी सिंहके ही समान था। उसका सिंहनाद महामेघोंकी गम्भीर गर्जना और मृदङ्गोंकी ध्वनिके समान होता था ॥
तस्य निष्पतमानस्य दानवैः संवृतस्य च।
बभूव सुमहानादः क्षोभयंस्त्रिदिवं यथा ॥ ८२॥
दानवोंसे घिरा हुआ वह दैत्य जब युद्धभूमिमें कूदा था, उस समय जो उसका महान् सिंहनाद हुआ, वह स्वर्गलोकको क्षोभमें डालनेवाला था ॥ ८२ ॥
तेन शब्देन वित्रस्ता त्रिदशानां महाचमूः।
द्रुमशैलप्रहरणा योद्धुमेवाभ्यवर्तत ॥ ८३ ॥
उसकी उस गर्जनासे देवताओंकी विशाल सेना संत्रस्त हो उठी तो भी वृक्षों तथा पर्वतखण्डोंका प्रहार करती हुई युद्ध करनेके लिये ही सामने आकर डट गयी ॥ ८३ ॥
तेषां च देवदैत्यानां युयुत्सूनां परस्परम्।
संनिपातः सुतुमुलों रौद्रो लोकभयावहः ॥ ८४ ॥
परस्पर जूझनेकी इच्छावाले देवताओं और दैत्योंका वह घमासान युद्ध बड़ा ही रौद्र तथा जगत्को भय देनेवाला था ॥
तेषां युद्धं महाघोरं संजज्ञे लोमहर्षणम् ।
देवदानवसंघानां प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ॥ ८५ ॥
देवताओं और दानवोंके समुदायोंका वह महाघोर युद्ध प्राणोंका मोह छोड़कर हो रहा था । उस महासमरमें उस युद्धका वह दृश्य बड़ा ही रोमाञ्चकारी था ॥ ८५ ॥
सर्वे ह्यतिबलाः शूराः सर्वे पर्वतसंनिभाः ।
सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे सर्वायुधोद्यताः ।
त्रिदशा दानवाश्चैव परस्परजिघांसवः ॥ ८६ ॥
वे सभी शूरवीर, अत्यन्त बलशाली तथा पर्वतके समान विशालकाय थे। सभी सम्पूर्ण अस्त्रोंके विद्वान् थे और सभी सब प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये उद्यत हुए थे। वे देवता और दानव दोनों ही एक दूसरेके वधकी इच्छा रखते थे ॥ ८६ ॥
तेषां वै नदतां शब्दः संयुगे मेघनिःस्वनः ।
शुश्रुवेऽतिमहाघोरश्चरस्थावरकम्पनः ॥ ८७ ॥
युद्धस्थलमें गर्जना करते हुए उन समस्त योद्धाओंका शब्द महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता था। वह महाघोर शब्द स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाला था ॥ ८७ ॥
रेणुश्चारुणसंकाशो भीमः स समपद्यत ।
उद्धूतो देवदैत्यौघैः संरुरोध दिशो दश ॥ ८८ ॥
देवताओं और दैत्योंके समूहोंद्वारा उड़ायी गयी लाल रंगकी धूल वहाँ सब ओर फैल गयी। वह बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। उसने दसों दिशाओंको अवरुद्ध कर दिया ॥८८॥
अन्योन्यं रजसा तेन कौशेयारुणपाण्डुना ।
संवृता बहुरूपेण ददृशुर्न च किंचन ॥ ८९ ॥
लाल, पीली और सफेद बहुरंगी धूलसे परस्पर आच्छादित हुए सैनिक कोई भी वस्तु नहीं देख पाते थे ॥ ८९ ॥
भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः [ ९३१
न ध्वजो न पताकाश्च न वर्म तुरगोऽपि वा।
आयुधं स्यन्दनो वापि दृश्यते नैव सारथिः॥ ९०॥
उस समय न ध्वजा दिखायी देती थी न पताका, न कवच सूझता था न घोड़ा। अस्त्र-शस्त्र, रथ अथवा सारथि कोई भी दृष्टिगोचर नहीं होता था ॥ ९० ॥
स शब्दस्तुमुलस्तेषामन्योन्यमभिधावताम् ।
श्रूयते तुमुलः शब्दो न रूपाणि चकाशिरे ॥ ९१॥
एक दूसरेके सम्मुख धावा करनेवाले उन योद्धाओंका भयंकर शब्द सब ओर गूँजने लगा। उनका वह तुमुलनाद तो सुनायी देता था, किंतु धूलके कारण किसीके रूप नहीं सूझते थे ॥ ९१ ॥
दानवास्तत्र संक्रुद्धा दानवानेव जघ्निरे।
त्रिदशास्त्रिदशांश्चैव निजघ्नुस्तुमुले तदा ॥ ९२ ॥
वहाँ उस तुमुल युद्धमें क्रोधमें भरे हुए दानव दानवोंपर ही प्रहार कर बैठे तथा देवता देवताओंको ही मारने लगे ॥
ते परांश्च विनिघ्नन्तः स्वांश्च युद्धे महासुरान्।
रुधिरार्द्रां तथा चक्रुर्मेदिनीमसुराः सुराः ॥ ९३ ॥
वे देवता और असुर उस युद्धमें शत्रुपक्षके तथा अपने पक्षके भी बड़े-बड़े देवताओं और असुरोंका संहार करने लगे। उन दोनों पक्षोंके योद्धाओंने पृथ्वीको रक्तसे गीली कर दिया ॥ ९३ ॥
ततस्तु रुधिरौघेण संसिकमुदितं रजः।
शरीरशतसंकीर्णं बभूव धरणीतलम् ॥ ९४ ॥
तदनन्तर वह उड़ती हुई धूल रक्तके प्रवाहसे भी भींग-कर बैठ गयी, वहाँका धरातल सैकड़ों लाशोंसे व्याप्त हो रहा था ॥ ९४ ॥
शूलशक्तिगदाखड्गपरिघप्रासतोमरैः ।
त्रिदशा दानवाश्चैव जघ्नुरन्योन्यमाहवे ॥ ९५ ॥
देवता और दानव युद्धमें परस्पर शूल, शक्ति, गदा, खड्ग, परिघ, प्रास और तोमरोंद्वारा प्रहार करते थे ॥ ९५ ॥
बाहुभिः परिघाकारैर्निघ्नन्तः परिघैस्तथा ।
रुद्रपारिषदान् सर्वान् सूदयन्ति स्म दानवाः ॥ ९६ ॥
परिघतुल्य भुजाओं तथा परिघोंसे प्रहार करनेवाले समस्त रुद्रगणोंपर दानव भी अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा आघात करते थे ॥ ९६ ॥
रुद्रपारिषदाश्चैव महाद्रुममहाश्मभिः ।
व्यदारयन्नतिक्रम्य शस्त्रैश्चादित्यसंनिभैः ॥ ९७ ॥
रुद्रके पार्षद भी बड़े-बड़े वृक्षों, विशाल प्रस्तरखण्डों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी शस्त्रोंद्वारा आगे बढ़कर दानवोंको विदीर्ण करने लगे ॥ ९७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धः केशी दानवसत्तमः।
संग्रामामर्षघोरः सन् स्वान्यनीकानि हर्षयन् ।
तेषां परमसंक्रुद्धो वज्रमस्त्रमुदीरयत् ॥ ९८ ॥
इसी बीचमें कुपित हुआ दानवशिरोमणि केशी संग्राममें अमर्षके कारण घोर रूप धारण करके अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाने लगा। उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन रुद्रपार्षदोंपर वज्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ९८ ॥
वज्रेणास्त्रेण दिव्येन शस्त्रेण च महात्मना ।
महापारिषदाः सर्वे निहता युधि दुर्जयाः ॥ ९९ ॥
उस महामनस्वी दैत्यने दिव्य आयुध वज्रास्त्रके द्वारा समस्त महापार्षदोंको, जो युद्धमें दुर्जय थे, मार गिराया ॥ ९९ ॥
वज्रास्त्रपीडिता भ्रान्ता रुद्रपारिषदा युधि।
विप्रकीर्णद्रुमाः पेतुः शैला वज्रहता इव ॥१००॥
उस युद्धस्थलमें वज्रास्त्रसे पीड़ित हुए रुद्रपार्षद चक्कर काटने लगे और जिनके वृक्ष बिखरकर गिर पड़े थे, वज्रके मारे हुए उन पर्वतोंके समान धराशायी हो गये ॥ १०० ॥
एवं सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
केशिनः सह रुद्रेण तदद्भुतमिवाभवत् ॥१०१॥
इस प्रकार केशीका रुद्रके साथ जो अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, वह अद्भुत-सा प्रतीत होता था ॥ १०१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धेकेशिरुद्रयुद्धकथने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्रामके भीतर केशी और रुद्रके युद्धका वर्णनविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
एकोनषष्टितमोऽध्यायः
वृषपर्वा और निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके तथा प्रह्लाद और कालके घोर युद्धका वर्णन
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! दैत्यराज वृषपर्वाने अरुण-सूर्यके समान कान्तिमान् तथा अद्भुत दिखायी देनेवाले निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके साथ युद्ध किया॥ |
| वृषपर्वा तु दैत्येन्द्रो विश्वमद्भुतदर्शनम्।<br>निष्कुम्भं योधयामास लोहितार्कसमद्युतिम् ॥ १ ॥ |
| ९३२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
क्रोधमूर्च्छितवक्त्रस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम्।
धनूंषि प्रेक्ष्य शत्रूणां सारथिं त्वरितोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
उसकी मुखाकृति क्रोधसे व्याप्त थी। वह अपने उत्तम धनुषको बारंबार खींच रहा था। उसने शत्रुओंके धनुषोंको देखकर तुरंत अपने सारथिसे कहा—॥ २ ॥
अत्रैव तावत् त्वरितं नय मे सारथे रथम्।
एते देवाश्च सहिता घ्नन्ति नः समरे बलम् ॥ ३ ॥
'सारथे! ये देवता एक साथ होकर समरभूमिमें हमारी सेनाका संहार करते हैं, अतः तुम मेरे रथको तुरंत पहले यहीं ले चलो ॥ ३ ॥
एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो रणे।
एतैर्हि दानवानीकं कृतच्छिद्रमिदं महत् ॥ ४ ॥
'समरभूमिमें अपने बल-पौरुषकी प्रशंसा करनेवाले इन देवताओंका मैं युद्धमें वध करना चाहता हूँ; क्योंकि इन्होंने दानवसेनामें यह विशाल छिद्र उत्पन्न कर दिया है' ॥ ४ ॥
ततः प्रजविताश्वेन रथेन रथिनां वरः।
अरीनभ्यहनत् क्रुद्धः शरजालैर्महासुरः ॥ ५ ॥
तदनन्तर वेगशाली घोड़ोंसे युक्त रथके द्वारा वहाँ उपस्थित हो रथियोंमें श्रेष्ठ महान् असुर वृषपर्वाने क्रोधपूर्वक शत्रुओंपर बाणसमूहोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ५ ॥
न स्थातुं देवताः शक्ताः किं पुनर्योद्धुमाहवे।
वृषपर्वपुनिर्मिन्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ॥ ६ ॥
उस समय देवता उस युद्धस्थलमें खड़े भी न रह सके, फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? वृषपर्वाके बाणोंसे विदीर्ण होकर सब-के-सब वहाँसे भाग चले ॥ ६ ॥
तान् मृत्युवशमापन्नान् वैवस्वतवशं गतान्।
समीक्ष्य निहताञ्ज्ञातीनवतस्थे महासुरः ॥ ७ ॥
वहाँ मृत्युके वशमें पड़कर यमराजके अधीन हुए अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको देखकर महान् असुर वृषपर्वा वहीं ठहर गया ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा तं तत्र निष्कुम्भं सर्वे ते त्रिदशोत्तमाः।
समेत्य सहिताः सर्वे द्रुतं तं पर्यवारयन् ॥ ८ ॥
निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवको वहाँ उपस्थित देख वे सभी देवशिरोमणि एकत्र होकर एक साथ वहाँ आये और सब-के सब तुरंत उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ ८ ॥
व्यवस्थितं तु निष्कुम्भं दृष्ट्वा त्रिदशसत्तमम्।
बभूवुर्बलवन्तो वै तस्यास्त्रबलतेजसा ॥ ९ ॥
देवश्रेष्ठ निष्कुम्भको वहाँ डटा हुआ देख उनके अस्त्र-बल और तेजसे सभी देवता सबल हो गये ॥ ९ ॥
वृषपर्वा तु शैलाभं निष्कुम्भं समरे स्थितम्।
महेन्द्र इव धाराभिः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १० ॥
पर्वताकार निष्कुम्भको समराङ्गणमें खड़ा देख वृषपर्वा उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा, ठीक उसी तरह जैसे देवराज इन्द्र जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित करते हैं॥
अचिन्तयित्वा तु शराञ्शरीरे पतितान् बहून्।
स्थितश्च प्रमुखे श्रीमान् ससैन्यः स महाबलः॥ ११ ॥
अपने शरीरपर पड़े हुए उन बहुसंख्यक बाणोंकी कोई परवा न करके महाबली श्रीमान् निष्कुम्भ युद्धके मुहानेपर सेनासहित डटे रहे ॥ ११ ॥
सम्प्रेक्ष्य महातेजा वृषपर्वाणमाहवे।
अभिदुद्राव वेगेन कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ १२ ॥
तस्य त्वाधावमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा।
बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः ॥ १३ ॥
उन महातेजस्वी विश्वेदेवने युद्धक्षेत्रमें हँसकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से बड़े वेगसे वृषपर्वापर आक्रमण किया। धावा करते समय वे तेजसे दीप्तिमान् हो रहे थे। उस समय उनका रूप प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष हो रहा था॥
रथं त्यक्त्वा महातेजाः सक्रोधः समपद्यत।
वृक्षमुत्पाटयामास महातालं महोच्छ्रयम् ॥ १४ ॥
वे महातेजस्वी निष्कुम्भ रथको त्यागकर अत्यन्त कुपित हो उठे; उन्होंने एक बहुत ऊँचे और विशाल तालवृक्षको उखाड़ लिया ॥ १४ ॥
ततश्चिक्षेप तं वृक्षं निष्कुम्भो वृषपर्वणः।
तं गृहीत्वा महावृक्षं पाणिनेकेन दानवः ॥ १५ ॥
विनद्य सुमहानादं भ्रामयित्वा च वीर्यवान्।
सगजान् सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा ॥ १६ ॥
जघान दानवस्तेन शाखिना त्रिदशांस्तदा।
तत्पश्चात् निष्कुम्भने वृषपर्वापर उस वृक्षको दे मारा; किंतु उस पराक्रमी दानवने एक ही हाथसे उस विशाल वृक्षको पकड़कर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और उसे घुमाकर उसके द्वारा सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों एवं बहुत-से देवताओंको मार गिराया ॥ १५-१६ ½ ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धं समरे प्राणहारिणम् ॥ १७ ॥
वृषपर्वाणमासाद्य त्रिदशा विप्रदुद्रुवुः।
समरभूमिमें कुपित हुए प्राणहारी कालके समान वृषपर्वासे पाला पड़नेपर सब देवता भाग खड़े हुए ॥ १७ ½ ॥
तमापतन्तं संक्रुद्धं त्रिदशानां भयावहम् ॥ १८ ॥
आलोक्य धन्वी निष्कुम्भश्चुक्रोध च ननाद च।
देवताओंको भय देनेवाले उस कुपित दानवको आक्रमण करते देख निष्कुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने धनुष लेकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ १८ ½ ॥
स तन्निशितैर्बाणैस्त्रिंशद्भिर्मर्मभेदिभिः ॥ १९ ॥
निर्विभेद महावीर्यो निष्कुम्भो दानवाधिपम्।
उन महापराक्रमी निष्कुम्भने तेज धारवाले तीस मर्मभेदी बाणोंद्वारा दानवराज वृषपर्वाको घायल कर दिया ॥ १९ ½ ॥
शरशक्तिभिरुग्राभिर्दैत्यानामधिपोऽप्यमुम् ॥ २० ॥
भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९१३
विद्धः स रणमध्यस्थो रुधिरं प्रास्रवद् बहु।
तब दैत्यराज वृषपर्वाने भी भयंकर बाणों और शक्तियों-द्वारा निष्कुम्भको घायल कर दिया। घायल होनेपर वे रणभूमिमें खड़े-खड़े बहुत रक्त बहाने लगे ॥ २०½ ॥
उद्विग्ना मुक्तकेशास्ते भग्नदर्पाः पराजिताः ॥ २१ ॥
श्वसन्तो दुद्रुवुः सर्वे भयाद् वै वृषपर्वणः।
फिर तो वृषपर्वाके भयसे उद्विग्न हो केश खोले दर्पहीन एवं पराजित हुए समस्त देवता लंबी साँस खींचते हुए वहाँसे भाग चले ॥ २१½ ॥
अन्योन्यं प्रममन्थुस्ते त्रासिता वृषपर्वणा ॥ २२ ॥
पृष्ठवक्त्राः सुसंविग्नाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः।
त्यक्तप्रहरणाः सर्वे कृतास्ते वृषपर्वणा ॥ २३ ॥
संग्रामे युद्धशौण्डेन तदा निष्कुम्भसैनिकाः।
वृषपर्वासे डराये हुए देवता भागते समय एक दूसरेको कुचल डालते थे और भयभीत हो पीछेकी ओर मुँह फेरकर बारंबार देखते जाते थे। युद्धकुशल वृषपर्वाने उस समय संग्राममें निष्कुम्भके उन सब सैनिकोंको हथियार नीचे डालनेके लिये विवश कर दिया था ॥ २२-२३½ ॥
तत्रैव तु महावीर्यः प्रह्लादः कालमाहवे ॥ २४ ॥
योधयामास रक्ताक्षो हिरण्यकशिपोः सुतः।
उसी युद्धमें लाल नेत्रवाले हिरण्यकशिपुकुमार महापराक्रमी प्रह्लाद कालके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ २४½ ॥
तस्य दानववीरस्य युद्धकाले जयक्रियाः ॥ २५ ॥
चकार त्वरया युक्तो भार्गवो विजयावहाः।
उन दानववीर प्रह्लादके लिये युद्धकालमें विजय दिलानेवाली सारी क्रियाएँ शुक्राचार्यने बड़ी शीघ्रताके साथ सम्पन्न की थीं ॥ २५½ ॥
हुताशनं तर्पयतो ब्राह्मणांश्च नमस्यतः ॥ २६ ॥
आज्यगन्धप्रतिवहो मारुतः सुरभिर्ववौ।
उन्होंने अग्निको घीकी आहुतिसे तृप्त किया और ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया; उस समय उनके होमे हुए घृतकी सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द सुगन्धित वायु चल रही थी ॥
स्रजश्च विविधाश्चित्रा जयार्थमभिमन्त्रिताः ॥ २७ ॥
प्रह्लादस्य शुभे मूर्ध्नयाबबन्धोशनाः स्वयम्।
साक्षात् शुक्राचार्यने प्रह्लादके सुन्दर मस्तकपर विजयके लिये अभिमन्त्रित किये हुए नाना प्रकारके विचित्र पुष्पहार बाँधे थे ॥ २७½ ॥
कालेन सह संग्रामे प्रयुद्धस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
प्रह्लादस्र्यातिवीर्यस्य शान्तिं चक्रे स भार्गवः।
युद्धपरायण, अतिशय पराक्रमी, महात्मा प्रह्लादके कालके साथ होनेवाले संग्राममे भृगुनन्दन शुक्राचार्यने शान्तिकर्मका सम्पादन किया था ॥ २८½ ॥
दश शिष्यसहस्राणि भार्गवस्य महात्मनः ॥ २९ ॥
यानि दानववीराणां जेपुः शान्तिमनुत्तमाम्।
महात्मा शुक्राचार्यके दस हजार शिष्य थे, जो दानववीरोंके लिये परम उत्तम सुख-शान्तिकी प्राप्तिके निमित्त जप करते थे ॥ २९½ ॥
अथर्वाणमथो दिव्यं ब्रह्मसंस्तवचोदितम् ॥ ३० ॥
रणप्रवेशसदृशं कर्म वैजयिकं कृतम्।
उन्होंने दानवोंके लिये अथर्ववेदके अनुसार परमात्माकी स्तुतिसे युक्त और रणप्रवेशके अनुरूप विजयसाधक दिव्यकर्मका भी अनुष्ठान किया था ॥ ३०½ ॥
ततः सर्वास्त्रविदुषः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ ३१ ॥
विद्यया तपसा युक्ताः कृतस्वस्त्ययनक्रियाः।
धनुर्हस्ताः कवचिनो वेगेनाप्लुत्य दानवाः।
बलिमभ्यर्च्य राजानं प्रह्लादं पर्यवारयन् ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले, विद्वान्, तपस्वी, स्वस्तिवाचन आदि माङ्गलिक कृत्यसे सम्पन्न, धनुर्धर तथा कवचधारी दानवोंने बड़े वेगसे उछलकर राजा बलिको सम्मान करते हुए प्रह्लादको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३१-३२ ॥
आस्थाय परमं दिव्यं रथं पररथारुजम्।
नानाप्रहरणाकीर्णं सवज्रमिव पर्वतम् ॥ ३३ ॥
शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमें समर्थ एक परम उत्तम दिव्य रथ नाना प्रकारके आयुधोंसे भरा हुआ था, जो वज्रयुक्त पर्वतके समान जान पड़ता था। प्रह्लाद उसी रथपर आरूढ होकर आये थे ॥ ३३ ॥
तद् बभूव मुहूर्तेन क्ष्वेडितास्फोटिताकुलम्।
मेरोः शिखरमाकीर्णं द्यौरिवाम्बुधरागमे ॥ ३४ ॥
जैसे वर्षाकालमें आकाश मेघोंकी घटासे घिर जाता है, उसी प्रकार मेरु पर्वतका वह शिखर दो ही घड़ीमें दैत्योंके गर्जन-तर्जन तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनिसे व्याप्त हो उठा ॥
स्रजः पद्मपलाश्रानामामुच्य सुविभूषिताः।
बान्धवान् सम्परित्यज्य निपतन्ति रणप्रियाः ॥ ३५ ॥
युद्धप्रेमी दैत्य कमलदलोंकी मालाएँ पहनकर वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति विभूषित हो बन्धु-बान्धवोंको त्यागकर वहाँ टूटे पड़ते थे ॥ ३५ ॥
महायूथधरः श्रीमान्छुभचर्मधरः प्रभुः।
सतनुत्रशिरस्त्राणो धन्वी परमदुर्जयः ॥ ३६ ॥
महान् आयुध, सुन्दर ढाल, कवच और शिरस्त्राण (टोप) धारण करके हाथमें धनुष लिये प्रभावशाली श्रीमान् प्रह्लाद शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्जय हो गये थे ॥ ३६ ॥
सिंहशार्दूलदर्पाणां गदतां किङ्किणीकिनाम्।
दैत्यानां च सहस्राणि प्रयान्त्यग्रे महारणे ॥ ३७ ॥
उनके आगे उस महासमरमे सिंह और व्याघ्रके समान बलाभिमानी तथा कमरमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त करधनी
९३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
बाँधनेवाले सहस्रों दैत्य गर्जना करते हुए चलते थे ॥ ३७ ॥
सैन्यपक्षहितास्तस्य रथाः परमदुर्जयाः ।
सप्ततिर्वै सहस्राणि गजास्तावन्त एव च ॥ ३८ ॥
उनकी सेनामें परम दुर्जय सत्तर हजार रथ थे। हाथियोंकी संख्या भी उतनी ही थी ॥ ३८ ॥
मध्ये व्यूहोदरस्थस्तु कालनेमिर्महासुरः ।
धनुर्विस्फारयन् घोरं ननाद प्रजहास च ॥ ३९ ॥
सेनाके मध्यभागमें जो व्यूहका उदर था, उसमें स्थित हुआ कालनेमि नामक महान् असुर अपने भयंकर धनुषको खींचता हुआ गरजता और अट्टहास करता था ॥ ३९ ॥
तस्मिञ्छतसहस्राणि पुरो यान्ति महाद्युतेः ।
दानवानां बलवतां शक्रप्रतिमतेजसाम् ॥ ४० ॥
उस सैन्यव्यूहमें महातेजस्वी कालनेमिके आगे इन्द्रतुल्य तेजस्वी एक लाख बलवान् दानव चलते थे ॥ ४० ॥
स समं वर्तमानस्तु पक्षाभ्यां विस्तृतो महान् ।
अभवद् दानवव्यूहो दुर्भेद्यः सर्वदैवतैः ॥ ४१ ॥
समभावसे विद्यमान तथा दोनों पक्षोंसे महान् विस्तृत वह दानवव्यूह समस्त देवताओंके लिये दुर्भेद्य हो गया था ॥
षष्टी रथसहस्राणि दानवानां धनुर्भूताम् ।
नानाप्रहरणानां च परिमाणं न विद्यते ॥ ४२ ॥
धनुर्धर दानवोंके साठ हजार रथ वहाँ शोभा पाते थे । नाना प्रकारके आयुधोंकी कोई गणना ही नहीं थी ॥ ४२ ॥
गदापरिघनिस्त्रिंशैः शूलमुद्गरपट्टिशैः ।
प्रगृहीतैर्व्यरराजन्त दानवाः पर्वतोपमाः ॥ ४३ ॥
पर्वताकार दानव अपने हाथोंमें गदा, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्गर और पट्टिश लेकर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥४३॥
गर्जन्तो निनदन्तश्च विक्रोशन्तः पुनः पुनः ।
अयुध्यन्त महावीर्याः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ ४४ ॥
वे गर्जते, सिंहनाद करते और वारंवार चिल्लाते थे । उनका पराक्रम महान् था । वे समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे । अतः उत्साहपूर्वक युद्धमें लगे रहते थे ॥ ४४ ॥
तत्र तूर्यसहस्राणि भेरीशङ्खरवाणि च ।
हयानां च गजानां च गर्जतामतिवेगिनाम् ॥ ४५ ॥
दुन्दुभीनां च निर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः ।
शुश्रुवे शङ्खशब्दश्च पटहानां च निःस्वनः ॥ ४६ ॥
वहाँ सहस्रों तुरहियाँ बजने लगीं, भेरियों और शङ्खोंकी ध्वनि होने लगी । अत्यन्त वेगशाली घोड़ों और हाथियोंके गर्जनका शब्द होने लगा । इन सबके साथ दुन्दुभियोंका गम्भीर घोष मेघगर्जनाके समान जान पड़ता था । शङ्खनाद और पटहोंकी ध्वनि विशेषरूपसे सुनायी पड़ती थी।४५-४६।
तेन शङ्खनिनादेन भेरीतूर्यरवेण च ।
निर्घोषेण रथानां च क्रोशतीव नभस्तलम् ॥ ४७ ॥
उस शङ्खनादसे, भेरी और तुरहीके शब्दसे और रथोंकी घरघराहटसे वहाँका आकाश कोलाहल करता-सा प्रतीत होता था ॥ ४७ ॥
सागरप्रतिमौघेन बलेन महता वृतः ।
प्रह्लादोऽयुध्यत रणे कालान्तकयमोपमः ॥ ४८ ॥
रणभूमिमें उस समुद्रतुल्य विशाल सेनासे घिरे हुए प्रह्लाद काल, अन्तक और यमके समान युद्ध कर रहे थे ॥ ४८ ॥
तस्य नादेन रौद्रेण घोरेणाप्रतिमौजसः ।
विनेदुः सर्वभूतानि त्रैलोक्यनिकृतैः स्वनैः ॥ ४९ ॥
अप्रतिम तेजस्वी प्रह्लादके घोर एवं भयंकर नादसे तथा तीनों लोकोंको तिरस्कृत करनेवाली गर्जनाओंसे भयभीत हो समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे ॥ ४९ ॥
अन्तरिक्षात् पपातोल्का वायुश्च परुषो ववौ ।
वमन्त्यः पावकं घोरं शिवाश्चैव ववाशिरे ॥ ५० ॥
अन्तरिक्षसे उल्कापात होने लगा । प्रचण्ड वायु चलने लगी तथा गीदड़ियाँ घोर आग उगलती हुई क्रन्दन करने लगीं ॥ ५० ॥
प्रह्लादस्तु महावीर्यः प्रहसन् युद्धदुर्मदः ।
उवाच वचनं श्रीमांस्तत्कालक्षममुत्तमम् ॥ ५१ ॥
महापराक्रमी रणदुर्मद श्रीमान् प्रह्लाद वहाँ जोर-जोरसे हँसते हुए उस समयके योग्य यह उत्तम वचन बोले-।५१।
अद्याहं दर्शयिष्यामि स्वबाहुबलमूर्जितम् ।
अद्य मद्वाणनिहतान् देवान् द्रक्ष्यथ संयुगे ॥ ५२ ॥
'वीरो ! आज मैं अपने बढ़े हुए बाहुबलका दर्शन कराऊँगा । आज युद्धस्थलमें तुम सब लोग मेरेद्वारा मारे गये देवताओंको प्रत्यक्ष देखोगे ॥ ५२ ॥
बान्धवा निहता येषां त्रिदशैरिह संयुगे ।
अद्य निर्वर्तयिष्यन्ति शत्रुमांसानि दानवाः ॥ ५३ ॥
'देवताओंने रणभूमिमें जिनके भाई-बन्धुओंका वध किया है, वे दानव आज अपने उन बन्धुओंके उद्देश्यसे शत्रुओंके मांस अर्पित करेंगे ॥ ५३ ॥
इममद्य समुद्भूतं रेणुं समरमूर्धनि ।
अहं तु शमयिष्यामि शत्रुशोणितविस्रवैः ॥ ५४ ॥
'युद्धके मुहानेपर जो यह धूल उड़ रही है, इसे आज मैं शत्रुओंके रक्तका स्रोत बहाकर शान्त करूँगा ॥ ५४ ॥
तिमिरौघहतार्कं तु सैन्यरेण्वरुणीकृतम् ।
आकाशं सम्पतिष्यन्ति खद्योता इव मे शराः ॥ ५५ ॥
'जहाँ अँधेरेके कारण सूर्यका दर्शन नहीं हो रहा है, जो सेनाकी धूलसे अरुण रंगका हो गया है, उस आकाशमें आज मेरे चमकीले बाण जुगुनुओंके समान उड़ेंगे ॥ ५५ ॥
हृष्टाः सम्परिमोदध्वं देवेभ्यस्त्यज्यतां भयम् ।
अद्याहं निहनिष्यामि कालेन्द्रं धनुषा रणे ॥ ५६ ॥
'अब तुमलोग हर्षपूर्वक आनन्द मनाओ। देवताओंसे
भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३५
होनेवाले भयको त्याग दो। आज मैं रणभूमिमें अपने धनुषसे कालके स्वामी यमराजका वध कर डालूँगा ॥ ५६ ॥
तोषयिष्यामि राजानं बलिं बलवतां वरम्।
त्रिदशान् सगणान् हत्वा रणे चान्तकमन्तिकात् ॥ ५७॥
'समरभूमिमें सेवकगणोंसहित देवताओंका और निकटसे यमराजका भी वध करके आज मैं बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलिको भी संतुष्ट करूँगा' ॥ ५७ ॥
अक्षयाः सन्ति मे तूणाः शराश्चाशीविषोपमाः।
स्थातुं मे पुरतः शक्ताः के रणे जीवितेप्सवः ॥ ५८ ॥
'मेरे तरकस अक्षय हैं, उनमें बाणोंकी कभी कमी नहीं होती है तथा मेरे बाण विषधर सर्पोंके समान भयंकर हैं। जो अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाले हैं, ऐसे कौन योद्धा रणभूमिमें मेरे सामने ठहर सकते हैं ? ॥ ५८ ॥
हत्वा रिपुगणांस्तुष्टिरनुरागश्च राजसु।
हतस्य त्रिदिवे वासो नास्ति युद्धसमा गतिः ॥ ५९ ॥
'शत्रुओंका वध करनेसे मनमें संतोष होगा, राजाओंमें अनुराग उत्पन्न होगा और यदि युद्धमें वीर पुरुष स्वयं ही मारा गया तो उसका स्वर्गलोकमें निवास होगा; अतः युद्धके समान दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ५९ ॥
तद् भयं पृष्ठतः कृत्वा रणे दानवसत्तमाः।
निहत्येमानरीन् सर्वान् मोदध्वं नन्दने वने ॥ ६० ॥
'अतः दानवशिरोमणियो ! रणभूमिमें भयको पीछे करके इन समस्त शत्रुओंका वध करो और नन्दनवनमें आनन्द भोगो' ॥ ६० ॥
एवमुक्त्वा महत्सैन्यं प्रह्लादो दानवोत्तमः।
कालसैन्यं महारौद्रं तरसामर्दतासुरः ॥ ६१ ॥
दानवशिरोमणि असुर प्रह्लाद अपनी विशाल सेनाके सैनिकोंसे उपर्युक्त बात कहकर कालकी महाभयंकर सेनाका वेगपूर्वक मर्दन करने लगे ॥ ६१ ॥
सर्वास्त्रविद्वान् वीरश्च नित्यं चाप्यपराजितः।
युद्धे ह्यभिमुखो नित्यं स्वाबाहुबलदर्पितः ॥ ६२ ॥
वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, वीर तथा नित्यविजयी थे। कभी उनकी पराजय नहीं होती थी। उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व था; अतः वे युद्धमें सदा सामने रहकर लड़ते थे ॥ ६२ ॥
षष्टि रथसहस्राणि विविधाSTR धारिणाम् ।
(विविधायुधधारिणाम् ।)
प्रह्लादस्यातिवीर्यस्य ते तस्य तनया निजाः ॥ ६३ ॥
नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले साठ हजार रथी तथा अतिशय वीर्यशाली प्रह्लादके वे पूर्वोक्त औरस पुत्र सभी उस युद्धमें सम्मिलित थे ॥ ६३ ॥
तैस्तु क्रतुशतैरिष्टं विपुलैराप्तदक्षिणैः।
क्षान्ता धर्मपरा नित्यं सत्यव्रतपरायणाः ॥ ६४ ॥
उन सबने पर्याप्त दक्षिणावाले सौ विशाल यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। वे सभी क्षमाशील, धर्मपरायण तथा सदैव सत्यव्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ६४ ॥
दातारः प्रियवक्तारो वक्तारः शास्त्रवस्तुषु।
स्वदारनिरता दान्ता ब्राह्मण्याः सत्यसंगराः ॥ ६५ ॥
दानी, प्रियभाषी, शास्त्रीय विषयोंके वक्ता, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखनेवाले, जितेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ थे ॥ ६५ ॥
यष्टारः क्रतुभिर्नित्यं नित्यं चाध्ययने रताः।
इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे धनुषो दृढविक्रमाः ॥ ६६ ॥
वे सदा यज्ञोंका अनुष्ठान करते और प्रतिदिन वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। सब-के-सब धनुर्वेदमें कुशल तथा वारंवार सुदृढ़ पराक्रमका परिचय देनेवाले थे ॥ ६६ ॥
मत्तवारणविक्रान्ताः शत्रुसैन्यप्रमर्दकाः।
दारयन्तः पदाक्षेपैः सुघोरान् वातरेचकान् ॥ ६७ ॥
उनका पराक्रम मतवाले हाथियोंके समान था। वे शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले थे तथा अपने पैरोंके आघातसे घोर वृक्ष आदिको भी विदीर्ण कर डालते थे ॥ ६७ ॥
युद्धोत्सुकधिया नित्यं क्रोधरञ्जितलोचनाः।
संदष्टौष्ठपुटा दैत्या विनेदुभीमविक्रमाः।
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्यन्योन्यं समहर्षयन् ॥ ६८ ॥
उनकी चित्तवृत्ति सदा युद्धके लिये उत्सुक रहती थी, इसलिये उनकी आँखें क्रोधसे लाल बनी रहती थीं। अपने ओठको दाँतों तले दबाये हुए वे भयंकर पराक्रमी दैत्य वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करते और सिंहनाद तथा ताल ठोंकनेकी आवाजसे एक-दूसरेके हर्ष बढ़ाते थे ॥ ६८ ॥
वेणुशङ्खखरैश्चैव सिंहनादैश्च पुष्कलैः।
आप्लुत्याप्लुत्य सहसा रणे ववुरनेकशः ॥ ६९ ॥
वेणु और शङ्खकी ध्वनि तथा पुष्कल सिंहनादके साथ सहसा उछल-उछलकर वे बहुसंख्यक दैत्य युद्धमें आने और हथियार ग्रहण करने लगे ॥ ६९ ॥
तालमात्राणि चापानि विकृष्य सुमहाबलाः।
अमृष्यमाणाः सहसा दानवाश्चापपाणयः ॥ ७० ॥
सुरासुरैरपराजितं योधयन्ति रणेऽन्तकम्।
वे महाबली दानव हाथमें धनुष लिये अमर्षमें भरे हुए थे। वे तालके बराबर लंबे धनुषोंको खींचकर देवताओं और असुरोंसे भी पराजित न होनेवाले कालके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगे ॥ ७० ॥
प्रतप्तहेमाभरणाः सर्वे ते श्वेतवाससः ॥ ७१ ॥
दानवा मानिनः सर्वे सर्वे स्वर्गमभिकाङ्क्षिणः।
सर्वे जयैषिणो वीराः सर्वे शत्रुवधोद्यताः ॥ ७२ ॥
सभी दानव तपाये हुए सुवर्णके आभूषण पहने हुए थे। सबके अङ्गोंमें श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। सब-के-सब मानी थे और सभी स्वर्गलोककी अभिलाषा रखते थे। शत्रुवधके
९३६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
लिये उद्यत हुए वे सभी वीर अपने पक्षकी विजय चाहते थे॥
शुशुभे सा चमूर्दीप्ता पताकाध्वजमालिनी।
गजाश्वरथसंवाधा स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणी ॥ ७३॥
ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई तथा स्वर्गलोकके मार्गपर जानेकी इच्छा रखनेवाली वह दीप्तिशालिनी दैत्यसेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ ७३॥
ततः कालः सुनिर्यातो भीमो भीमपराक्रमः।
निनदन् सुमहाकायो व्याधिभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ७४॥
तदनन्तर भीषण पराक्रमी भयंकर कालदेवता बहुत-सी व्याधियोंसे घिरे हुए युद्धके लिये निकले। उनकी काया विशाल थी और वे जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे ॥ ७४ ॥
ददर्श महतीं सेनां दानवानां बलीयसाम्।
अभिसंजातदर्पाणां कालं समभिगर्जताम् ॥ ७५ ॥
उन्होंने अपने सामने गर्जते और अभिमानमें भरे हुए महाबली दानवोंकी उस विशाल सेनाको देखा ॥ ७५ ॥
तदायान्तं तदानीकं दानवानां तरस्विनाम्।
प्रतिलोमं चकाराशु व्याधिभिः सहितोऽन्तकः ॥ ७६॥
वेगशाली दानवोंकी उस आती हुई सेनाको व्याधियों-सहित कालने तुरंत प्रतिकूल दिशामें ठेल दिया ॥ ७६ ॥
प्रविश्य ध्वजिनीं चैषां पातयामास दानवान्।
कालो रुधिररक्ताक्षः स्वेनानीकेन संवृतः ॥ ७७॥
तत्पश्चात् अपनी सेनासे घिरे हुए लाल नेत्रवाले कालदेव दानवोंकी सेनामें प्रवेश करके उन्हें धराशायी करने लगे ॥
प्रह्लादबलमत्युग्रं प्रह्लादं च महाबलम्।
आजघान रणे कालो दण्डमुद्गरपट्टिशैः ॥ ७८ ॥
उस युद्धमें कालदेव दण्ड, मुद्गर और पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा महाबली प्रह्लाद तथा उनकी अत्यन्त भयंकर सेनापर घातक प्रहार करने लगे ॥ ७८ ॥
शरशक्त्यसिखड्गांश्च शूलानि मुसलानि च।
गदाश्च परिघांश्चैव विचित्रांश्च परश्वधाः ॥ ७९॥
धनूंषि च विचित्राणि शतघ्नीश्च स्थिरायसीः।
पात्यन्ते व्याधिभिर्युद्धे दानवानां चमूमुखे ॥ ८० ॥
कालके सैनिक व्याधियोंने रणक्षेत्रमें बाण, शक्ति, ऋष्टि, खड्ग, शूल, मुसल, गदा, परिघ, विचित्र फरसे, भाँति-भाँतिके धनुष तथा लोहेकी बनी हुई सुदृढ़ शतघ्नी आदि बहुत-से अस्त्र-शस्त्र दानव-सेनाके ऊपर गिराये ॥ ७९-८० ॥
बहवो व्याधयो युद्धे जघ्नुसुरपुङ्गवान्।
व्याधीनपि च दैत्यौघा निजघ्नुर्बहवो बहून् ॥ ८१॥
उस युद्धमें बहुसंख्यक व्याधियोंने बहुत-से असुरशिरो-मणियाेंका वध किया और बहुत से दैत्यों ने भी बहुसंख्यक व्याधियोंका विनाश कर डाला ॥ ८१ ॥
शूलैः प्रमथिताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः।
परिघैराहताः केचित् केचिच्च परमायुधैः ॥ ८२ ॥
कितने ही योद्धा शूलोंसे मथ डाले गये। कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। कोई परिघोंसे आहत हुए तो कोई दूसरे-दूसरे उत्तम आयुधोंसे ॥ ८२ ॥
केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि।
व्याधयो दानवैरेव नानाशास्त्रैर्विदारिताः ॥ ८३ ॥
किन्हींके खड्गोंद्वारा दो टुकड़े कर दिये गये और वे पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। दानवोंने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा व्याधियोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८३ ॥
ते चापि व्याधिभिः सर्वे विविधैरायुधोत्तमैः।
खड्गैश्च मुसलैस्तीक्ष्णैः प्रासतोमरमुद्गरैः।
भिन्नाश्च दानवाः सर्वे निकृत्ताश्च परश्वधैः ॥ ८४ ॥
व्याधियोंने भी नाना प्रकारके उत्तम आयुधों, खड्गों, तीखी धारवाले मुसलों, प्रास, तोमर और मुद्गरों तथा फरसों-से समस्त दानवोंको छिन्न-भिन्न करके काट डाला ॥ ८४ ॥
मुद्गरैः पट्टिशैश्चैव व्याधिभिश्च महाबलैः।
कृत्वा शस्त्रैरनेकैश्च मुष्टिभिश्च हता भृशम् ॥ ८५ ॥
महाबली व्याधियोंने मुद्गरों, पट्टिशों तथा अनेक प्रकार-के शस्त्रोंद्वारा दैत्योंके टुकड़े-टुकड़े करके बहुतोंको मुक्कोंसे भी मार गिराया ॥ ८५ ॥
वेमुः शोणितमन्योन्यं विष्टब्धदशनेक्षणाः।
आर्तस्वरं च नदतां सिंहनादं च गर्जताम् ॥ ८६ ॥
बभूव तुमुलः शब्दः संग्रामे लोमहर्षणे।
एक-दूसरेके द्वारा दाँतोंके तोड़ दिये जानेपर और आँखोंके फोड़ दिये जानेपर वे सब योद्धा मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उस रोमाञ्चकारी संग्राममें आर्तस्वरसे कराहते और सिंहोंके समान गर्जते हुए योद्धाओंका शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ८६ १/२ ॥
मुष्टिभिश्चोत्तमाङ्गानि तल्लैर्गात्राणि चासकृत् ॥ ८७ ॥
सादितानि महीं जग्मुस्तिष्ठतामेव संयुगे।
युद्धस्थलमें खड़े हुए योद्धाओंके मस्तक तथा दूसरे-दूसरे अङ्ग बारंवार मुक्कों और तमाचोंकी मार पड़नेसे कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ८७ १/२ ॥
अस्रफेना ध्वजावर्ता च्छिन्नबाहुमहोरगा ॥ ८८ ॥
शूलशक्तिमहामत्स्या चापग्राहसमाकुला।
रथेपोपलसम्बाधा ध्वजद्रुमलतावृता ॥ ८९ ॥
सशब्दघोषविस्तारा लोहितोदाभवन्नदी।
उस समय वहाँ भारी कोलाहलके साथ खूनकी विस्तृत नदी बह चली। आँसू ही उसमें फेन थे। ध्वजोंकी भँवर उठ रही थी। कटी हुई बाँहें बड़े-बड़े सर्पोंके समान जान पड़ती थीं। शूल और शक्तिनामक अस्त्र महान् मत्स्य से प्रतीत होते थे। धनुरूपी ग्राहोंसे वह भरी हुई थी। रथोंके ईपादण्ड-रूपी प्रस्तरखण्डोंसे वह नदी व्याप्त थी तथा ध्वजरूपी वृक्षों और लताओंसे आवृत्त दिखायी देती थी ॥ ८८-८९ १/२ ॥
भविष्यपर्व ] एकोनषष्टितमोऽध्यायः ९३७
स्वधनुःशक्रधनुषौ काञ्चनाङ्गदविद्युतौ ॥ ९० ॥
तौ दैत्यकालजलदौ शरधारां व्यमुञ्चताम् ।
दैत्य प्रह्लाद और कालदेवता दोनों मेघके समान होकर बाणरूपी जलकी धारा गिरा रहे थे । दोनोंके अपने धनुष ही इन्द्रधनुषकी प्रतीति कराते थे और उनकी बाँहोंमें जो सोनेके बाजूबंद थे, वे विद्युतके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९० १/२ ॥
तौ महामेघसंकाशौ रथनागगतौ तदा ॥ ९१ ॥
बभूवतुरभिक्रुद्धौ साम्बुगर्भाविवाम्बुदौ ।
क्रमशः रथ और हाथीपर बैठे हुए वे दोनों योद्धा महान् मेघके समान जान पड़ते थे । दोनों ही एक दूसरेके प्रति क्रोधसे भरे हुए थे और सजल जलधरोंके समान शोभा पाते थे ॥ ९१ १/२ ॥
तप्तकाञ्चनसंन्नाहौ दिव्यहारविभूषितौ ॥ ९२ ॥
तौ विरेजतुरायस्तौ सूर्यवैश्वानरोपमौ ।
तपाये हुए सुवर्णमय कवच तथा दिव्य हारोंसे विभूषित वे दोनों विजयके लिये प्रयत्नशील योद्धा सूर्य और अग्निके समान शोभा पाते थे ॥ ९२ १/२ ॥
तौ महाचलसंकाशावन्योन्यस्य चमूमुखे ॥ ९३ ॥
शक्राशनिसमस्पर्शैर्बाणैर्जघ्नतुराहवे ।
महान् पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वे दोनों वीर सेनाके मुहानेपर युद्धस्थलमें एक-दूसरेको इन्द्रके वज्रकी भाँति दुःसह बाणोंद्वारा चोट पहुँचाते थे ॥ ९३ १/२ ॥
परस्परं समासाद्य तयोर्युद्धे दुरासदे ॥ ९४ ॥
नाशंसन्त तदा योधा जीवितान्यपि संयुगे ।
उन दोनोंके दुर्जय युद्धमें परस्पर भिड़े हुए योद्धा समर-भूमिमें अपने जीवनकी भी आशा छोड़ बैठे थे ॥ ९४ १/२ ॥
शरैर्विभिन्नसर्वाङ्गा युधि प्रक्षीणबान्धवाः ।
निपेतुर्योधमुख्यास्तु रुधिरोक्षितवक्षसः ॥ ९५ ॥
उनके सारे अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे । उनके बन्धु-बान्धव भी युद्धमें काम आ गये थे और उन प्रमुख योद्धाओंकी छाती खूनसे रँगी हुई थी । इस अवस्थामें वे धराशायी हो गये ॥ ९५ ॥
पतितैर्निष्पतद्द्भिश्च पात्यमानैश्च संयुगे ।
बभूव भूः समाकीर्णा योधैरुद्गतजीवितैः ॥ ९६ ॥
युद्धस्थलमें गिरे हुए, गिरते हुए और गिराये जाते हुए निष्प्राण योद्धाओंकी लाशोंसे भूमि पट गयी थी ॥ ९६ ॥
संगृह्णतोः शरान् घोरान्न च संदधतोस्तयोः ।
अन्तरं ददृशे कश्चित् प्रयत्नादपि संयुगे ॥ ९७ ॥
उस युद्धस्थलमें घोर बाणोंको हाथमें लेते और धनुषपर रखते हुए उन दोनों वीरोंमें कितना अन्तर है, इस बातको कोई प्रयत्न करके भी न देख सका ॥ ९७ ॥
लघुत्वाच्च महाबाहू युद्धशौण्डौ महाबलौ ।
मण्डलीभूतधनुषौ सकृदेव बभूवतुः ॥ ९८ ॥
वे दोनों महाबली, महाबाहु युद्धमें कुशल थे । उन दोनोंने फुर्तीके कारण एक साथ ही अपने धनुषोंको खींचकर मण्डलाकार बना लिया ॥ ९८ ॥
प्रह्लादस्य च बाणौघैर्दुद्रावान्तकवाहिनी ।
उह्यमानं बलवता वायुनेवाभ्रमण्डलम् ॥ ९९ ॥
प्रह्लादके बाणसमूहोंसे घायल होकर कालकी सेना भाग चली । ठीक उसी तरह जैसे बलवान् वायुके द्वारा ढोये जाते हुए मेघोंका समूह छिन्न-भिन्न हो जाता है ॥ ९९ ॥
हतदर्पं तु विज्ञाय प्रह्लादः कालमाहवे ।
अपयातं च समरे द्विपन्तं सम्प्रतर्क्य-तम् ॥ १००॥
मत्वा वशगतं चैव प्रह्लादो युद्धदुर्मदः ।
तत्रैवान्यां चमूं भूयः सम्ममर्द महासुरः ॥ १०१॥
उस समराङ्गणमें कालका घमंड चूर हुआ जान तथा अपने उस शत्रुको युद्धसे भागा हुआ समझकर रणदुर्मद महान् असुर प्रह्लाद उन्हें पराजित मानकर पुनः दूसरी देव-सेनाका मर्दन करने लगे ॥ १००-१०१ ॥
कालप्रह्लादयोर्युद्धमभवद् यादृशं पुरा ।
तादृशं सर्वलोकेषु न भूतं न भविष्यति ॥ १०२॥
पूर्वकालमें प्रह्लाद और कालका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा युद्ध सम्पूर्ण लोकोंमें न तो कभी हुआ है और न होगा ही ॥ १०२ ॥
एवमद्भुतवीर्यौजा महार णकृतव्रणः ।
प्रह्लादस्त्वथ वृद्धोऽत्र कालस्त्वपसृतो रणात् ॥ १०३॥
इस प्रकार अद्भुत बल पराक्रम और ओजसे सम्पन्न तथा उस महासमरमें घायल हुए प्रह्लाद उस युद्धमें बढ़ गये—विजयी हुए और कालदेवता रणक्षेत्रसे भाग गये ॥ १०३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरयुद्धे कालप्रह्लादयुद्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवासुरसंग्राममें काल और प्रह्लादका युद्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
९३८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
षष्टितमोऽध्यायः
कुबेर और अनुह्लादका भयंकर युद्ध
वैशम्पायन उवाच
धनाध्यक्षमनुह्लादः प्रह्लादस्यानुजो बली।
ससैन्यं योधयामास क्षोभयन् यक्षवाहिनीम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! प्रह्लादका बलवान् भाई अनुह्लाद यक्षसेनाको क्षोभमें डालता हुआ सेनासहित धनाध्यक्ष कुबेरके साथ युद्ध करने लगा ॥ १ ॥
महता च बलौघेन त्वनुह्लादोऽसुरोत्तमः।
अर्दयामास संक्रुद्धो धनाध्यक्षं प्रतापवान् ॥ २ ॥
असुरोंमें श्रेष्ठ प्रतापी अनुह्लाद कुपित हो अपने विशाल सैन्यसमूहद्वारा कुबेरको पीड़ा देने लगा ॥ २ ॥
अमृष्यमाणस्त्रिदशानावस्थानुदायुधान् ।
चकार कदनं घोरं धनुष्पाणिर्महासुरः ॥ ३ ॥
वह महान् असुर युद्धस्थलमें खड़े हुए देवताओंको शस्त्र उठाये देख उन्हें सहन न कर सका। उसने हाथमें धनुष लेकर उनका घोर संहार मचाया ॥ ३ ॥
आवर्त इव संजज्ञे बलस्य महतो महान् ।
क्षुभितस्याप्रमेयस्य सागरस्येव सम्प्लवे ॥ ४ ॥
जैसे प्रलयकालमें क्षुब्ध हुए अपार महासागरमें भँवरें उठने लगती हैं, उसी प्रकार उस क्षुब्ध हुई विशाल सेनामें आवर्त ( मन्थन)-सा होने लगा ॥ ४ ॥
त्रिदशानां शरीरैस्तु दानवानां च मेदिनी।
बभूव निचिता घोरैः पर्वतैरिव सम्प्लवे ॥ ५ ॥
देवताओं और दानवोंकी लाशोंसे वहाँकी धरती पट गयी, मानो प्रलयकालमें ढहे हुए भयंकर पर्वतोंसे आच्छादित हो गयी हो ॥ ५ ॥
मेरुपृष्ठं तु रक्तेन रञ्जितं सम्प्रकाशते ।
सर्वतो माधवे मासि पुष्पितैरिव किंशुकैः ॥ ६ ॥
मेरुपर्वतकी वह घाटी रक्तसे रञ्जित होकर वैशाख मासमें सब ओरसे लाल फूलोंसे युक्त पलाशवृक्षकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ ६ ॥
हतैर्वीरैर्गजैरश्वैः प्रावर्तत महानदी।
शोणितौघा महाघोरा यमराष्ट्रविवर्धिनी ॥ ७ ॥
मारे गये वीरों, हाथियों और घोड़ोंसे वहाँ खूनकी एक महानदी बह चली, जिसमें जलके स्थानमें रक्तका स्रोत बह रहा था। वह महाघोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि करने-वाली थी ॥ ७ ॥
शकृन्मेदोमहापङ्का सम्प्रकीर्णान्त्रशैवला।
छिन्नकायशिरोमीना अङ्गावयवशाद्वला ॥ ८ ॥
उसमें विष्ठा और चरबी बड़ी भारी कीचड़के समान प्रतीत होती थी। सब ओर बिखरी हुई आँतें सेवार-सी जान पड़ती थीं। कटे हुए सिर और धड़ ही उस नदीके मत्स्य थे। अङ्गोंके अवयव ही घास थे ॥ ८ ॥
गृध्रहंससमाकीर्णा केकिसारसनादिता।
वसाफेनसमाकीर्णा प्रोत्कृष्टस्तनितस्वरा ॥ ९ ॥
गीधरूपी हंस वहाँ छा रहे थे। मोरों और सारसोंके कलरवोंसे वह मुखरित हो रही थी। वसारूपी फेन उसमें व्याप्त थे। चारों ओर मची हुई चीख-पुकार ही उसका कलकलनाद थी ॥ ९ ॥
तां कापुरुषदुस्तारां युद्धभूमौ महानदीम्।
नदीमिवातपापाये हंससंघोपशोभिताम् ॥ १० ॥
युद्धभूमिमें बहनेवाली वह महानदी कायरोंके लिये दुस्तर थी। ठीक वैसे ही जैसे वर्षा-ऋतुमें बढ़ी हुई नदीको पार करना किसीको भी कठिन हो जाता है। हंस आदि पक्षियोंके समुदाय उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १० ॥
त्रिदशा दानवाश्चैव तेरुस्ते दुस्तरां नदीम् ।
यथा पद्मरजोध्वस्तां नलिनीं गजयूथपाः ॥ ११ ॥
देवता और दानव उस दुस्तर नदीको उसी प्रकार पार कर गये जैसे कमलोंके परागसे धूसर वर्णवाली पुष्करिणीको गजयूथपति लाँघ जाते हैं ॥ ११ ॥
ततः सृजन्तं वाणौघाननुह्लादं रथे स्थितम् ।
ददर्श तरसा देवो निघ्नन्तं यक्षवाहिनीम् ॥ १२ ॥
रथपर बैठा हुआ अनुह्लाद बाणसमूहोंकी वर्षा करके यक्षसेनाका वेगपूर्वक विनाश कर रहा था। यह बात स्वयं कुबेरने देखी ॥ १२ ॥
क्रुद्धस्ततो दैत्यबलं सूदयामास वित्तपः।
विक्षिप्तन्निव खे वायुर्महाभ्रपटलं बलात् ॥ १३ ॥
फिर तो जैसे वायु आकाशमें फैली हुई मेघोंकी भारी घटाको बलपूर्वक छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धनाध्यक्ष कुबेरने दैत्योंकी सेनाका संहार कर डाला॥
समीक्ष्य तुमुलं युद्धमनुह्लादश्च वीर्यवान् ।
रथेनादित्यवर्णेन कुबेरमभिदुद्रुवे ॥ १४ ॥
वह भयंकर युद्ध देखकर पराक्रमी अनुह्लादने सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा कुबेरपर धावा किया ॥ १४ ॥
स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठो विकृष्य रणमूर्धनि ।
उत्ससर्ज शितान् बाणान् वित्तेशस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यवीरने युद्धके मुहानेपर अपने धनुषको खींचकर महामनस्वी धनाध्यक्ष कुबेरपर पैने बाणोंका प्रहार किया ॥ १५ ॥
कुबेरं प्राप्य ते बाणा निर्भिद्य सुसमाहिताः।
अपरान् पृष्ठतोजघ्नुर्ध्यासकान् यक्षराक्षसान् ॥ १६ ॥
भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः [ ९३९
वे बाण कुबेरके पास पहुँचकर उनके शरीरको विदीर्ण करते हुए पीठकी ओरसे निकल गये और युद्धमें लगे हुए दूसरे-दूसरे यक्षों तथा राक्षसोंको एकाग्रतापूर्वक घायल करने लगे ॥ १६ ॥
देवः शरैरभिहतो निशितैर्ज्वलनोपमैः।
अनुह्लादं प्रत्युदियात् संक्रुद्धः पर माहवे ॥ १७ ॥
अग्निके समान तेजस्वी तथा पैने बाणोंसे घायल हुए धनाध्यक्ष कुबेर उस महासमरमें बहुत कुपित हुए और अनुह्लादका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ १७ ॥
ततो वैश्रवणो राजा क्रुद्धो यक्षगणैः सह।
ववर्ष शरवर्षाणि दानवं प्रति वीर्यवान् ॥ १८ ॥
क्रोधमें भरे हुए पराक्रमी राजा कुबेरने यक्षोंके साथ रहकर उस दानवपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥
तद्यथा शारदं वर्षं गोवृषः शीघ्रमागतम्।
अपारयन् वारयितुं प्रतिगृह्णन् निमीलितः ॥ १९ ॥
एवमेव कुबेरस्य शरवर्षं महासुरः।
निमीलिताक्षः सहसा दैत्यः सहति दारुणम् ॥ २० ॥
जैसे साँड़ शीघ्र आयी हुई शरद्-ऋतुकी वृष्टिको रोकनेमें असमर्थ हो आँख बंद करके उसके आघातको चुपचाप ग्रहण करता है, उसी प्रकार वह महान् असुर दैत्य कुबेर-द्वारा सहसा की गयी भयंकर बाणवर्षाको नेत्र मूंदकर चुपचाप सहन करने लगा ॥ १९-२० ॥
रोषितः शरवर्षेण धनदेन महासुरः।
इन्द्रकेतुप्रतीकाशमभीतोऽपश्यत द्रुमम् ॥ २१ ॥
प्रवृद्धशाखाविटपं तरुणाङ्कुरपल्लवम्।
उत्पाट्य कुपितो दैत्यस्तरुं फलसमन्वितम् ॥ २२ ॥
निजघान हयाञ्छ्रेष्ठान् कुबेरस्य महात्मनः।
कुबेरकी बाणवर्षासे रोषमे भरे हुए उस महान् असुरने तनिक भी भयभीत न होकर इन्द्रध्वजके समान एक विशाल वृक्षको देखा, जिसकी शाखाएँ और टहनियाँ विशेषरूपसे बढ़ी हुई थीं। उसमे नये-नये अङ्कुर और पल्लव निकले हुए थे तथा वह फलसे भी सम्पन्न था। उस कुपित हुए दैत्यने उस वृक्षको उखाड़कर उसके द्वारा महात्मा कुबेरके श्रेष्ठ घोड़ोंको मार डाला ॥ २१-२२ १/२ ॥
तस्य कर्म महाघोरं दृष्ट्वा सर्वे महासुराः ॥ २३ ॥
सिंहनादं नदन्ति स्म अनुह्लादप्रहर्षिताः।
उसके उस महाघोर-कर्मको देखकर सभी बड़े-बड़े असुर अनुह्लादसे प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ २३ १/२ ॥
तयोस्तु तुमुलं युद्धं संजज्ञे देवदैत्ययोः ॥ २४ ॥
ततस्तौ क्रोधरक्ताक्षावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ।
अन्योन्यं विविधैः शस्त्रैर्घोरैर्जघ्नतुराहवे ॥ २५ ॥
उन देवता (कुबेर) और दैत्य (अनुह्लाद) में तुमुल युद्ध होने लगा। दोनोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। दोनों ही उस युद्धमें एक-दूसरेके वधकी इच्छासे भाँति-भाँतिके घोर शस्त्रोंद्वारा परस्पर आघात कर रहे थे ॥ २४-२५ ॥
त्रिदशा दानवान् सर्वे मथित्वा प्राणदंस्तदा।
दानवैस्त्रिदशाश्चापि क्रुद्धैर्भुवि निपातिताः ॥ २६ ॥
समस्त देवता दानव-योद्धाओंको रौंदकर जोर-जोरसे गर्जना करते थे। इसी प्रकार कुपित हुए दानवोंने भी देवताओंको पृथ्वीपर मार गिराया था ॥ २६ ॥
दानवास्त्वथ संक्रुद्धास्त्रिदशान् निशितैः शरैः।
विध्युर्वज्रसंकाशैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः ॥ २७ ॥
दानव अत्यन्त कुपित हो वज्रके तुल्य तेजस्वी तथा कङ्कपत्र लगे हुए सीधे जानेवाले तीखे बाणोंसे देवताओंको घायल करने लगे ॥ २७ ॥
विदार्यमाणा दैत्यौघैस्त्रिदशास्तु महाबलाः।
अमर्षिततराश्चक्रुर्युद्धकर्माण्यभीतवत् ॥ २८ ॥
दैत्यसमूहोंद्वारा घायल किये जाते हुए महाबली देवता अत्यन्त अमर्षमें भरकर निर्भयकी भाँति युद्धकर्म करने लगे ॥
तैर्गदाभिः सुभीमाभिः पट्टिशैः शूलमुद्गरैः।
परिघैश्च सुतीक्ष्णाग्रैर्दानवाः पीडिताः शरैः ॥ २९ ॥
उन्होंने भयंकर गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर, परिघ तथा तेज धारवाले बाणोंद्वारा दानवोंको बड़ी पीड़ा दी ॥ २९ ॥
शरनिर्भिन्नगात्राश्च खड्गविच्छिन्नवक्षसः।
जगृहुस्ते शिलाश्चैव द्रुमांश्चासुरसत्तमाः ॥ ३० ॥
उन असुरशिरोमणि योद्धाओंके अङ्ग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहे थे। उनकी छाती खड्गसे छिन्न-भिन्न हो गयी थी; अतः उन्होंने भी बड़ी-बड़ी शिलाएँ और वृक्ष हाथमें ले लिये॥
ते भीमवेगा दितिजा नर्दमानाः पुनः पुनः।
ममन्थुस्त्रिदशान् वीर्याच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३१ ॥
उन भयंकर वेगवाले सैकड़ों और हजारों दैत्योंने वारंवार गर्जना करके अपने बल-पराक्रमसे देवताओंको मथ डाला ॥ ३१ ॥
ततस्तु तुमुलं युद्धं तेषां समभिवर्तत।
शिलाभिर्विपुलाभिश्च शतशश्चैव पादपैः ॥ ३२ ॥
परिघैः पट्टिशैर्भल्लैर्भिन्दिपालैः परश्वधैः।
तदनन्तर उनमें घमासान युद्ध आरम्भ हो गया। वे बड़ी-बड़ी शिलाओं, सैकड़ों वृक्षों तथा परिघ, पट्टिश, भल्ल, भिन्दिपाल और फरसोंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ३२ १/२ ॥
केचिन्निवृत्तशिरसः केचिच्च विडलीकृताः ॥ ३३ ॥
केचिद् विनिहता भूमौ रुधिराद्रीः सुरासुराः।
किसीके सिर उड़ गये, कोई विदीर्ण हो गये, कोई भूमिपर गिराकर मार डाले गये। इस प्रकार सभी देवता और असुर खूनसे लथपथ हो रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥
केचिद् रणाजिराग्रण्णाः परस्परवधार्दिताः ॥ ३४ ॥
विभिन्नहृदयाः केचिच्छिन्नपादाश्च शेरते।
९४० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
विदारितास्त्रिशूलैश्च केचित् तत्र गतासवः ॥ ३५ ॥ परस्परकी मारसे पीड़ित हो कितने ही योद्धा समराङ्गणसे भाग गये। किन्हींके हृदय विदीर्ण हो गये। कोई पैर कट जानेसे पृथ्वीपर सो रहे थे और कितने ही त्रिशूलोंसे विदीर्ण हो वहाँ प्राणोंसे हाथ धो बैठे थे ॥ ३४-३५॥
तत् सुभीमं महद्युद्धं देवदानवसंकुलम् । बभूव तुमुलं युद्धं शिलापादपसंकुलम् ॥ ३६ ॥ वह देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ महायुद्ध बड़ा भयंकर प्रतीत होता था; शिलाओं और वृक्षोंके प्रहारसे व्याप्त होनेके कारण उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी ॥ ३६ ॥
धनुर्ज्यातन्त्रिमधुरं हिक्कातालसमन्वितम् । आर्तस्तनितघोषार्थं युद्धं गान्धर्वमावभौ ॥ ३७ ॥ वहाँ धनुषकी प्रत्यञ्चारूपी वीणाकी मधुर तान छिड़ी हुई थी। योद्धाओंको जो हिचकियाँ आती थीं, वे ही मानो ताल थीं। पीड़ितोंके आर्तनाद ही मृदङ्ग आदि वाद्योंके घोष एवं आलाप थे। इस प्रकार वह युद्ध गान्धर्वमहोत्सव (संगीतसमारोह) के समान प्रतीत होता था ॥ ३७ ॥
कुवेरः स धनुष्पाणिर्दानवान् रणमूर्धनि । दिशो विद्रावयामास संक्रुद्धः शरवृष्टिभिः ॥ ३८ ॥ उस समय क्रोधमें भरे हुए कुवेर हाथमें धनुष लेकर युद्धके मुहानेपर बाणोंकी वर्षा करके दानवोंको सम्पूर्ण दिशाओंमें खदेड़ने लगे ॥ ३८ ॥
कुवेरेणार्दितं सैन्यं विद्रुतं प्रेक्ष्य दानवः । अभ्यद्रवदनुह्रादः प्रगृह्य महतीं शिलाम् ॥ ३९ ॥ अपनी सेनाको कुवेरसे पीड़ित हुई देख दानव अनुह्राद एक बहुत बड़ी शिला हाथमें लेकर कुवेरकी ओर दौड़ा ॥
क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षः पितृतुल्यपराक्रमः । शिलां तां पातयामास कुवेरस्य रथोत्तमे ॥ ४० ॥ उस समय उसके नेत्र क्रोधसे दुगुने लाल हो रहे थे। वह अपने पिता हिरण्यकशिपुके समान पराक्रमी था। उसने कुवेरके उत्तम रथपर उस शिलाको दे मारा ॥ ४० ॥
आपतन्तीं शिलां दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः । रथादाप्लुत्य वेगेन वसुधायां व्यतिष्ठत ॥ ४१ ॥ उस शिलाको आती देख हाथमें गदा लिये हुए कुवेर अपने रथसे वेगपूर्वक कूदकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥ ४१ ॥
सचक्रकूवरहयं सध्वजं सशरासनम् । भङ्क्त्वा रथोत्तं तस्य निपपात शिला भुवि ॥ ४२ ॥ वह शिला कुवेरके उत्तम रथको चक्र, कूबर, घोड़े, ध्वज और धनुषसहित तोड़-फोड़कर भूमिपर गिर पड़ी ॥ ४२ ॥
विमथ्य तु कुवेरस्य प्रह्लादस्यानुजो रथम् । शूराणां कदनं चक्रे सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ ४३ ॥ कुवेरके रथको नष्ट-भ्रष्ट करके प्रह्लादके छोटे भाई अनुह्रादने तनों और शाखाओंसहित वृक्षोंद्वारा देवपक्षके शूर-वीरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ४३ ॥
निर्भिन्नशिरसो भग्नास्त्रिदशाः शोणितोक्षिताः । द्रुमप्रव्यथिताङ्गाश्च निपेतुर्धरणीतले ॥ ४४ ॥ देवताओंके सिर फूट गये। अङ्ग-भङ्ग हो गये। वे रक्तसे नहा गये। वृक्षोंकी मारसे उनके सारे अङ्ग व्यथित होने लगे और वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४४ ॥
विद्राव्य विपुलं सैन्यमनुह्रादो महासुरः । गिरिशृङ्गं गृहीत्वा तु कुवेरमभिदुद्रुवे ॥ ४५ ॥ महान् असुर अनुह्रादने देवताओंकी विशाल सेनाको भगाकर एक पर्वतका शिखर हाथमें ले लिया और कुवेरपर धावा किया ॥ ४५ ॥
तमापतन्तं धनदो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । विनदित्वाऽऽह्वयामास दानवेन्द्रं महाबलम् ॥ ४६ ॥ उसे आते देख पराक्रमी कुवेरने गदा उठा ली और बड़े जोरसे गरजकर उस महाबली दानवराजको ललकारा ॥
तस्य दैत्यस्य संक्रुद्धो गदां तां बहुकण्टकाम् । न्यपातयत वित्तेशो दानवस्योरसि प्रभो ॥ ४७ ॥ प्रभो ! धनके स्वामी कुवेरने कुपित होकर उस दैत्य एवं दानवकी छातीपर उस गदाको दे मारा, जिसमें बहुत-से काँटे लगे हुए थे ॥ ४७ ॥
दैत्यः स क्रोधताम्राक्षस्तं प्रहारमचिन्तयन् । वित्तेशस्योपरि तदा गिरिशृङ्गमपातयत् ॥ ४८ ॥ परंतु क्रोधसे लाल आँखें किये उस दैत्यने उनके उस प्रहारकी कोई परवा नहीं की और धनके स्वामी कुवेरपर तत्काल ही उस पर्वतशिखरको गिरा दिया ॥ ४८ ॥
स विह्वलितसर्वाङ्गो गिरिशृङ्गेन ताडितः । पपात सहसा भूमौ विशीर्ण इव पर्वतः ॥ ४९ ॥ पर्वतशिखरकी चोट खाकर कुवेरके सारे अङ्ग विह्वल हो गये और वे चूर-चूर हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४९ ॥
वित्तेशं विह्वलं दृष्ट्वा सर्वे ते यक्षराक्षसाः । परिवार्य महात्मानं ररक्षुर्भीमविक्रमाः ॥ ५० ॥ महात्मा धनेशको विह्वल हुआ देख वे भयंकर पराक्रमी समस्त यक्ष और राक्षस उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करने लगे ॥ ५० ॥
मुहूर्तं विह्वलो भूत्वा पुनर्वैश्रवसः सुतः । उपतस्थे च सहसा धनदः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५१ ॥ स ननाद महानादं त्रैलोक्यमभिनादयन् । जनयंश्च निर्घोषं विधमन्निव पर्वतान् ॥ ५२ ॥ दो घड़ीतक व्याकुल रहनेके पश्चात् विश्रवाके पुत्र धनदाता कुवेर सहसा उठकर खड़े हो गये और पुनः क्रोधसे मूर्च्छित हो तीनों लोकोंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े जोर-
भविष्यपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ९४१
जोरसे सिंहनाद करने लगे। उस समय वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान घोष उत्पन्न करने और पर्वतोंको भी ताप सा देने लगे ॥ ५१-५२ ॥
तमवध्यं तु विज्ञाय निहन्तुं पुनरुत्थितम् ।
प्रेक्ष्य पिङ्गाक्षमायान्तं दानवा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५३ ॥
पिङ्गल नेत्रवाले कुबेर अवध्य हैं और पुनः दानवोंका संहार करनेके लिये उठ गये हैं। यह जानकर उन्हें आते देख समस्त दानव सहसा भाग खड़े हुए ॥ ५३ ॥
तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वासुह्लादो ह्यसुरोऽब्रवीत् ।
कालनेमिं दानवं च वीर्यदर्पसमन्वितम् ॥ ५४ ॥
आत्मानं चैव वीर्यं च विस्मृत्याभिजर्न तथा ।
क्व गच्छथ भयत्रस्ताः प्राकृता इव दानवाः ॥ ५५ ॥
निवर्तध्वं महावीर्याः किं प्राणान् परिरक्षथ ।
नालं युद्धाय यक्षोऽयं महतीयं विभीषिका ॥ ५६ ॥
उन सबको भागते देख असुर अनुह्लादने कहा—‘महापराक्रमी दानवो ! तुमलोग बल और दर्पसे भरे हुए दानव कालनेमिको, अपनेको तथा अपने पराक्रम और कुलको भूलकर निम्नश्रेणीके मनुष्योंकी भाँति भयभीत होकर कहाँ भागे जा रहे हो। लौट आओ ! क्यों अपने प्राण बचानेकी चेष्टामें लगे हो। यह यक्ष युद्ध करनेमें समर्थ नहीं है, यह गर्जना इसकी महती विभीषिकामान्न है ॥ ५४-५६ ॥
एतां विभीषिकामद्य दानवानां समुत्थिताम् ।
विक्रम्य विधमिष्यामि निवर्तध्वं महासुराः ॥ ५७ ॥
‘महान् असुरो ! तुमलोग लौट आओ। मैं यक्षराजकी इस विभीषिकाको, जो दानवोंके लिये उठी हुई है, पराक्रमपूर्वक नष्ट कर दूँगा' ॥ ५७ ॥
तेऽसुराः संनिवृत्ताश्च समदा इव कुञ्जराः ।
निजघ्नुः परमक्रुद्धा देवसैन्यं महासुराः ॥ ५८ ॥
यह सुनकर मतवाले हाथियोंके समान वे असुर लौट आये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे महान् असुर देवसेनाका संहार करने लगे ॥ ५८ ॥
क्षीणप्रहरणाः केचिन्महामेघनिभस्वनाः ।
दर्पोत्कटा भुजैरेव सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ५९ ॥
कितने ही दैत्य आयुधोंके नष्ट हो जानेसे महान् मेघके समान केवल गर्जना कर रहे थे। कितने ही उत्कट दर्पसे युक्त हो भुजाओंसे ही प्रहार करते थे ॥ ५९ ॥
प्रांशुभिश्चैव काष्ठैश्च शिलाभिश्च महाबलाः ।
बाहुभिश्च तथान्योन्यमाक्षिपन्ति स्म वेगिताः ॥ ६० ॥
वे महान् बलशाली वेगवान् योद्धा ऊँचे-ऊँचे काष्ठों, शिलाओं तथा भुजाओं द्वारा एक दूसरेपर प्रहार करते थे ॥
मुष्टिभिश्च तलैश्चैव नखघातैर्महाबलाः ।
पादपैश्च महाशाखैर्युध्यन्त रणाजिरे ॥ ६१ ॥
महाबली सैनिक उस समराङ्गणमें मुक्कों, थप्पड़ों, नख-प्रहारों तथा बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्षोंद्वारा युद्ध करते थे ॥
अनुह्लादस्त संक्रुद्धो देवतानां महाचमूम् ।
ममन्थ परमायत्तो वनान्यग्निरिवोत्थितः ॥ ६२ ॥
क्रोधमें भरा हुआ अनुह्लाद विजयके लिये परम प्रयत्नशील हो देवताओंकी उस विशाल वाहिनीको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे प्रज्वलित हुआ दावानल जंगलोंको जलाकर भस्म कर डालता है ॥ ६२ ॥
रुधिराद्रांस्तु बहवः शेरते योधसत्तमाः ।
विकृताः पतिता भूमौ ताम्रपुष्पा इव द्रुमाः ॥ ६३ ॥
बहुत-से श्रेष्ठ योद्धा रक्तसे भी भीगकर विकृत अवस्थामें भूमिपर पड़े हुए सो रहे थे, जो लाल फूलवाले वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ ६३ ॥
अनुह्लादस्य विक्रान्तो देवस्त्वाशीविषोपमान् ।
युध्यमानस्य समरे व्यसृजन्निशिताञ्छरान् ॥ ६४ ॥
पराक्रमी देवता कुबेर समरभूमिमें जूझते हुए अनुह्लादपर विषधर सर्पोंके समान भयंकर और पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६४ ॥
धनाधिपेन विद्धस्य अनुह्लादस्य संयुगे ।
अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निष्चेरुरर्चिषः ॥ ६५ ॥
युद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरद्वारा घायल किये गये अनुह्लादके मुखसे क्रोधवश अङ्गारयुक्त आगकी लपटें निकलने लगीं ॥
अथ. वाणसहस्रेण वित्तेशं दानवोत्तमः ।
विव्याध स शरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ६६ ॥
तब कुपित हुए दण्डधारी यमराजके समान दानवशिरोमणि अनुह्लादने धनेश्वर कुबेरको अपने सहस्रों बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६६ ॥
कुबेरस्तु शरैर्भिन्नः समन्तात् क्षतजोक्षितः ।
रुधिरं परिसुस्राव गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ ६७ ॥
सब ओरसे बाणोंद्वारा विदीर्ण हुए कुबेर रक्तसे नहा गये। जैसे झरनोंसे युक्त पर्वत पानीकी धारा बहाता है, उसी प्रकार कुबेर अपने अङ्गोंसे रक्त बहाने लगे (और बेहोश हो गये) ॥ ६७ ॥
लब्ध्वा स तु पुनः संज्ञां रोषरक्तेक्षणः सुरः ।
गदामथ समासाद्य भीमां भीमपराक्रमः ।
चिक्षेप दैत्यमुद्दिश्य वलात् क्रोधेन मूर्च्छितः ॥ ६८ ॥
पुनः होशमें आनेपर रोषसे लाल आँखें किये भयानक पराक्रमी देवता कुबेरने भयंकर गदा हाथमें ले क्रोधसे अचेत-से होकर उस दैत्यको लक्ष्य करके उसे बलपूर्वक दे मारा ॥
अप्राप्तामन्तरे सोऽथ तां गदां गदयाऽसुरः ।
बभञ्ज विनदन् क्रुद्धस्तदाश्चर्यमभूत् तदा ॥ ६९ ॥
किंतु सिंहनाद करते हुए उस दैत्यने निकट आनेसे पहले ही अपनी गदासे उस गदाको क्रोधपूर्वक बीचमें ही तोड़ डाला। उस समय वह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ॥