भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 908

८८४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

उनमें वायुके समान वेगशाली एक सहस्र ऊँट जुते हुए थे, रणदुर्मद पुलोमा उसी रथपर आरूढ हो युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ४ ॥

षष्टी रथसहस्राणि पुलोमानं महारथम् । अन्वयुः सूर्यवर्णानि प्रदीप्तानीव तेजसा ॥ ५ ॥

अपने तेजसे सूर्यके समान उद्भासित होनेवाले साठ हजार रथ महारथी पुलोमाके पीछे-पीछे चले ॥ ५ ॥

खङ्गध्वजेन महता तप्तकाञ्चनवर्चसा । भ्राजते रथमध्यस्थः पर्वतस्य इवांशुमान् ॥ ६ ॥

पुलोमाका रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाले खङ्गचिह्नित विशाल ध्वजसे सुशोभित होता था, रथके भीतर बैठा हुआ पुलोमा उदयगिरिपर विराजमान अंशुमाली सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ६ ॥

सुचारुचामीकरपट्टनद्धां महागदां कालनिभां महाबलः । प्रगृह्य वभ्राज स शत्रुमध्ये कार्ष्णायसीं केतुरिवास्थितोर्व्याम् ॥ ७ ॥

वह महाबली योद्धा वहाँ शत्रुओंके बीच काले लोहेकी बनी हुई कालसदृश विशाल गदा हाथमें लेकर पृथ्वीपर खड़े किये गये ध्वजके समान शोभा पाता था, उसकी उस गदापर सुन्दर सुवर्णके पत्र मँढे हुए थे ॥ ७ ॥

हयग्रीवस्तु बलवान् हयग्रीवैर्महासुरैः । वृतः शतसहस्रेण रथानां रथिसत्तमः ॥ ८ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ बलवान् हयग्रीव घोड़ेके समान गर्दनवाले बड़े-बड़े असुरोंके साथ एक लाख रथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये आया ॥ ८ ॥

घराघरनिभाकारं सपत्नानीकमर्दनम् । स्यन्दनं भीममास्थाय युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ९ ॥

उसके रथका आकार मेघके समान भयंकर था, वह शत्रुओंकी सेनाका मर्दन करनेवाला था, उसीपर आरूढ़ होकर वह युद्धके लिये उद्यत होकर सामने खड़ा या ॥ ९ ॥

श्वेतशैलप्रतीकाशः श्वेतकुण्डलभूषणः । शुशुभे रथमध्यस्थः श्वेतशृङ्ग इवाचलः ॥ १० ॥

वह श्वेत पर्वतके समान कान्तिमान् और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित हो रथके भीतर बैठकर श्वेत शिखरवाले शैलके समान शोभा पाता था ॥ १० ॥

महता सप्तशीर्षेण शोभितो नागकेतुना । वैदूर्यमणिचित्रेण प्रवालाङ्कुरशोभिना ॥ ११ ॥

सात फनवाले सर्पसे चिह्नित विशाल ध्वज, जो वैदूर्य-मणिसे जटिल होनेके कारण विचित्र जान पड़ता था तथा नये-नये पल्लवोंके अंकुरोंसे अलंकृत था, हयग्रीवके रथकी शोभा बढ़ा रहा था ॥ ११ ॥

अमितबलपराक्रमाकृतीनां वररथिनामनुजग्मुरूजितानाम् । असुरगणशतानि गच्छमानं त्रिदशगणा इव वासवं प्रयान्तम् ॥ १२ ॥

जैसे यात्रा करते हुए इन्द्रके पीछे देवताओंके समुदाय चलते हैं, उसी प्रकार युद्धके लिये जाते हुए हयग्रीवके पीछे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न शरीरवाले ओजस्वी श्रेष्ठ रथी असुर सैकड़ोंकी संख्यामें चले ॥ १२ ॥

प्रह्लादस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । सर्वमायाधरः श्रीमान् यष्टा क्रतुशतैरपि ॥ १३ ॥

महाज्ञानी तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् श्रीमान् प्रह्लाद सम्पूर्ण मायाओंको धारण करनेवाले थे, वे सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे ॥ १३ ॥

समनह्यत तेजस्वी पावकार्चिःसमप्रभः । रथानीकेन महता दुर्दिनाम्भोदनादिना ॥ १४ ॥

उनकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होती थी, वे बड़े तेजस्वी थे, वे भी वर्षाकालके मेघकी भाँति गम्भीर घोष करनेवाले विशाल रथ-सेनाको साथ लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १४ ॥

शूरेणामितवीर्येण हेमकुण्डलधारिणा । वृतो दैत्यसहस्रेण देवैरिव पितामहः ॥ १५ ॥

देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजीके समान प्रह्लाद सोनेके कुण्डल धारण करनेवाले सहस्रों अमित पराक्रमी शूरवीर दैत्योंसे घिरे हुए थे ॥ १५ ॥

स्ववीर्यादग्रणीर्दृप्तो मत्तवारणविक्रमः । सुरसैन्यस्य सर्वस्य प्रतिक्षोभ इव स्थितः ॥ १६ ॥

अपने पराक्रमसे वे सबके अगुआ थे। उन्हें अपने बलपर गर्व था। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और समस्त देवसेनाका सामना करनेके लिये मूर्तिमान् क्षोभके समान खड़े थे ॥ १६ ॥

स्ववीर्येणोदधेस्तुल्यः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । तेजसा भास्कराकारः क्षमया पृथिवीसमः ॥ १७ ॥

अपने अगाध बलसे वे समुद्रके समान थे, कान्तिसे प्रज्वलित अग्निकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे, तेजसे सूर्यके तुल्य और क्षमासे पृथ्वीके समान जान पड़ते थे ॥ १७ ॥

तालध्वजेन दीप्तेन रथेनातिविराजता । तं यान्तमनुयान्ति स्म दानवाः शतसंघशः ॥ १८ ॥

दीप्तिमान् तालध्वजसे अत्यन्त सुशोभित होनेवाले रथके द्वारा युद्धकी ओर जाते हुए प्रह्लादके पीछे सैकड़ों दानवोंके समूह चलते थे ॥ १८ ॥

सर्वे हिरण्यकवचाः सर्वे रत्नविभूषिताः । दिव्याङ्गरागाभरणाः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ १९ ॥