भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 928
९०४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

चारु विभ्राजिरे तत्र तेष्वनीकेषु भागशः ॥ ३३ ॥
उन सेनाओंमें पृथक्-पृथक् ऋष्टि, खड्ग, गदा, तीखे शूल, शक्ति और फरसे चमक रहे थे, जो अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे ॥ ३३ ॥

रथा बहुविधाकाराः शतशोऽथ सहस्रशः ।
हेमप्रच्छन्नशिखरा ज्वलन्त इव पावकाः ॥ ३४ ॥
नाना प्रकारकी आकृतिवाले सैकड़ों और हजारों रथ जिनके ऊपरी भाग सोनेके पत्रसे ढके हुए थे, प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥

दानवानां सुराणां च समालोक्यन्त सैनिकाः ।
काञ्चनैः कवचैः सर्वे ज्वलितार्कसमप्रभैः ॥ ३५ ॥
संनद्धाः समदृश्यन्त ज्योतिंषीव गगने यथा ।
दीप्तिमान् सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णमय कवचोंसे सुसज्जित हुए दानवों और देवताओंके समस्त सैनिक आकाशमें तारोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३५ १/२ ॥

उद्यतैरायुधैश्चित्रैस्तलवद्धाः कलापिनः ॥ ३६ ॥
ऋषभाक्षाः सुरगणाश्चमूमुखगता बभुः ।
हाथोंमें दस्ताने बाँधे और पीठपर तरकस लिये बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले देवता सेनाके मुहानेपर ओर ऊपर उठाये हुए विचित्र आयुधोंके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे थे ॥

नानावर्णाः पताकाश्च ध्वजमालाश्च संयुगे ॥ ३७ ॥
युध्यतां रणशौण्डानामीरयामास मारुतः ।
समरभूमिमें जूझते हुए रणकुशल योद्धाओंकी बहुरंगी पताकाओं और ध्वजपंक्तियोंको वायु कम्पित कर रही थी ॥

ध्वजालंकारवस्त्राणि कवचानि च रश्मिभिः ॥ ३८ ॥
भासयामास सर्वाणि रश्मिवर्णानि रश्मिवान् ।
सैनिकोंके ध्वज, आभूषण, वस्त्र और कवच—इन सभी वस्तुओंको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे उन्हींके समान कान्तिमान् बनाकर प्रकाशित कर रहे थे ॥ ३८ १/२ ॥

सर्वेषामप्रमेयाणां वलानां पादचारिणाम् ॥ ३९ ॥
रजः प्रच्छादयामास पत्रोर्णं पाण्डुरं दिशः ।
दोनों दलोंके समस्त पैदल सैनिकोंके, जो असंख्य थे, पैरोंसे उठी हुई धुले हुए रेशमी वस्त्रके समान श्वेत धूलने समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३९ १/२ ॥

दिव्यायुधधराः सर्वे दीप्तायुधपरिच्छदाः ॥ ४० ॥
प्रतितस्तम्भिरेऽन्योन्यमनीकं प्रत्यनीकतः ।
सबने दिव्य आयुध धारण कर रखे थे; सभीके अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्र-आभूषण आदि चमकीले थे। वे आपसमें एक सेनाके लोग दूसरी सेनाके लोगोंको स्तम्भित कर देते थे (आगे नहीं बढ़ने देते थे) ॥ ४० १/२ ॥

गिरिकूटोच्छ्रयाः सर्वे तदा ते देवदानवाः ॥ ४१ ॥
अन्योन्यमभिनिघ्नन्तो रणस्थाश्चित्रयोधिनः ।
पर्वत-शिखरोंके समान ऊँचे शरीरवाले वे समस्त देवता और दानव उस समय रणभूमिमें खड़े हो एक दूसरेपर चोट करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध करने लगे ॥ ४१ १/२ ॥

बाणैः सुरुचिरैस्तीक्ष्णैः पत्रवाजैर्दुरासदैः ॥ ४२ ॥
मुद्गरैर्मुसलैः शूलैरयस्तुण्डैहलूखलैः ।
वज्रैरशनिकल्पैश्च खड्गवृक्षादिभिस्तथा ॥ ४३ ॥
तथा प्रवर्तिते तेषां विमर्देऽद्भुतविक्रमे ।
सावित्रस्य वधं प्रेप्सुर्वाणो जग्राह कार्मुकम् ॥ ४४ ॥
पंखोंसे वेगयुक्त हुए दुर्जय, तीक्ष्ण और परम सुन्दर बाण, मुद्गर, मूसल, शूल, अयस्तुण्ड, उलूखल, अशनितुल्य वज्र, खड्ग और वृक्ष आदिके द्वारा अद्भुत पराक्रम प्रकट करते हुए उन योद्धाओंमें जब इस प्रकार भीषण मारकाट हो रही थी, उसी समय सावित्रका वध करनेके लिये बाणासुरने धनुष उठाया ॥ ४२-४४ ॥

शरजालेन दिव्येन च्छादयानः सुरोत्तमम् ।
मन्त्रैर्हुत इवार्चिष्मान् सम्प्रजज्वाल तेजसा ॥ ४५ ॥
अपने दिव्य बाणोंके जालसे सुरश्रेष्ठ सावित्रको आच्छादित करता हुआ बाणासुर मन्त्रोंद्वारा घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ४५ ॥

सागराभां महासेनां देवानां दैत्यपुंगवः ।
संशोषयति बाणौघैरर्कैऽशुभिरिवार्णवम् ॥ ४६ ॥
देवताओंकी विशाल सेना समुद्रके समान थी। उसे दैत्यशिरोमणि बाणासुर अपने बाणसमूहोंद्वारा उसी प्रकार सुखाने लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा समुद्रको सुखाते रहते हैं ॥ ४६ ॥

मारुतः सुमहावेगः सावित्रः शक्तिमुत्तमाम् ।
चिक्षेप बलिपुत्राय शक्रोऽशनिमिवाद्रये ॥ ४७ ॥
तब महान् वेगशाली सावित्र नामक मारुतने बलिपुत्र बाणासुरपर उत्तम शक्ति चलायी, मानो इन्द्रने किसी पर्वत-पर वज्र फेंका हो ॥ ४७ ॥

आपतन्ती च सा शक्तिर्महोल्का ज्वलिता इव ।
द्विधा छिन्ना क्षुरप्रेण वाणेनाद्भुतकर्मणा ॥ ४८ ॥
परंतु अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरने प्रज्वलित हुई विशाल उल्काके समान अपनी ओर आती हुई उस शक्तिके एक क्षुरप्रद्वारा दो टुकड़े कर डाले ॥ ४८ ॥

हतायामथ शक्त्यां तु सावित्रो देवसत्तमः ।
विश्वकर्मकृतं दिव्यं सुतीक्ष्णं दानवार्दनम् ॥ ४९ ॥
सुपीनधारं विमलं विपुलं चन्द्रवर्चसम् ।
अङ्ग्लहान्निशितं खड्गमाशीविषमिवोरगम् ॥ ५० ॥
उस शक्तिके खण्डित हो जानेपर देवशिरोमणि सावित्रने विश्वकर्माके बनाये हुए एक दिव्य दानवदलन खड्गको हाथमें लिया, जो विषधर सर्पके समान भयंकर था। उसकी