विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 929, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ९०५
धार बहुत ही तीखी और पुष्ट थी। वह निर्मल एवं विशाल खङ्ग तेज होनेके साथ ही चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था ॥ ४९-५० ॥ तं गृहीत्वा रणमुखे प्रज्वलन्तं महाप्रभम् । वाणाभ्याशे महातेजाः खङ्गपाणिरवस्थितः ॥ ५१ ॥ युद्धके मुहानेपर उस प्रज्वलित होनेवाले महान् कान्तिमान् खङ्गको हाथमें लेकर महातेजस्वी सावित्र वाणासुरके निकट खड़े हो गये ॥ ५१ ॥ स तं स्थितमथालक्ष्य सावित्रं बलिनन्दनः । लोहिताक्षं महाकायं चिक्षेप च ननाद च ॥ ५२ ॥ सावित्रकी आँखें लाल और काया विशाल थी। उन्हें इस प्रकार खड़ा हुआ देख बलिनन्दन बाणासुरने उनके प्रति आक्षेप और सिंहनाद किया ॥ ५२ ॥ ततोऽर्ककिरणाकारानशनिप्रतिमाञ्छितान् । संदधे चाशु बाणौघानाशीविषशिलीमुखान् ॥ ५३ ॥ तदनन्तर उसने सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, अशनिके सदृश तीखे और विषधर सर्पोंकी भाँति विषैले बाणसमूहोंका शीघ्र ही संधान किया ॥ ५३ ॥ रुक्मपुङ्खान प्रदीप्ताग्रानुग्रवेगानलंकृतान् । आकर्णपूरान्प्रिक्षेप शरानुग्रान् समन्ततः ॥ ५४ ॥ उनमें सोनेके पर लगे थे। उनका अग्रभाग उद्दीप्त हो रहा था। वे भयंकर वेगशाली तथा अलंकृत थे। बाणासुरने उन उग्र बाणोंको धनुषपर रखकर उन्हें कानतक खींचकर चारों ओर बरसाना आरम्भ किया ॥ ५४ ॥ दृढचापप्रयुक्तास्ते शरा वैश्वानरप्रभाः । सावित्रं छादयामासुः कैलासमिव तोयदाः ॥ ५५ ॥ वे अग्निके समान तेजस्वी बाण सुदृढ़ धनुषद्वारा छोड़े गये थे। उन्होंने सावित्रको उसी तरह ढक लिया, जैसे बादल कैलास पर्वतको आच्छादित कर देते हैं ॥ ५५ ॥ संछाद्यमानः शस्त्रौघैर्वाणेन बलिसूनुना । पराङ्मुखः सुरवरः प्रयाततः सरथध्वजः ॥ ५६ ॥ बलिकुमार बाणासुरके शस्त्रसमूहोद्वारा इस प्रकार आच्छादित होते हुए सुरश्रेष्ठ सावित्र युद्धसे विमुख हो रथ और ध्वजसहित वहाँसे चल दिये ॥ ५६ ॥ पराजित्य स सावित्रं वाणः परमहर्षितः । प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति ॥ ५७ ॥ सावित्रको पराजित करके वाणासुर बहुत प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात् वह भयंकर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया ॥ ५७ ॥ बलश्चाप्यसुरश्रेष्ठः प्रगृह्य महतीं गदाम् । ध्रुवाय वसवे मूर्ध्नि रौद्रां चिक्षेप दानवः ॥ ५८ ॥ इधर असुरशिरोमणि बल नामक दानवने विशाल एवं भयंकर गदा हाथमें लेकर उसे ध्रुव नामक वसुके मस्तकपर दे मारा ॥ ५८ ॥ तस्य निर्मथितं त्वंसे हेमचित्रं च वर्म वै । गदावेगेन भीमेन ध्रुवस्य समरे तदा ॥ ५९ ॥ उस समय समराङ्गणमें उस गदाके भयंकर वेगसे ध्रुवके कंधेपर स्थित सुवर्णजटित विचित्र कवच छिन्न भिन्न हो गया ॥ शेषाश्च वसवः सर्वे दिव्यास्त्रैर्घोरदर्शनैः । प्राच्छादयन् रणे दैत्यमादित्यमिव तोयदाः ॥ ६० ॥ तब शेष सभी वसुओंने घोर दिव्यास्त्रोंद्वारा रणभूमिमें उस दैत्यको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे बादल सूर्यदेवको आच्छादित कर देते हैं ॥ ६० ॥ ततः सम्मर्दितो बाणैर्बलो दानवसत्तमः । अवातरद् रथात् तस्माद् गदामुद्यम्य वेगवान् ॥ ६१ ॥ फिर तो उनके बाणोंसे रौंदा गया दानवशिरोमणि बल गदा उठाकर अपने उस रथसे वेगपूर्वक उतर पड़ा ॥ ६१ ॥ पातयामास शत्रूणां समाविध्य महासुरः । दिशः प्राद्रावयत् सर्वांस्त्रिदशान् सा महांगदा ॥ ६२ ॥ उस महान् असुरने गदाको घुमाकर उसे अपने शत्रुओंपर चला दिया। उस विशाल गदाने सम्पूर्ण देवताओंको उस समय विभिन्न दिशाओंमे भागनेको विवश कर दिया ॥ इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण प्रवृद्धा सुमहास्वना । तस्याः सविद्युद्घोषायास्तेन शब्देन वेपिताः ॥ ६३ ॥ व्यद्रवन्त परित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तदा । जैसे इन्द्रके द्वारा फेंकी गयी उनकी अशनि बड़े वेगसे आगे बढ़कर बड़ी भारी गड़गड़ाहट पैदा करती है, उसी तरह उस गदाने भी किया। बिजलीकी-सी कड़क पैदा करनेवाली उस गदाके शब्दसे कम्पित होकर उस समय देवसेनाके रथी अपने रथोंसे कूदकर भाग गये ॥ ६३॥ तदुदीर्णं रथानीकं सूर्याभं मेघनिःस्वनम् ॥ ६४ ॥ देवानां शरधाराभिः समन्तादभ्यवर्षत । तब सूर्यके समान तेजस्विनी और मेघोंके समान गर्जना करनेवाली देवताओंकी उस प्रचण्ड रथ-सेनापर बलने चारों ओरसे बाणधाराकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ६४॥ क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्र्तैः शिलीमुखैः ॥ ६५ ॥ मुहुर्मुहुर्महातेजाः प्रत्यविध्यन्महासुरः । वह महातेजस्वी महान् असुर देवताओंको क्षुरप्र, विशिख, भल्ल, वत्सइन्त तथा शिलीमुख नामक बाणोंद्वारा बारंबार घायल करने लगा ॥ ६५॥ बलकस्तु गदापाणिर्व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ६६ ॥ तडिद्रङ्गार्कसदृशो वैश्वानर इवापरः । बलकके नामक दैत्य हाथमें गदा लेकर मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ता था। वह विद्युत् और सूर्यके