विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 925, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ९०१
धूमयुक्त भयंकर वायु चलने लगी और सारी दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं ॥ ३१ ॥
एते चान्ये च बहवो दृश्यन्ते देवनिर्मिताः ।
भूमौ तथान्तरिक्षे च महोत्पाताः समन्ततः ॥ ३२ ॥
ये तथा और भी बहुत-से देवनिर्मित बड़े-बड़े उत्पात पृथ्वी और आकाशमें सब ओर दिखायी देने लगे ॥ ३२ ॥
तद् युद्धं देवदैत्यानां भीमानां भीमदर्शनम् ।
अपश्यत गुरुर्ब्रह्मा सर्वैरेव सुरैः सह ॥ ३३ ॥
भीषण देवताओं और दैत्योंका वह युद्ध देखनेमें बड़ा भयंकर था। लोकगुरु ब्रह्माजीने समस्त देवताओंके साथ उस युद्धको देखा ॥ ३३ ॥
वेदैश्चतुर्भिः साङ्गैश्च विद्याभिश्च सनातनः ।
पद्मयोनिर्वृतः श्रीमान् सिद्धैश्च परमर्षिभिः ॥ ३४ ॥
छहों अङ्गोंसहित चारों वेदों तथा चारों विद्याओंसे घिरे हुए सनातन पद्मयोनि ब्रह्माजीको सिद्ध और महर्षिगण सब ओरसे घेरकर खड़े थे ॥ ३४ ॥
नानामणिस्तम्भसहस्रचित्र-
मारुह्य यानं ददृशे स्वयम्भूः ।
सुभास्वरं भूतसहस्रयुक्तं
प्रदीप्यमानो वपुषा वरेण ॥ ३५ ॥
नाना प्रकारके सहस्रों मणिमय खम्भोंसे विचित्र शोभा पानेवाले तथा सहस्रों भूतगणोंसे जुते हुए तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो स्वयंभू ब्रह्माजी अपने श्रेष्ठ शरीरसे देदीप्यमान दिखायी दे रहे थे ॥ ३५ ॥
सुतप्तजाम्बूनदभक्तिचित्र-
मानन्दभेरीशतसम्प्रणादम् ।
नक्षत्रचण्डांशुभिरंशुमन्तं
वैदूर्यसोमार्कविभूषिताङ्गम् ॥ ३६ ॥
उनका विमान तपाये हुए सुवर्णद्वारा निर्मित विभिन्न चित्र-मूर्तियोंसे सुशोभित था। उसमें सहस्रों भेरियोंका आनन्दमय शब्द गूँजता रहता था। नक्षत्रों तथा सूर्यकी तेजोमयी मूर्तियोंके कारण वह किरणोंकी प्रभासे परिपूर्ण था और वैदूर्यमणि तथा चन्द्रकान्त एवं सूर्यकान्त मणियोंसे (अथवा सूर्य एवं चन्द्रमाकी मूर्तियोंसे) उस विमानका प्रत्येक अङ्ग विभूषित था ॥ ३६ ॥
तमात्मजा वै पुलहः पुलस्त्य-
स्तथा मरीचिर्भृगुरङ्गिराश्च ।
ऋक्सामभिः सम्यगभिष्टुवन्तः
सेवन्ति देवं वरदं विमाने ॥ ३७ ॥
उस समय विमानपर बैठे हुए वरदायक देवता ब्रह्माजीकी, उन्हींके पुत्र पुलह, पुलस्त्य, मरीचि, भृगु तथा अङ्गिरा ऋषि ऋग्वेद एवं सामवेदके मन्त्रोंद्वारा सम्यक् रूपसे स्तुति करते हुए उनकी सेवामें तत्पर थे ॥ ३७ ॥
तं पावका लोकगुरुं स्वयंभुवं
साङ्गाश्च वेदा मखदेवताश्च ।
सेवन्ति देवं भुवनेश्वराणां
भूतानि चान्यानि महानुभावम् ॥ ३८ ॥
उन लोकगुरु, महानुभाव, भुवनेश्वरोश्वर देवता स्वयम्भू ब्रह्माजीकी सेवामें अग्नि, साङ्ग वेद, यज्ञदेवता तथा अन्यान्य भूत (प्राणी) भी संलग्न थे ॥ ३८ ॥
एते बभूवुश्च महर्षिसंघा
वैश्वानराः पावकयोनयश्च ।
सर्वे ययुर्देवपुरोहिताश्च
युद्धोत्सुकाः सर्वसुरासुराणाम् ॥ ३९ ॥
महर्षियोंके समुदाय, वैश्वानरगण, अग्निसे जिनकी उत्पत्ति हुई है, वे ऋषि तथा देवताओंके समस्त पुरोहित—ये सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके उस युद्धको देखनेके लिये उत्सुक हो वहाँ उपस्थित हुए थे ॥ ३९ ॥
योगेश्वराः षट् च दिवाकराभा
विभूषणैर्भूषितसर्वदेहाः ।
अन्तर्हिता वै ददृशुर्नभःस्था
नारायणश्चैव नरश्च देवाः ॥ ४० ॥
छः योगेश्वर (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, कपिल और जैगीषव्य), जो सूर्यके समान तेजस्वी थे और सारे अङ्गोंमें उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूषित भी थे, अदृश्य भावसे आकाशमें खड़े हो उस युद्धका दृश्य देख रहे थे। भगवान् नारायण, नर तथा कतिपय देवता भी अदृश्य भावसे उस युद्धका अवलोकन करते थे ॥ ४० ॥
वक्त्रैश्चतुर्वेदधरैश्चतुर्भिः
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमैः सुकान्तैः ।
सर्वा दिशो निस्तिमिरान्धकार
नवोदितोऽसौ शरदीव चन्द्रः ॥ ४१ ॥
शरत्कालके नवोदित चन्द्रमाके समान ब्रह्माजी चार वेदोंको धारण करनेवाले अपने चारों मुखोंसे, जो पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान परम मनोहर कान्तिसे युक्त थे, सम्पूर्ण दिशाओंको अन्धकाररहित कर रहे थे ॥ ४१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि देवासुरयुद्धे सनकादिकागमनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें देवताओं और असुरोंके युद्धमें सनकादिका आगमन नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥