भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 936, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 936

९१२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंश

हत्वाष्टौ तत्र योधानां शतानि पवनः प्रभुः। कृत्वा मार्गं सुरश्रेष्ठो ननाद सुमहास्थः॥ ८६॥ प्रभावशाली, महारथी, सुरश्रेष्ठ पवनदेवने वहाँ आठ सौ पौलोम योद्धाओंका वध करके अपने लिये मार्ग बना लिया और बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ८६॥

अद्यापि च सुविस्तीर्णः पन्थाः संदृश्यते दिवि। नाम्ना वायुरथो नाम सिद्धाः पश्यन्ति तं दिवि ॥ ८७॥ आज भी आकाशमें वह सुविस्तृत मार्ग दिखायी देता है, जो वायुरथके नामसे प्रसिद्ध है। सिद्ध पुरुष द्युलोकमें उसका दर्शन करते हैं ॥ ८७ ॥

वैशम्पायन उवाच हयग्रीवस्तु दितिजः पूषणं प्रति वीर्यवान्। ननाद सुमहानादं सिंहनादं महारथः॥ ८८॥ वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हयग्रीव नामक पराक्रमी एवं महारथी दैत्यने पूषापर आक्रमण करके बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ८८॥

विस्फार्य सुमहच्चापं हेमजालविभूषितम्। पूषणं दितिजोऽपश्यत् क्रुद्धो घोरेण चक्षुषा ॥ ८९॥ क्रोधमें भरे हुए उस दैत्यने सोनेकी जालीसे विभूषित विशाल धनुषको तानकर पूषाकी ओर घोर दृष्टिसे देखा ॥

भुजाभ्यामाददानस्य संदधानस्य चै शरान्। मुञ्चतः कर्षतो चापि ददृशुस्तन्न नान्तरम् ॥ ९० ॥ उस दैत्यके दोनों हाथोंसे बाणोंके लेने, धनुषपर रखने, प्रत्यञ्चाको खींचने और उन बाणोंको छोड़नेमें कितने क्षणका अन्तर होता है, यह कोई भी वहाँ देख नहीं पाते थे ॥ ९० ॥

अग्निकचक्रोपमं दीप्तं मण्डलीकृतकार्मुकम्। तदासीद् दानवेन्द्रस्य सव्यदक्षिणमस्यतः ॥ ९१ ॥ दायें-बायें दोनों ओर बाण छोड़ते हुए उस दानवराजका दीप्तिमान् धनुष मण्डलाकार होकर अलातचक्रके समान प्रतीत होता था ॥ ९१ ॥

रुक्मपुङ्खैस्ततस्तस्य चापमुक्तैः शितैः शरैः। प्राच्छाद्यन्त शिलाधौतैर्दिशः सूर्यस्य च प्रभाः॥ ९२॥ उसके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंसे, जिनमें सोनेके पर लगे थे और जिन्हें सानपर चढ़ाकर तेज किया गया था, सम्पूर्ण दिशाएँ और सूर्यकी प्रभाएँ भी आच्छादित हो गयीं ॥

ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम्। नभश्चराणां नभसि दृश्यन्ते बहवो व्रजाः ॥ ९३॥ तदनन्तर झुकी हुई गाँठ और सुवर्णमय पंखवाले आकाशचारी बाणोंके बहुतसे समूह अन्तरिक्षमें दिखायी देने लगे ॥ ९३ ॥

गिरिकूटनिभाच्चापात् प्रभवन्तः शरोत्तमाः। श्रेणीभूताः प्रकाशन्ते यान्तः श्येना इवाम्बरे ॥ ९४॥ पर्वतशिखरके समान उसके विशाल धनुषसे प्रकट होने- वाले उत्तम बाण आकाशमें श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए बाजोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ९४ ॥

गृध्रपत्रांश्शिलाधौतान् कार्तस्वरविभूषितान्। महावेगान् प्रशस्ताग्रान् मुमोच दितिजः शरान् ॥९५॥ वह दैत्य गीधके पंख लगे हुए, शिलापर तेज किये गये, सुवर्णसे विभूषित, महान् वेगशाली तथा अच्छी नोकवाले बाणोंका प्रहार कर रहा था ॥ ९५ ॥

ततश्चापबलोद्भूताः शातकुम्भविभूषिताः। देहे समयकीर्यन्त पूष्णः संनिहिताः शराः ॥ ९६॥ तदनन्तर धनुषसे बलपूर्वक उठे हुए सुवर्णभूषित बाण पूषाके शरीरमें गिरने और धँसने लगे ॥ ९६ ॥

ते व्योम्नि रुक्मविकृताः सम्प्रकाशन्त सर्वशः। खद्योता इव घर्मान्ते खे चरन्तः समन्ततः ॥ ९७ ॥ जैसे वर्षा-ऋतुमें जुगनुओंके समुदाय आकाशमें सब ओर विचरते हैं, उसी प्रकार वे सुवर्णनिर्मित बाण व्योममण्डलमें सब ओर प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९७ ॥

शिलाधौताः प्रसन्नाग्राः पूषणं सिषिचुः शराः। पर्वतं वारिधाराभिर्यथा प्रावृषि तोयदाः ॥ ९८ ॥ जैसे वर्षाकालमें बादल अपनी जलधाराओंसे पर्वतको नहलाते हैं, उसी प्रकार शिलापर चढ़ाकर तेज किये गये स्वच्छ अग्रभागवाले वे बाण मानो पूषाको सींच रहे थे ॥९८॥

ततः प्रच्छादयामास पूषणं शरवृष्टिभिः। पर्वतं वारिधाराभिश्छादयन्निव तोयदः ॥ ९९ ॥ तत्पश्चात् अपनी जलधाराओंसे पर्वतको आच्छादित करनेवाले मेघकी भाँति हयग्रीवने अपने बाणोंकी वर्षासे पूषाको ढक दिया ॥ ९९ ॥

ततः सम्पूर्णोऽदेवस्य बलं वीर्यं पराक्रमम्। व्यवसायं च सत्त्वं च पश्यन्ति त्रिदशाद्भुतम् ॥१००॥ उस समय सब देवता पूषासहित उस दैत्यके बल, वीर्य, पराक्रम, व्यवसाय और धैर्यको अद्भुतरूपसे देख रहे थे ॥

तां समुद्रादियोद्गतां शरवृष्टिं समुत्थिताम्। नाचिन्तयत् तदा पूषा दैत्यं चाभ्यद्रवद् रणे ॥१०१॥ तदनन्तर समुद्रसे उठी हुई जलवर्षाके समान उस बाणवर्षाकी पूषाने कोई परवा नहीं की। उन्होंने तत्काल ही रणभूमिमें उस दैत्यपर धावा किया ॥ १०१ ॥

हेमपृष्ठं महानर्घं पूष्ण आसीन्महाधनुः। विकृतं मण्डलीभूतं शक्राशनिरिवापरा ॥१०२॥ पूषाका विशाल धनुष बड़े जोरसे टङ्कार करनेवाला था। उसके पृष्ठभागमें सोना जड़ा हुआ था। वह खींचा जानेपर मण्डलाकार हो दूसरे इन्द्र-वज्रके समान जान पड़ता था ॥

ततः शराः प्रादुरासन् पूरयन्त इवाम्बरम् ॥१०३॥ सुवर्णपुङ्खाः पूष्णस्ते प्रभवन्तः शरासनात्। मालेव रुक्मपुङ्खानां वितता व्योम्नि पत्रिणाम् ॥१०४॥

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