विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 935, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९१२
ढक दिया, ठीक वैसे ही, जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल अपनी जलधाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देते हैं ॥ ६७ १/२ ॥
ते पीडयन्तः पवनं क्रुद्धाः सप्त महारथाः ॥ ६८ ॥
प्रजासंहरणे घोराः सोमं सप्त ग्रहा इव ।
क्रोधमें भरे हुए वे सात पौलोम महारथी वायुदेवको उसी तरह पीड़ा देने लगे, जैसे प्रजाके संहार-कालमें सात घोर ग्रह सोमको पीड़ित करने लगते हैं ॥ ६८ १/२ ॥
ततो दक्षिणमक्षोभ्यं नानारत्नविभूषितम् ॥ ६९ ॥
करं गजकराकारमुद्यम्य युधि मारुतः ।
तेषां मूर्धसु दैत्यानां पातयामास वीर्यवान् ॥ ७० ॥
निहता वायुवेगेन तेन सप्त महारथाः ।
तब बल-पराक्रमसे सम्पन्न वायु देवताने किसीसे भी क्षुब्ध न किये जाने योग्य, नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा हाथीकी सूँड़के समान आकारवाले दाहिने हाथको ऊपर उठाकर उसीसे युद्धस्थलमे उन सातों पौलोमोंके मस्तकपर प्रहार किया । उस वायुतुल्य वेगशाली कर-प्रहारसे वे सातों महारथी मारे गये ॥ ६९–७० १/२ ॥
त्यक्त्वा प्राणान् पुलोमा तु विव्याध नवभिः शरैः ॥ ७१ ॥
प्रदर्पितमसंहायं दृष्ट्वा वायुं सनातनम् ।
तब पुलोमाने सनातन वायु देवताको दर्पयुक्त और अजेय देख प्राणोंका मोह छोड़कर नौ बाणोंसे उन्हे बींध डाला ॥ ७१ १/२ ॥
असंचिन्त्य शरौघांस्ताञ्ज्वलितांश्च पुलोमतः ॥ ७२ ॥
तेषां विदार्य तेजांसि दानवानां महात्मनाम् ।
शोणितक्लिन्नमुकुटा गैरिकाका इवाद्वयः ॥ ७३ ॥
पुलोमाकी ओरसे आये हुए उन प्रज्वलित बाणसमूहोंकी चिन्ता न करते हुए उन महाकाय दानवोंके तेज (मस्तक) को विदीर्ण करके वायु देवताने उनके मुकुटोंको रक्तसे भिगो दिया । उस समय वे दैत्य गेरुसे भीगे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ७२-७३ ॥
ते भिन्नवर्मास्थिभुजाः पतन्तो भान्ति दानवाः ।
मातङ्गयूथसम्भग्नाः पुष्पिता इव पादपाः ॥ ७४ ॥
कवच, हड्डी और भुजाओंके छिन्न-भिन्न हो जानेसे पृथ्वीपर गिरते हुए वे दानव हाथियोंके झुंडद्वारा तोड़े गये पुष्पयुक्त वृक्षोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ७४ ॥
तेषां विदारितैर्देह्रैर्दानवानां महात्मनाम् ।
ततः प्रावर्तत नदी रौद्ररूपा भयावहा ॥ ७५ ॥
उन महाकाय दानवोंके विदीर्ण किये हुए शरीरोंसे खूनकी एक भयंकर नदी बह चली, जिसका स्वरूप बड़ा ही रौद्र था ॥ ७५ ॥
प्रस्रवन्ती रणे रक्तं भीरूणां भयवर्धिनी ।
देवदैत्यगजाश्वानां रुधिरौघपरिप्लुता ।
रणभूमिरभूद्रौद्रा तत्र तत्र सहस्रशः ॥ ७६ ॥
वह रणभूमिमें रक्तका स्रोत बहाती हुई भीरु पुरुषोंके मनमें भयकी वृद्धि कर रही थी। देवताओं और दैत्योंके हाथी-घोड़ोंके रक्तके प्रवाहमें जहाँ-तहाँ सहस्रों स्थानोंमें डूबी हुई वह रणभूमि बड़ी भयंकर प्रतीत हो रही थी ॥ ७६ ॥
सम्भृता गतसत्त्वैश्च यक्षराक्षसखेचरैः ।
सानुगैः सपत्ताकैश्च सोपासङ्गरथध्वजैः ॥ ७७ ॥
निर्जीव यक्ष, राक्षस तथा खेचरोंसे वह भूमि भरी हुई थी। उनके सेवक, ध्वजा, पताका, उपासङ्ग और रथ सभी वहाँ बिखरे पड़े थे ॥ ७७ ॥
शीर्णकुम्भैस्तथा नागैर्घण्टाभिस्तु विभूषितैः ।
सुवर्णपुङ्खैर्ज्वलितैर्नाराचैस्तिग्मतेजसैः ॥ ७८ ॥
देवदानवनिर्मुक्तैः सविषैरुरगैरिव ।
घण्टोंसे विभूषित गजराज धराशायी हो गये थे, उनके कुम्भस्थल फट गये थे। सोनेके पर लगे हुए प्रचण्ड तेजवाले प्रज्वलित बाण, जिन्हे देवताओं और दानवोंने छोड़ा था, विषैले सर्पोंके समान वहाँ पड़े हुए थे ॥ ७८ १/२ ॥
प्रासतोमरनाराचैः शक्तिखङ्गपरश्वधैः ॥ ७९ ॥
सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः ।
कनकाङ्गदकेयूरैर्मणिभिश्च सकुण्डलैः ॥ ८० ॥
तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च शोभनैः ।
हृतैश्च दितिजैस्तत्र शस्त्रस्यन्दनवर्जितैः ॥ ८१ ॥
पतितैरपि विद्धैश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
प्रास, तोमर, नाराच, शक्ति, खड्ग, फरसे, सुवर्णनिर्मित गदा, मुसल, पट्टिश, सोनेके बाजूबन्द, केयूर, मणि, कुण्डल, कवच, दस्ताने, हार, सुन्दर पदक, शस्त्र तथा रथसे रहित मरे हुए दैत्य तथा घायल होकर पड़े हुए सैकड़ों और हजारों सैनिकोंसे वह रणभूमि भर गयी थी ॥ ७९–८१ १/२ ॥
निपातितध्वजरथो हतवाजिसुरद्विपः ॥ ८२ ॥
विमर्दो देवदैत्यानां सदृशः कर्मणा वभौ ।
जहाँ बहुत-से ध्वज और रथ गिराये गये थे, घोड़े, हाथी और रथी मार डाले गये थे, वह देवताओं तथा दैत्योंका विमर्द (संग्राम) उनके कर्मके अनुरूप ही प्रतीत होता था ॥
अथ दैत्यसहस्रेण पौलोमेन महारथः ॥ ८३ ॥
संवृतः पवनः श्रीमान् गदामुसलपाणिना ॥ ८४ ॥
तदनन्तर हाथोंमें गदा और मुसल लिये हुए पौलोम नामवाले एक सहस्र दैत्योंने श्रीमान् महारथी पवनदेवको घेर लिया ॥ ८३-८४ ॥
ते जघ्नुः शतसाहस्राः पवनं दानवोत्त्माः ।
तैर्वध्यमानः स वभौ समन्तादर्पितैः शरैः ॥ ८५ ॥
फिर तो लाखों श्रेष्ठ दानवोंने पवनदेवको मारना आरम्भ किया। वे चारों ओरसे बाण मारकर उन्हें चोट पहुँचाने लगे। शरीरमें धँसे हुए उन बाणोंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ ८५ ॥