भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 932
९०८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तौच्छादयन्तावन्योन्यं समरे निशितैः शरैः।
शरजालावृतं व्योम चक्रतुश्च महाबलौ ॥ १६ ॥
उन दोनों महाबली योद्धाओंने समराङ्गणमें पैने बाणोंसे एक दूसरेको आच्छादित करते हुए आकाशको बाणोंके जालसे ढक दिया ॥ १६ ॥

तावन्योन्यं जिघांसन्तौ शरैस्तीक्ष्णैर्महारथौ।
प्रेक्षणीयतमावास्तां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥ १७ ॥
तीखे बाणोंसे एक दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे दोनों महारथी वीर वर्षा करनेवाले मेघोंके समान परम दर्शनीय हो रहे थे ॥ १७ ॥

सुवर्णविकृतान् बाणान् प्रमुञ्चन्तावरिन्दमौ ।
भास्कराभं तदाकाशमुल्काभिरिव चक्रतुः ॥ १८ ॥
सुवर्णनिर्मित बाणोंकी वर्षा करते हुए उन दोनों शत्रु-दमन वीरोंने उस समय आकाशको सूर्यके समान प्रकाशमान तथा उल्काओंसे व्याप्त-सा कर दिया ॥ १८ ॥

तयोः शराः प्रकाशन्ते देवदानवयोरतदा।
पङ्क्तयः शरदि मत्तानां सारसानामिवाम्बरे ॥ १९॥
देवता धर और दानव नमुचि दोनोंके बाण उस समय आकाशमें ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो शरद्-ऋतुमें मतवाले सारसोंकी पंक्तियाँ उड़ी जा रही हों ॥ १९ ॥

त्रिदशाश्वगजानां हि शरीरैर्गतजीवितैः।
क्षणेन संवृता भूमिर्मेघैरिव नभस्तलम् ॥ २० ॥
जैसे बादल आकाशको ढक लेते हैं, उसी प्रकार देवताओंके घोड़े और हाथियोंके निर्जीव शरीरोंसे वहाँकी भूमि क्षणभरमें पट गयी ॥ २० ॥

ततः सुधारं ज्वलितं सूर्यमण्डलसन्निभम् ।
धराय वसवे मुक्तं चक्रं नमुचिना रणे ॥ २१ ॥
तदनन्तर रणभूमिमें नमुचिने सूर्यमण्डलके समान प्रज्वलित और तीखी धारवाला चक्र धर नामक वसुको लक्ष्य करके छोड़ दिया ॥ २१ ॥

पतता तेन चक्रेण धरस्य स्यन्दनोत्तमः ।
सध्वजः सायुधः साश्वो दग्धोऽर्ककिरणप्रभः॥ २२ ॥
गिरते हुए उस चक्रने धरके सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशमान उत्तम रथको ध्वज, आयुध और घोड़ोंसहित जलाकर भस्म कर दिया ॥ २२ ॥

स त्यक्त्वा स्यन्दनं देवः प्रदीप्तं चक्रतेजसा ।
भयात् तस्यासुरेन्द्रस्य गतः स्वगृहमुत्तमम् ॥ २३ ॥
चक्रके तेजसे जलते हुए उस रथको त्यागकर धर देवता असुरेश्वर नमुचिके भयसे अपने उत्तम घरको भाग गये ॥२३॥

पराजित्य सुरं दैत्यो नमुचिर्बलगर्वितः ।
प्रयातः स्वेन सैन्येन भूयः सुरचमू प्रति ॥ २४ ॥
इस प्रकार वसु देवताको पराजित करके बलके घमंडसे भरा हुआ दैत्य नमुचि पुनः अपनी सेनाके साथ देवसेनाकी ओर बढ़ा ॥ २४ ॥

यौ तौ मयश्च त्वष्टा च देवदैत्येषु विश्रुतौ ।
प्रवरौ विश्वकर्माणौ मायाशतविशारदौ ॥ २५ ॥
घोरस्तयोः सम्प्रहारः प्रावर्तत सुदारुणः ।
अन्योन्यस्पर्द्धिनोस्तत्र चिरात्प्रभृति संयुगे ॥ २६ ॥
देवताओं और दैत्योंमें जो विख्यात मय और त्वष्टा हैं, वे दोनों श्रेष्ठ विश्वकर्मा कहे गये हैं। दोनों ही सैकड़ों मायाओंके विशेषज्ञ हैं। उन दोनोंमें वहाँ अत्यन्त दारुण और घोर युद्ध आरम्भ हो गया। वे चिरकालसे युद्धके लिये एक दूसरेके प्रति स्पर्धा रखते चले आ रहे थे ॥ २५-२६॥

त्वष्टा तु निशितैर्बाणैर्दैत्यं तु बलदर्पितम् ।
पराक्रान्तं पराक्रम्य विव्याध त्रिशतैः शरैः ॥ २७ ॥
त्वष्टाने बलके घमंडमें भरे हुए पराक्रमी दैत्य मयको पराक्रमपूर्वक तीन सौ तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥२७॥

मयस्तु प्रतिविव्याध त्वष्टारं निशितैः शरैः ।
सुघातैः सुप्रसन्नाग्रैः शातकुम्भविभूषितैः ।
ननाद दितिजश्रेष्ठो हतस्त्वष्टुः शरैर्मयः ॥ २८ ॥
तब मयने भी त्वष्टाको अपने पैने बाणोंका निशाना बनाया। मयासुरके वे बाण अच्छी तरह चोट करनेवाले तथा सुवर्णसे विभूषित थे। उनके अग्रभाग स्वच्छ एवं चमकीले थे। फिर त्वष्टाके बाणोंसे घायल हुए दैत्यप्रवर मयासुरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ २८ ॥

संक्रुद्धो दैत्यसैन्यस्य विचिन्वन्निव जीवितम् ।
शक्तिं कनकवैडूर्य्यचित्रदण्डां महाप्रभाम् ॥ २९ ॥
देवो गृहीत्वा समरे दैत्येन्द्रं समपातयत् ।
यह देख त्वष्टा अत्यन्त कुपित हो उठे और दैत्यसेनाके प्राणोंका चयन-सा करने लगे। उन्होंने सुवर्ण और वैदूर्य-मणिसे जटिल विचित्र दण्डवाली, अत्यन्त प्रभासे परिपूर्ण शक्ति हाथमें लेकर उसे समराङ्गणमें उस दैत्यराजपर दे मारा ॥

भीमां सर्वायसीं दृष्ट्वा पुरंदर इवाशनिम् ॥ ३० ॥
तां त्वष्टुर्भुजनिर्मुक्तामर्कवैश्वानरप्रभाम् ।
मयश्चिच्छेद तीक्ष्णाग्रैस्तूर्णं सप्तभिराशुगैः ॥ ३१ ॥
वह भयंकर शक्ति सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी। जैसे देवराज इन्द्रने वज्र चलाया हो, उसी प्रकार त्वष्टाके हाथोंसे छूटी हुई सूर्य और अग्निके समान प्रभावली उस शक्तिको आती देख मयासुरने तीखे अग्रभागवाले सात शीघ्र-गामी बाणोंद्वारा तुरंत ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥

ततः क्षुण्वन्निव प्राणांस्त्वष्टुः कोपान्महासुरः ।
प्रेषयामास संरब्धः शरान् बर्हिणवाससः ॥ ३२ ॥
तब उस महान् असुरने कुपित हो मानो त्वष्टाके प्राण लेनेको उद्यत होकर उनके ऊपर रोषपूर्वक मोरपंख लगे बाणोंका प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥