विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 926, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें९०२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओं और असुरोंके युद्धका यज्ञके रूपमें वर्णन, दोनों सेनाओंका तुमुल युद्ध तथा सावित्र और ध्रुवकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
उभयोः सेनयो राजन् भूयो युद्धमवर्तत।
नादेन संचालयतां त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १ ॥
गोमुखाडम्बराणां च भेरीणां मुरजैः सह।
झल्लरीडिण्डिमानां च व्यथ्यन्त महास्वनाः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! पुनः दोनों सेनाओंमें घोर युद्ध होने लगा। गोमुख, बिगुल, भेरी, ढोल, झाँझ और नगाड़ोंके बड़े भारी शब्द सुनायी देने लगे। वे बाजे अपनी तुमुल ध्वनिसे तीनों लोकोंको विचलित कर रहे थे ॥ १-२ ॥
प्रवृत्तो युद्धयज्ञस्तु तुमलो लोमहर्षणः।
रणमध्ये महानादः स्वर्गीयः शूरसम्मतः ॥ ३ ॥
वहाँ रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर युद्धयज्ञ होने लगा, जो स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला था। उस संग्राममें महान् सिंहनाद एवं आर्तनाद होता था, जो शूर-वीरोंके लिये अभिमत है ॥ ३ ॥
युद्धयज्ञस्य नेताभूत् प्रह्लादो दैत्यसत्तमः।
विरोचनस्तथाध्वर्युर्युद्धयज्ञप्रवर्तकः ॥ ४ ॥
उस युद्धयज्ञके नेता हुए दैत्यप्रवर प्रह्लाद। उनका पुत्र विरोचन उस युद्धयज्ञका प्रवर्तक अध्वर्यु हुआ ॥ ४ ॥
होता चैवात्र नमुचिर्वृत्रः स्तोत्रोपकल्पकः।
मन्त्रा दैत्याः समाख्याता यज्ञकर्मणि तत्र वै ॥ ५ ॥
इसमें नमुचि होता और वृत्रासुर प्रस्तोता हुआ। उस यज्ञकर्ममें दैत्योंको ही मन्त्र कहा गया है ॥ ५ ॥
अनुयातश्च पितरमधिको वा पराक्रमैः।
यष्टा तत्राभवद् बाणः संयुगे चोपतिष्ठते ॥ ६ ॥
जो पराक्रमद्वारा अपने पिता बलिक अनुसरण करता था अथवा पितासे बढ़कर पराक्रमी था, वह बाणासुर उस युद्धयज्ञका यजमान बना और युद्धस्थलमें बराबर उप-स्थित रहा ॥ ६ ॥
ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं स्थूणाकर्णं सुदुर्जयम्।
मन्त्रास्तत्राभ्यवर्तन्त साध्वनुह्लादयोजिताः ॥ ७ ॥
अनुह्लादके द्वारा भलीभाँति प्रयुक्त हुए ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म और अत्यन्त दुर्जय स्थूणाकर्ण नामक अस्त्र वहाँ मन्त्र थे ॥ ७ ॥
उद्गाता च मयः श्रीमान् स्थितः शत्रुभयंकरः।
विनदन् दितिजश्रेष्ठो देवानीकं व्यदारयत् ॥ ८ ॥
शत्रुओंके लिये भयंकर श्रीमान् मयासुर वहाँ उद्गाता बनकर खड़ा था। वह दैत्यशिरोमणि वीर सिंहनाद करके देवताओंकी सेनाको विदीर्ण करने लगा ॥ ८ ॥
बलिस्तु राजा द्युतिमान् स्वयं तत्र महासुरः।
जाप्यैर्होमैश्च संयुक्तो ब्रह्मत्वमकरोत् प्रभुः ॥ ९ ॥
सामर्थ्यशाली, तेजस्वी, महान् असुर राजा बलि स्वयं ही वहाँ जप-होम आदिसे युक्त हो ब्रह्माका कार्य करने लगे ॥
रणाग्निर्ज्वलितो घोरो वैरेन्धनसमीरितः।
हूयते त्वसुरैस्तत्र देवो विष्णुः सुरैः सह ॥ १० ॥
वैरके ईन्धनसे उद्दीप्त हो वहाँ युद्धकी घोर अग्नि प्रज्व-लित हुई। असुरगण देवताओंके साथ आकर उस आगमें आहुति डालने लगे। वह आहुति भगवान् विष्णुकी तृप्तिके लिये की जा रही थी ॥ १० ॥
शङ्खशब्दैः सुतुमुलैर्भेरीणां च महास्वनैः।
उद्घृष्टं विमलं चैव सुब्रह्मण्यं प्रयुज्यते ॥ ११ ॥
शङ्खोंकी तुमुल ध्वनि और भेरियोंके गम्भीर नादसे मानो वहाँ 'सुब्रह्मण्यम्' का विमल उद्घोष होता रहता था ॥ ११ ॥
वलश्च वलकश्चैव पुलोमा च महासुरः।
प्रशस्तं च समं कृत्वा सत्रं सम्यक् प्रचक्रिरे ॥ १२ ॥
वल, वलक और पुलोमा नामक महासुर इन तीनोंने वहाँ प्रशस्त एवं सम कर्म करके सम्यक्रूपसे सत्रका अनु-ष्ठान किया ॥ १२ ॥
कल्माषदण्डा विमला विपुला रथपङ्क्तयः।
यूपाश्च समकल्पन्त युद्धयज्ञे महाफले ॥ १३ ॥
उस महान् फलदायक युद्धयज्ञमें चितकबरे ईषादण्ड-वाली निर्मल एवं विशाल रथपंक्तियाँ यूपोंके रूपोंमें कल्पित हुईं ॥ १३ ॥
कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपबृंहिकाः।
तोमराः सोमकलशा विचित्राणि धनूंषि च ॥ १४ ॥
कर्णि, नालीक, नाराच, वत्सदन्त, उपबृंहिका, तोमर और विचित्र धनुष—ये ही उस यज्ञमें सोमकलश थे ॥ १४ ॥
अस्थीन्यत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च।
आज्यं च रौद्रं रुधिरं तस्मिन् यज्ञेऽभिहूयते ॥ १५ ॥
हड्डियाँ इसमें कपाल थीं, सिर पुरोडाश थे तथा भयंकर रुधिर ही घी था, जिसकी उस यज्ञमें आहुति दी जाती थी॥
इध्मः परिघयस्तत्र प्रस्तारा विपुला गदाः।
हयग्रीवोऽसिलोमा च राहुः केशी च दानवः ॥ १६ ॥