भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 934
९१०श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हुए सूर्यमें प्रविष्ट होनेवाली किरणोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४९½ ॥

मयस्त्रिभिरथानर्च्छत् त्वष्टारं तु पतत्रिभिः ॥ ५० ॥
सुपर्णवेगैर्विकृतैर्ज्वलद्भिः प्राणनाशनैः ।
तदनन्तर मयने पङ्खवाले तीन बाणोंद्वारा, जो गरुड़के समान वेगशाली, विकराल, प्रकाशमान और प्राणनाशक थे, त्वष्टाको घायल कर दिया ॥ ५०½ ॥

त्वष्टाथ मयनिर्मुक्तैः सायकैरर्दितः प्रभुः ॥ ५१ ॥
अपयातो रणं हित्वा व्रीड्याभिसमन्वितः ।
मयके छोड़े हुए सायकोंसे पीड़ित हो प्रभावशाली त्वष्टा लज्जित होकर युद्ध छोड़कर भाग गये ॥ ५१½ ॥

तं तत्र हतसूतं च भुजङ्गमिव निर्विषम् ॥ ५२ ॥
त्वष्टारं विरथं कृत्वा मुदितः स तु दानवः ।
त्वष्टाको सारथि और रथसे हीन तथा विषरहित सर्पके समान शक्तिशून्य करके वह दानव बहुत प्रसन्न हुआ ॥५२½॥

विस्फार्यमाणो रुचिरं चापं रुक्माङ्गदं दृढम् ॥ ५३ ॥
रणे व्यतिष्ठद् दैत्येन्द्रो ज्वलन्निव हुताशनः ।
सोनेके कड़ेसे विभूषित सुदृढ़ एवं सुन्दर धनुषकी टङ्कार करता हुआ वह दैत्यराज रणभूमिमें प्रज्वलित अग्निके समान खड़ा था ॥ ५३½ ॥

पुलोमा तु बलश्लाघी दृप्तो दानवसत्तमः ॥ ५४ ॥
रथे श्वेतहयेनेह सार्धं युद्ध्यति वायुना ।
अपने बलकी प्रशंसा करनेवाला अभिमानी दानव-शिरोमणि पुलोमा रथपर बैठकर श्वेत अश्ववाले वायुदेवके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५४½ ॥

सर्वेषामेव भूतानां यः प्राणः कथ्यते द्विजैः ॥ ५५ ॥
बलिना कालकल्पेन वायुना सह संगतः ।
द्विजगण जिन्हें सभी प्राणियोंके प्राण कहते हैं, उन्हीं महाबली कालसदृश वायुदेवताके साथ वह जा भिड़ा ॥५५½॥

पुलोम्नस्तत्र पवनः श्रुत्वा ज्यातलनिःस्वनम् ॥ ५६ ॥
नामृष्यत यथा मत्तो गजः प्रतिगजस्वनम् ।
वायुदेव वहाँ पुलोमाके धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कार सुनकर सहन न कर सके, जैसे मतवाला हाथी अपने विरोधी हाथीकी गर्जनाको नहीं सहन कर पाता है ॥ ५६½ ॥

दैत्यचापच्युतैर्बाणैः प्राच्छाद्यन्त दिशो दश ॥ ५७ ॥
रश्मिजालैरिवार्कस्य विततं साम्बरं जगत् ।
जैसे सूर्यके किरण-जालसे आकाशसहित विस्तृत जगत् आवृत हो जाता है, उसी प्रकार पुलोमा दैत्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा दसों दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ ५७½ ॥

स ताम्रनयनः क्रुद्धः श्वसन्निव महोरगः ॥ ५८ ॥
वृतो दैत्यशतैर्वायु रश्मिवानिव भास्करः ।
फुफकारते हुए महान् सर्पकी भाँति कुपित हुए वायुदेवके नेत्र ताँबेके समान लाल हो रहे थे । वे सैकड़ों दैत्योंसे घिरकर अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५८½ ॥

दैत्यचापभुजोत्सृष्टाः शरा बर्हिणवाससः ॥ ५९ ॥
रुक्मपुङ्खाः प्रकाशन्ते हंसाः श्रेणीकृता इव ।
दैत्यके धनुष और बाहुबलसे छोड़े गये मोरपङ्खवाले बाण, जिनमें सोनेके पर लगे हुए थे, श्रेणीबद्ध हंसोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ५९½ ॥

चापध्वजपताकाभ्यः शस्त्रा दीप्तमुखाश्च्युताः॥ ६० ॥
प्रपतन्तः स्म दृश्यन्ते दैत्यस्यापततः शराः ।
उस आक्रमणकारी दैत्यके धनुष, ध्वज और पताकाओंसे छूटे हुए प्रदीप्त मुखवाले शस्त्र एवं बाण सब ओर गिरते दिखायी देते थे ॥ ६०½ ॥

एवं सुतीक्ष्णान् खचरान्शलभानिव पावके ॥ ६१ ॥
सुवर्णविकृतांश्चित्रान् मुमोच दितिजः शरान् ।
इस प्रकार दैत्यने आगमें गिरनेवाले शलभोके समान बहुत-से तीखे, सुवर्णनिर्मित, विचित्र एवं आकाशमें विचरनेवाले बाण छोड़े ॥ ६१½ ॥

तमन्तकमिब क्रुद्धमापतन्तं च मारुतः ॥ ६२ ॥
त्यक्त्वा प्राणानतिक्रम्य विव्याध नवभिः शरैः ।
क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान उस दैत्यको अपनी ओर आते देख वायुने प्राणोंका मोह छोड़कर उसे नौ बाणोंसे बींध डाला ॥ ६२½ ॥

तस्य वेगमसंहार्यं दृष्ट्वा वायुः सनातनः ॥ ६३ ॥
उत्तमं जबमास्थाय व्यधमत् सायकव्रजान् ।
पुलोमाका वेग अनिवार्य देख सनातन वायुदेवने उत्तम वेगका आश्रय ले उसके समस्त सायकसमूहोंका विध्वंस कर डाला ॥ ६३½ ॥

तेजो विधम्य बलवाञ्छरजालानि मारुतः ॥ ६४ ॥
विव्याध दैत्यं विंशत्या विशिखैर्नतपर्वभिः ।
उसके तेज और बाणसमूहोंका नाश करके बलवान् वायुदेवने उस दैत्यको झुकी हुई गाँठवाले बीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६४½ ॥

मरुद्गणानां प्रवरा दश दिव्या महौजसः ॥ ६५ ॥
साधु साध्विति वेगेन सिंहनादं प्रचक्रिरे ।
यह देखकर मरुद्गणोंमें श्रेष्ठ जो दस दिव्य महातेजस्वी पुरुष थे, उन्होंने 'साधु ! साधु ! ( वाह ! वाह ! )' कहकर बड़े वेगसे सिंहनाद किया ॥ ६५½ ॥

तस्मिन् समुत्थिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे ॥ ६६ ॥
अभ्यधावन्त दितिजाः पौलोमाः क्रोधमूर्च्छिताः।
उस रोमाञ्चकारी भयंकर सिंहनादके प्रकट होनेपर पौलोम नामवाले दैत्य क्रोधसे मूर्च्छित होकर दौड़े ॥ ६६½॥

ते समासाद्य पवनं समावृण्वञ्छरोत्तमैः ॥ ६७ ॥
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकाः ।
उन्होंने वायुके पास पहुँचकर उन्हें अपने उत्तम बाणोंसे