भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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भविष्यपर्व ] | पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ९०७

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नमुचिद्वारा धर नामक वसुकी, मयासुरद्वारा त्वष्टाकी, वायुदेवद्वारा पुलोमाकी, हयग्रीवद्वारा पूषा देवताकी, शम्बरासुरद्वारा भगकी तथा चन्द्रदेवद्वारा समूची दैत्यसेनाकी पराजय

वैशम्पायन उवाच

पुनरेव तु तत्रासीन्महायुद्धं सुदारुणम्।
क्रुद्धस्य नमुचेश्चैव धरस्य च महात्मनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! वहाँ पुनः क्रोधमें भरे हुए नमुचि और महात्मा धरका अत्यन्त भयंकर महान् युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥

संरब्धौ च महाबाहू महेष्वासावरिंदमौ ।
परस्परमुदैक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ॥ २ ॥
दोनों ही महाबाहु, महाधनुर्धर और शत्रुदमन वीर थे । वे दोनों क्रोधसे भरकर एक दूसरेको इस तरह देखने लगे, मानो नेत्रोंद्वारा दग्ध कर देंगे ॥ २ ॥

विस्फार्य च महाचापं हेमपृष्ठं दुरासदम् ।
संरम्भात् स वसुश्रेष्ठस्त्यक्त्वा प्राणानयुध्यत ॥ ३ ॥
वसुश्रेष्ठ धर जिसके पृष्ठभागमें सोना जड़ा हुआ था, उस दुर्जय एवं विशाल धनुषको फैलाकर और प्राणोंका मोह छोड़कर क्रोधपूर्वक युद्ध करने लगे ॥ ३ ॥

स सायकमयैर्जालैर्धरो दैत्यरथं प्रति ।
भानुमद्भिः शिलाधौतैर्भानोः प्राच्छादयत् प्रभाम् ॥ ४॥
धरने शिलापर तेज किये हुए तेजस्वी बाणोंका जाल-सा बिछाकर दैत्य नमुचिके रथको तथा सूर्यके प्रकाशको भी ढक दिया ॥ ४ ॥

ततः प्रहस्य नमुचिर्धरस्य च शिलाशितान् ।
असृजत् सायकान् दीप्तान् भीमवेगान् दुरासदान् ॥५॥
तब नमुचिने हँसकर धरके ऊपर भी भयंकर वेगशाली दुर्जय बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । वे सभी बाण सानपर चढ़ाकर तेज किये गये और तेजस्वी थे ॥ ५ ॥

महातेजा महाबाहुर्महावेगो महारथः ।
विव्याधातिबलो दैत्यो नवभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
महातेजस्वी, महान् वेगशाली, महारथी और अत्यन्त बलशाली महाबाहु दैत्य नमुचिने नौ पैने बाणोंसे धरको घायल कर दिया ॥ ६ ॥

स तोत्रैरिव मातङ्गो वार्यमाणः पतत्त्रिभिः ।
अभ्यधावच्च संक्रुद्धो नमुचिं वसुसत्तमः ॥ ७ ॥
जैसे अंकुशोंसे हाथीको रोका जाय, उसी प्रकार बाणोंद्वारा रोके जाते हुए वसुशिरोमणि धरने अत्यन्त कुपित होकर नमुचिपर धावा किया ॥ ७ ॥

तमापतन्तं वेगेन संरम्भान्नमुची रणे ।
दैत्यः प्रत्यसरद् देवं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ८ ॥
उन्हें क्रोधपूर्वक वेगसे आते देख रणभूमिमें नमुचि नामक दैत्य उन वसु देवताका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा, ठीक उसी तरह जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथीके साथ भिड़नेके लिये आगे बढ़ता है ॥ ८ ॥

ततः प्राध्मापयच्छङ्खं भेरीशतनिनादिनम् ।
विक्षोभ्य तद्बलं हर्षादुद्भूतार्णवसप्रभम् ॥ ९ ॥
अश्वानृक्षसवर्णामान् हंसवर्णैः सुवाजिभिः ।
मिश्रयन् समरे दैत्यो वसुं प्राच्छादयच्छरैः ॥ १० ॥
तदनन्तर दैत्यने शङ्ख बजाया, जो सौ भेरियोंके समान गम्भीर घोष करनेवाला था । उसने हर्षसे उमड़ते हुए समुद्रके समान देवताओंकी सेनाको क्षोभमें डालकर अपने रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको धरके हंसकी-सी कान्तिवाले उत्तम घोड़ोंके साथ मिलाते हुए समराङ्गणमें बाणोंद्वारा वसुको आच्छादित कर दिया ॥ ९-१० ॥

समाश्रिष्टावथान्योन्यं वसुदानवयो रथौ ।
दृष्ट्वा प्राकम्पत मुहुस्त्रिदशानां महद्बलम् ॥ ११ ॥
वसु और दानवके रथोंको एक दूसरेसे सटा हुआ देख देवताओंकी विशाल सेना बारंबार काँपने लगी ॥ ११ ॥

क्रोधसंरम्भताम्राक्षौ प्रेक्षमाणौ मुहुर्मुहुः ।
गर्जन्ताविव शार्दूलौ प्रभिन्नाविव वारणौ ॥ १२ ॥
उन दोनोंके नेत्र रोषावेशसे लाल हो रहे थे । वे दोनों दो बाघों और मदकी धारा बहानेवाले दो हाथियोंके समान एक दूसरेकी ओर देख-देखकर बारंबार गर्जना करते थे ॥

यमराष्ट्रोपमं रौद्रमासीदायोधनं तयोः।
रथाश्वनरसम्बाधं मत्तवारणसंकुलम् ॥ १३ ॥
उन दोनोंका भयंकर युद्ध यमराजके राज्यके समान प्रतीत होता था । वह युद्धस्थल रथ, घोड़े और मनुष्योंसे भरा हुआ तथा मतवाले हाथियोंसे व्याप्त था ॥ १३ ॥

समाजमित्र तं दृष्ट्वा प्रेक्षमाणा महारथाः ।
आशंसन्तो जयं ताभ्यां योधा नैकशतसंख्याः ॥ १४ ॥
उन दोनोंका युद्ध समाज (रंगशालामें होनेवाली क्रीडा) के समान दर्शनीय हो गया था । उसे देखते हुए उभयपक्षीय महारथी योद्धा उन दोनोंमेंसे एककी जय मनाते थे (देवता देवताकी और दैत्य दैत्यकी विजय चाहते थे ) ॥

तयोः प्रैक्षन्त संरम्भं संनिकृष्टं महारथयोः ।
सिद्धगन्धर्वमुनयो देवदानवयोस्र्तदा ॥ १५ ॥
उन महान् अस्त्रधारी देवता और दानव दोनों वीरोंके निकटसे होनेवाले रोषपूर्ण संग्रामको सिद्ध, गन्धर्व और मुनि देख रहे थे ॥ १५ ॥