भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 933

भविष्यपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०९

चिच्छेद बाणांस्त्वष्टा ताञ्ज्वलितैर्नतपर्वभिः ।
दैत्यस्य सुमहावेगैः सुवर्णविकृतैः शरैः ॥ ३३ ॥
परंतु त्वष्टाने सुवर्णनिर्मित, झुकी हुई गाँठवाले, प्रज्वलित तथा महान् वेगशाली सायकोंद्वारा दैत्यके उन बाणोंको काट डाला ॥ ३३ ॥

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे ।
शार्दूलाविव चान्योन्यं प्रसक्तावभिजघ्नतुः ॥ ३४ ॥
वे दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़ने और गर्जनेवाले दो साँड़ों तथा, परस्पर उलझे हुए दो बाघोंके समान एक-दूसरेपर आघात करने लगे ॥ ३४ ॥

अन्योन्यं प्रतियुध्यन्तावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ क्रुद्धावाशीविषाविव ॥ ३५ ॥
वे एक दूसरेके वधकी इच्छासे परस्पर लड़ते थे और क्रोधमें भरे हुए दो विषधर सर्पोंके समान एक-दूसरेकी ओर देखते थे ॥ ३५ ॥

महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् ।
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ ३६ ॥
जैसे दो बड़े-बड़े हाथी परस्पर भिड़कर दाँतोंके अग्र-भागोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों धनुषको पूरा-पूरा तानकर छोड़े गये बाणोंद्वारा परस्पर आघात कर रहे थे ॥ ३६ ॥

ततः सुविपुलां दीप्तां मयो रुक्माङ्गदो गदाम् ।
त्वष्ट्रि प्राहिणोद् क्रुद्धः सर्वप्राणहरां रणे ॥ ३७ ॥
तब सोनेके बाजूबंद धारण करनेवाले मयासुरने कुपित हो रणभूमिमें सबके प्राण हर लेनेवाली एक विशाल एवं दीप्तिमती गदा त्वष्टापर चलायी ॥ ३७ ॥

तया जघानातिरथस्त्वष्टुरुत्तमवाजिनः ।
गदया दानवः क्रुद्धो वज्रेणेन्द्र इवाचलान् ॥ ३८ ॥
क्रोधमें भरे हुए उस अतिरथी दानवने उस गदाके द्वारा त्वष्टाके उत्तम घोड़ोंको मार डाला; ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्र वज्रसे पर्वतोंको धराशायी कर देते हैं ॥ ३८ ॥

ततः क्रुद्धो महादैत्यः क्षुराभ्यामथ संयुगे ।
पुनर्द्वाभ्यां शराभ्यां तु निशिताभ्यां महारणे ॥ ३९ ॥
ध्वजं त्वष्टूरथं छित्त्वा सूतं निन्ये यमक्षयम् ।
महाबलान् महावेगान् सदश्वान् गदया हनत् ॥ ४० ॥
इसके बाद कुपित हुए उस महादैत्यने महासमरमें पुनः दो पैने 'क्षुर' नामक बाणोंद्वारा त्वष्टाके ध्वजको काटकर उनके सारथीको यमलोक पहुँचा दिया। उनके महाबली और महावेगशाली उत्तम घोड़ोंको तो उसने पहले ही गदासे मार डाला था ॥ ३९-४० ॥

दृष्ट्वा त्वष्टा हतं सूतमश्वांश्च विनिपातितान् ।
हताश्वं रथमुत्सृज्य सूतं च पतितं भुवि ॥ ४१ ॥
विस्फारयन् महाचापं स्थितो भूमाविवाचलः ।
त्वष्टाने जब देखा कि मेरा सारथि मारा गया और घोड़े भी धराशायी कर दिये गये, तब वे अश्वहीन रथ और धरतीपर पड़े हुए सारथिको वहीं छोड़कर अपने महान् धनुषको टंकारते हुए पृथिवीपर अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ ४१ १/२ ॥

हताश्वसूतं विरथं दृष्ट्वा रिपुमवस्थितम् ॥ ४२ ॥
जयश्रिया सेव्यमानो दीप्यमान इवानलः ।
मयः कालान्तकप्रख्यश्चापपाणिरदृश्यत ॥ ४३ ॥
घोड़े और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए शत्रुको रणभूमिमें खड़ा देख विजय-लक्ष्मीसे सेवित और अग्निके समान दीप्तिमान् मयासुर हाथमें धनुष लेकर सामने आ गया। उस समय वह काल और अन्तकके समान दिखायी दे रहा था ॥ ४२-४३ ॥

प्रादहद् देवसैन्यानि दावाग्निरिव काननम् ।
त्वष्टुः सोऽक्षिपतात्युग्रान् नाराचांस्तिग्मतेजसः ॥ ४४ ॥
चतुर्दश शिलाधौतान् सायकान् विविधाकृतीन् ।
जैसे दावानल वनको जला देता है, उसी प्रकार वह देवताओंकी सेनाओंको दग्ध करने लगा। उसने त्वष्टापर प्रचण्ड तेजवाले अत्यन्त उग्र नाराच चलाये। साथ ही सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए विभिन्न रूप-रंगवाले चौदह सायकोंका प्रहार किया ॥ ४४ १/२ ॥

ते पपुस्तस्य सैन्यस्य शोणितं रुक्मभूषणाः ॥ ४५ ॥
आशीविषा इव क्रुद्धा भुजङ्गाः कालचोदिताः ।
जैसे कालसे प्रेरित हुए विषधर सर्प कुपित हो किसीका रक्त पीते हों, उसी प्रकार वे सुवर्णभूषित बाण उनकी सेनाका रक्त पान करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

ते क्षितिं समवर्तन्त शोभन्ते रुधिरोक्षिताः ॥ ४६ ॥
अर्द्धप्रविष्टाः संरब्धा बिलानीव महोरगाः ।
वे खूनसे भीगे हुए बाण पृथ्वीपर गिरकर उसमें धँस गये और बिलमें आधे घुसे हुए रोषभरे महान् सर्पोंके समान शोभा पाने लगे ॥ ४६ १/२ ॥

तं प्रत्यविध्यत् त्वष्टा तु जाम्बूनदविभूषितैः ॥ ४७ ॥
चतुर्दशभिरत्युग्रैर्नाराचैरभिदारयन् ।
तब त्वष्टाने सुवर्णभूषित अत्यन्त उग्र चौदह नाराचों-द्वारा मयासुरको विदीर्ण करते हुए घायल कर दिया ॥ ४७ १/२ ॥

ते तस्य दैत्यस्य भुजं सव्यं निर्भिद्य पत्रिणः ॥ ४८ ॥
विशर्य विविशुर्भूमिं पन्नगा इव वेगतः ।
वे पक्षधारी बाण उस दैत्यकी बायीं भुजाको विदीर्ण करके सर्पोंके समान वेगपूर्वक पृथ्वीमें घुस गये ॥ ४८ १/२ ॥

ते प्रकाशन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुन्धराम् ॥ ४९ ॥
अस्तं गच्छन्तमदित्यं प्रविशन्त इवांशवः ।
पृथ्वीमें प्रवेश करते हुए वे नाराच अस्ताचलको जाते