विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 930, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९०६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंश
समान तेजस्वी था। दूसरे वैश्वानर (अग्नि) के समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ६६ ½ ॥
पिबन्निव शरौघांस्तान् देवचापसमुच्छ्रितान् ॥ ६७ ॥
अभ्यद्रवत दैत्येन्द्रो महार्णव इवापरः।
वह दैत्यराज देवताओंके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंको पीता हुआ-सा उनकी ओर दौड़ा। वह दूसरे महासागरके समान वेगशाली प्रतीत होता था ॥ ६७ ½ ॥
अवसृर्जन् दिशः सर्वाः स्वेन वीर्येण दानवः॥ ६८ ॥
अरुणत् त्रिदशान् दैत्यः सिन्धुवेगान् नगा इव।
जैसे पर्वत समुद्रके वेगको भग्न कर देते हैं, उसी प्रकार उस दानव अथवा दैत्य वलाकने अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए अपने बल-पराक्रमसे समस्त देवताओंकी प्रगति भग्न कर दी ॥ ६८ ½ ॥
समुद्रस्तरसाम् देवान् वायुर्वृक्षानिवौजसा ॥ ६९ ॥
दमयंश्च महेष्वासान् वसुभ्यां समसज्जत ।
समुद्र नामक दैत्य जैसे वायु अपने बलसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार अपने वेगसे महाधनुर्धर देवताओंका दमन करता हुआ आप और अनिल नामक दो वसुओंके साथ युद्ध करने लगा ॥ ६९ ½ ॥
आपश्चैवानिलश्चैव ववर्षतुररिंदमौ ॥ ७० ॥
शरवर्षाणि दीप्तानि मेघाविव परंतपौ ।
क्षिपंस्तान् विशिखान् दीप्तानन्तरिक्षे स चिच्छिदे॥७१॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले परंतप आप और अनिल दोनों वसुओंने दो मेघोंके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी; परंतु उस दैत्यने उनके चलाये हुए उन तेजस्वी बाणोंको आकाशमें ही काट गिराया ॥ ७०-७१ ॥
अमृष्यमाणस्तत्कर्म ध्रुवस्तमभिदुद्रुवे ।
तौ पृथक्शरवर्षाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ ७२ ॥
उसके उस कर्मको ध्रुव सहन न कर सके; अतः उन्होंने उसपर धावा कर दिया। फिर वे दोनों वीर पृथक् पृथक् बाण-वर्षा करके एक-दूसरेको घायल करने लगे ॥७२॥
उत्तमाभिज नौ शूरौ देवदैत्यौ यशस्करौ ।
तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ ॥ ७३ ॥
रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्चाप्यकृन्तताम् ।
निर्भिन्दन्तौ च गात्राणि विलिखन्तौ च सायकैः ॥ ७४ ॥
वे देवता और दैत्य दोनों शूरवीर, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा यशस्वी थे। जैसे दो बाघ नखोंसे और दो महान् गज राज दाँतोंसे एक दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर रथ-शक्तियों और बाणोंद्वारा एक दूसरेको क्षत विक्षत करने लगे। वे अपने अपने सायकोंद्वारा प्रतिपक्षीके अंगोंको विदीर्ण एवं घायल करने लगे ॥ ७३-७४ ॥
स्तम्भयन्तौ च बलिनौ प्रतुदन्तौ स्थितौ रणे ।
चरन्तौ विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भागशः ॥७५॥
दोनों बलवान् थे; अतः दोनों ही रणभूमिमें स्थित होकर एक दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकते और पीड़ित करते हुए युद्धके विविध मागोंमे विचरते और पृथक् पृथक् पैंतरे दिखाते थे ॥ ७५ ॥
मुद्गरैर्जघ्नतुः क्रुद्धावन्योन्यमभिमानिनौ ।
असिभ्यां चर्मणी दिव्ये विपुले च शरासने ॥ ७६ ॥
निकृत्याचलसंकाशौ बाहुयुद्धं प्रचक्रतुः ।
इसके बाद वे दोनों अभिमानी वीर कुपित होकर परस्पर मुद्गरोंकी मार करने लगे। दोनों ही तलवारोंसे दोनोंके दिव्य ढाल और विशाल धनुष काटकर पर्वतके समान खड़े हो परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे ॥ ७६ ½ ॥
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ ॥ ७७ ॥
बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिवैरिव ।
दोनोंकी ही छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे; अतः लोहेके बने हुए परिघों-के समान अपनी मोटी एवं बलिष्ठ भुजाओं द्वारा वे एक दूसरेसे गुथ गये ॥ ७७ ½ ॥
तयोरासीद् भुजाघातैर्निग्रहः प्रग्रहस्तथा ॥ ७८ ॥
अतीव भीमः संह्रादो वज्रपर्वतयोरिव ।
उन दोनों में भुजाओंके आघातसे निग्रह और प्रग्रहके दाँव-पेंच चलने लगे। उस समय वज्र और पर्वतके टकरानेके समान अत्यन्त भयंकर शब्द होता था ॥ ७८ ½ ॥
द्विपाविव विषाणाग्रैः शृङ्गैरिव महावृषौ ॥ ७९ ॥
अन्योन्यमभिसंरब्धौ मुहूर्तं पर्यकर्षताम् ॥ ८० ॥
जैसे दो हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे तथा दो बड़े-बड़े साँड़ अपने सींगोंसे प्रहार करते हुए लड़ते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधपूर्वक दो घड़ीतक एक दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे ॥ ७९-८० ॥
ततः पराजितो देवो वलाकेन तथा ध्रुवः।
रथं त्यक्त्वा भयात् तस्य प्रणष्टः प्राङ्मुखो द्रुतः॥ ८१ ॥
तदनन्तर वसुदेवता ध्रुव वलाक नामक दैत्यसे पराजित हो रथ छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग गये ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे देवासुरयुद्धे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें देवताओं और असुरोंका युद्धविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥