विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 927, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०३
विरोचनश्च जम्भश्च कुजम्भश्च महाबलः।
सदस्यास्तत्र तु मखे विप्रचित्तिस्तु वीर्यवान् ॥ १७ ॥
द्वारपंक्तियाँ, इध्म और विशाल गदाएँ परिधि थीं। हयग्रीव, असिलोमा, राहु, दानव केशी, विरोचन, जम्भ, महाबली कुजम्भ और पराक्रमी विप्रचित्ति—ये उस यज्ञमें सदस्य थे ॥ १६-१७ ॥
इषवस्तु स्रुवास्तत्र रथाक्षसदृशाः शुभाः।
धनुष्कोट्या धनुर्ज्याश्च स्रुवस्तत्र महामखे ॥ १८ ॥
रथके धुरेके समान मोटे और सुन्दर बाण उस यज्ञमें स्रुवा थे। धनुषकी कोटियाँ और प्रत्यञ्चाएँ उस महायज्ञमें स्रुवका काम देती थीं ॥ १८ ॥
प्रतिप्रस्थानिकं कर्म वृषपर्वाकरोदिह ।
दीक्षितस्तत्र तु बलिस्तस्य पत्नी महाचमूः ॥ १९ ॥
वृषपर्वाने उस यज्ञमें प्रतिप्रस्थाताका कार्य किया, राजा बलि उसमें दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान थे और उनकी विशाल सेना ही उनकी पत्नी थी ॥ १९ ॥
शम्बरस्तत्र शामित्रमकरोद् दितिनन्दनः।
अतिरात्रे महाबाहुर्वितते यज्ञकर्मणि ॥ २० ॥
महाबाहु दितिनन्दन शम्बरने वहाँ चालू हुए उस अतिरात्र नामक यज्ञकर्ममें शामित्र-कर्म किया ॥ २० ॥
दक्षिणास्तस्य यज्ञस्य कालनेमिर्महासुरः।
वैताने कर्मणि विभोर्यः ख्यातो हव्यवाड़िव ॥ २१ ॥
उस यज्ञकी दक्षिणाओंके रूपमें महान् असुर कालनेमि उपस्थित था, जो अपने स्वामी बलिके यज्ञकर्ममें अग्निके समान विख्यात था ॥ २१ ॥
त्रिदशानां तु सैन्यस्य शरीरैर्गतजीवितैः।
तस्मिन् यज्ञे तु सवनं वर्धते दैत्यनिर्मितम् ॥ २२ ॥
देवताओंकी सेनाके निष्प्राण शरीरोंद्वारा उस यज्ञमें दैत्योंका किया हुआ सवनकर्म उत्तरोत्तर बढ़ रहा था ॥ २२ ॥
देवानां रुधिरं संख्ये पपुस्तेऽथ दितेः सुताः।
नर्दमानाः प्रमुदिताः सोमपानं रणाध्वरे ॥ २३ ॥
उस रणयज्ञमें भयंकर दैत्य जो देवताओंका रुधिर पान करते थे, वही मानो प्रसन्नतापूर्वक उनके द्वारा किया गया सोमपान था, वे कोलाहल करते हुए वहाँ वह सोमपान करते थे ॥ २३ ॥
यदा बलिर्महादैत्यो विजेता समरे सुरान् ।
तदा ह्यवभृथो यज्ञे भविष्यति न संशयः ॥ २४ ॥
जब महादैत्य बलि समरमें देवताओंपर विजय पा लेंगे, तब उस यज्ञकी समाप्तिपर अवभृथस्नान होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
महासुरेन्द्रपतयो यज्वानो भूरिदक्षिणाः।
वेदवन्तो वृत्तवन्तः शूराः सर्वे तनुत्यजः ॥ २५ ॥
बड़े-बड़े असुरेश्वर जो प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञकर्ता, वेदज्ञ, सदाचारी और शूरवीर थे, सब-के-सब उस युद्धमें शरीरका मोह छोड़कर लगे थे ॥ २५ ॥
त्रैलोक्यहरणे सृष्टा युद्धयज्ञाय दीक्षिताः।
बद्धकृष्णाजिनाः सर्वे व्रतिनो मुञ्जधारिणः ॥ २६ ॥
वे सब त्रिलोकीका राज्य हर लेनेके लिये उद्यत हो उस युद्धरूपी यज्ञके लिये दीक्षा ले चुके थे। उन सबने अपने शरीरमें काले मृगचर्म बाँध रखे थे। वे सभी मुञ्जकी मेखला धारण करके व्रतके पालनमें तत्पर थे ॥ २६ ॥
एकनिश्चयकार्याश्च त्रैलोक्यजयकाङ्क्षिणः।
सुरदानवदैत्यानां शब्दः समभवन्महान् ॥ २७ ॥
नानायुधविहस्तानां त्वरितानां प्रधावताम्।
एक ही निश्चित उद्देश्यको लेकर वे सभी युद्धरूपी कार्यमें संलग्न थे। सबके मनमें यही इच्छा थी कि त्रिलोकीके राज्यपर विजय प्राप्त हो जाय। नाना प्रकारके आयुध हाथमें लेकर बड़ी उतावलीके साथ रणभूमिमें तीव्रगतिसे दौड़ते हुए देवताओं, दानवों और दैत्योंका महान् कोलाहल वहाँ होने लगा ॥ २७३ ॥
क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैर्गजवृंहितनिःस्वनैः ॥ २८ ॥
रथनेमिस्वनैर्घोरैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।
योद्धाओंके सिंहनाद, उच्चस्वरसे पुकार, गर्जना, हाथियोंके चिंघाड़ने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट आदिके घोर कोलाहलसे वहाँ सब ओर तुमुलनाद छा गया ॥ २८३ ॥
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्हयहेषितनिःस्वनैः ॥ २९ ॥
हयानां हेषमाणानां दानवानां च गर्जताम् ।
क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैः पाणिपादखैस्तथा ॥ ३० ॥
शङ्ख और दुन्दुभियोंके गम्भीर घोषसे, घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाजसे, हँसते हुए अश्वों और गरजते हुए दानवोंके सिंहनादसे, उनके चीखने और चिल्लानेसे तथा उनके हाथ-पैर पटकनेसे भी वहाँ महान् कोलाहल छा रहा था ॥ २९-३० ॥
दानवानां परेषां च शस्त्रवन्ति महान्ति च ।
समरे भीमकर्माणि सैन्यानि प्रचकाशिरे ॥ ३१ ॥
दानवों और देवताओंकी विशाल सेनाएँ अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो समराङ्गणमे भयंकर कर्म करती हुई प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३१ ॥
ततो नागा रथैश्चैव जाम्बूनदविभूषिताः ।
भ्राजमाना व्यराजन्त मेघा इव सविद्युतः ॥ ३२ ॥
उस समय वहाँ सुवर्णसे विभूषित हाथी और रथ, विद्युत्सहित मेघोंके समान उद्भासित होते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ३२ ॥
ऋष्टिखड्गदास्तीक्ष्णाः शूलशक्तिपरश्वधाः ।