भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 907, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 907

भविष्यपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ८८३


असुरेश्वर नमुचिके रथमें वह ध्वज मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता था ॥ ४० ॥

स भीमवेगश्च महाबलश्च
प्रगृह्य चापं हिमवानिव स्थितः ।
नीलाम्बरः काञ्चनपट्टनद्धो
दिशागजो यद्वदुपेतकक्षः ॥ ४१ ॥

नमुचिका वेग बड़ा भयंकर था। वह नीलाम्बरधारी महाबली दैत्य स्वर्णमय कवच बाँधे और हाथमें धनुष लिये हिमवान्‌के समान अविचलभावसे खड़ा था मानो कोई दिग्गज रस्सियोंसे कसा-कसाया खड़ा हो ॥ ४१ ॥

किङ्किणीजालनिर्घोषं तपनीयविभूषितम् ।
सपताकध्वजोपेतं ससंध्यमिव तोयदम् ॥ ४२ ॥

मयासुरका रथ स्वर्णसे विभूषित था। उसमें छोटी-छोटी घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती थी। ध्वजा-पताकाओंसे युक्त वह रथ संध्याकालके मेघकी भाँति सुशोभित होता था ॥ ४२ ॥

चक्रैश्चतुर्भिः संयुक्तमष्टनलवायतान्तरम् ।
हेमजालाकुलं दीप्तं कालचक्रमिवोदितम् ॥ ४३ ॥

उसमें चार पहिये लगे थे। उसके भीतरी भागकी लंबाई-चौड़ाई बत्तीस हाथकी थी। उस रथपर सोनेकी जाली लगी हुई थी। वह दीप्तिमान् रथ उदित हुए कालचक्रके समान शोभा पाता था ॥ ४३ ॥

नानायुधधरं घोरं व्याघ्रचर्मपरिष्कृतम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ४४ ॥

नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त वह भयंकर रथ व्याघ्रचर्मसे मँढ़ा हुआ था। उसमें क्रीड़ाके लिये कृत्रिम मृगगण सजाकर रखे गये थे। विभिन्न प्रकारके चित्र उस रथकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४४ ॥

तूणीरशरसम्पूर्णं शक्तितोमरसंकुलम् ।
गदामुद्गरसम्बाधं चापरत्नविभूषितम् ॥ ४५ ॥

वह बाणों और तरकसौंसे भरा हुआ था, शक्तियों और तोमरोंसे व्याप्त था, गदाओं और मुद्गरोंसे उसके स्थान संकीर्ण हो रहे थे तथा बहुत-से धनुष-रत्न उसे विभूषित किये हुए थे ॥ ४५ ॥

युक्तमृक्षसहस्रेण लम्बकेसरवर्चसा ।
राजतेन विकीर्णेन शोभितं सिंहकेतुना ॥ ४६ ॥

लंबे केसरोंकी कान्तिसे युक्त एक सहस्र रीछ उस रथमें जुते हुए थे। सिंहके चिह्नसे युक्त एवं फहराते हुए रजतमय ध्वजसे उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४६ ॥

स तेन शुशुभे दैत्यो मयो मायाविसर्पिणा ।
रथरतने स्थितः श्रीमानुदयस्थ इवांशुमान् ॥ ४७ ॥

मायाको फैलानेवाले उस रथके द्वारा उस रत्नरूप रथमें बैठा हुआ मय दैत्य उदयाचलके शिखरपर स्थित हुए तेजस्वी सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४७ ॥

विमलरजतबिन्दुशोभिताङ्गं
मणिकनकोज्ज्वलचारुभक्तिचित्रम् ।
अयुतशतसहस्रमूर्जितानां
मयममुयाति तदा महारथानाम् ॥ ४८ ॥

मयासुरका प्रत्येक अङ्ग निर्मल रजतबिन्दुओंसे सुशोभित था। उसमें मणि और स्वर्णके योगसे उज्ज्वल एवं मनोहर चित्रभङ्गीकी रचना की गयी थी। उस समय एक अरब तेजस्वी महारथी मय दानवके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे मयस्य युद्धाभिगमने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें मयासुरका युद्धमें प्रस्थानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥


पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्लाद और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग

वैशम्पायन उवाच
पुलोमा तु महादैत्यस्तिमिराकारगह्वरम् ।
आरुरोहायसं घोरं रथं पररथारुजम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुलोमा नामक महादैत्य घनीभूत अंधकारके समान रंगवाले लोहेके बने हुए भयंकर रथपर आरूढ़ हुआ। वह रथ शत्रुओंके रथोंको नष्ट करनेवाला था ॥ १ ॥

उत्कीर्णपर्वताकारं लोहजालान्तरान्तरम् ।
नेमिघोषेण महता क्षुभ्यन्तमिव सागरम् ॥ २ ॥

खण्डित होकर पृथ्वीपर गिरे हुए पर्वतके समान उसका विशाल आकार था, उसका भीतरी भाग लोहेकी जालसे आवृत्त था तथा अपने पहियोंके महान् घोषसे वह समुद्रमें भी क्षोभ-सा उत्पन्न कर देता था ॥ २ ॥

गदापरिघनिस्त्रिशैः सतोमरपरश्वधैः ।
शक्तिमुद्गरसंकीर्णं सतोयमिव तोयदम् ॥ ३ ॥

गदा, परिघ, खङ्ग, तोमर, फरसे, शक्ति और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा होनेके कारण वह रथ सजल जलधरके समान प्रतीत होता था ॥ ३ ॥

रथमुष्ट्रसहस्रेण संयुक्तं वायुवेगिना ।
पुलोमाऽऽरुह्य युद्धाय प्रस्थितो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥

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