विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 906, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
तेषां मध्यगतो बाणः प्रावृषीवोत्थितो घनः।
स्थितः शक्तिगदापाणिस्त्रिन्नलवप्रतिमे रथे ॥ २६ ॥
उनके बीचमें बाणासुर वर्षाऋतुमें घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान खड़ा हुआ था। वह बारह हाथ लंबे रथपर बैठा था और उसके हाथोंमें शक्ति एवं गदा शोभा पाती थीं ॥ २६ ॥
विचित्राश्वध्वजयुगे चित्रभक्तिविराजिते ।
गदापरिघसम्पूर्णे हेमजालविभूषिते ॥ २७ ॥
उसके रथमें जो घोड़े, ध्वज एवं जुए थे, वे सब-के सब विचित्र शोभा धारण करते थे। वह रथ विभिन्न प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित था, उसमें गदा और परिघ आदि अस्त्र भरे हुए थे तथा वह सोनेकी जालीसे विभूषित था ॥ २७ ॥
अन्वीयमानो दितिजैर्वालखिल्यैरिवांशुमान् ।
नानाप्रहरणैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैरिवोरगैः ॥ २८ ॥
जैसे सूर्यदेवके पीछे वालखिल्य नामक ऋषि चलते हैं, उसी प्रकार सब दैत्य बाणासुरके पीछे-पीछे चल रहे थे। वे दैत्य नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न एवं भयंकर थे तथा तीखी दाढ़वाले साँपोंके समान जान पड़ते थे ॥ २८ ॥
पञ्च तस्य महावीर्या दानवा युद्धदुर्मदाः ।
ररक्षू रथमव्यग्रा व्यादितास्या भयावहाः ॥ २९ ॥
पाँच महापराक्रमी रणदुर्मद दानव स्वस्थचित्त होकर बाणासुरके रथकी रक्षा करते थे। वे पाँचों दानव मुँह बाये हुए होनेके कारण बड़े भयावह प्रतीत होते थे ॥ २९ ॥
सुबाहुर्मेघनादश्च भीमगर्भश्च वीर्यवान् ।
तथा कनकसूर्धा च वेगवान् केतुमानिति ॥ ३० ॥
उन पाँचोंके नाम इस प्रकार थे—सुबाहु, मेघनाद, पराक्रमी भीमगर्भ, कनकसूर्धा तथा वेगशाली केतुमान् ॥ ३० ॥
कनकरजतभक्तिचित्रपार्श्वे
पतगपतिप्रतिमे रथे स्थितोऽभूत् ।
जलदनिनादतुल्यनेमिघोषे
सुरगणसैन्यवधाय दानवेन्द्रः ॥ ३१ ॥
देवसमुदायकी सेनाका वध करनेके लिये दानवराज बलि जिस रथपर बैठे थे, वह पक्षिराज गरुड़के समान प्रतीत होता था। उसके पार्श्वभागोंमें विभागपूर्वक सोने और चाँदीके चित्र लगे हुए थे तथा उसके पहियोंकी घरघराहट मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ ३१ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वलो नाम महासुरः ।
वृतः शतसहस्रेण रथानां भीमवर्चसाम् ॥ ३२ ॥
दनायुषाका पुत्र बल नामक महान् असुर भयंकर तेजवाले एक लाख रथोंसे घिरा हुआ था ॥ ३२ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण रथमारुह्य वीर्यवान् ।
नीलायसमयं घोरं वायसाङ्कं सुदुर्जयम् ॥ ३३ ॥
वह पराक्रमी दैत्य एक सहस्र रीछोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये निकला था। काले लोहेका बना हुआ उसका वह भयंकर रथ अत्यन्त दुर्जय था। उसपर कौएके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहरा रही थी ॥ ३३ ॥
नीलाम्बरधरः श्रीमान् वैडूर्याचलसंनिभः ।
महता रथवेगेन प्रययौ दानवस्तदा ॥ ३४ ॥
वह कान्तिमान् दानव नील वस्त्र धारण करके वैडूर्यमणि-के पर्वत-सा प्रतीत होता था। उसके रथका वेग महान् था और उसीके द्वारा वह युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ३४ ॥
तत्रैकार्णवसंकाशे सैन्यमध्ये व्यराजत ।
प्रभातसमये श्रीमान् समुद्रस्य इवांशुमान् ॥ ३५ ॥
उसकी सेनाका मध्य-भाग एकार्णवके समान जान पड़ता था, उसमें वह कान्तिमान् दानव प्रभातकालमें समुद्रके मध्य-भागमें स्थित सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥
सुतप्तजाम्बूनदतुल्यवर्चसा
निशाकराकारतडिद्गुणाकरः ।
किरीटमुख्येन विभाति शोभिना
यथा गिरिः शृङ्गवरेण भास्वता ॥ ३६ ॥
उसका श्रेष्ठ किरीट तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान तेजस्वी था, वह सूर्य चन्द्रमाके समान आकार तथा विद्युत्के समान प्रकाश आदि गुणोंसे सम्पन्न था। उस शोभाशाली किरीटसे उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी जैसे कोई पर्वत अपने प्रकाशमान सुन्दर शिखरसे सुशोभित होता है ॥ ३६ ॥
षष्टी रथसहस्राणि नमुचेरसुरस्य वै ।
खरयुक्तानि सर्वाणि मेघतुल्यरवाणि च ॥ ३७ ॥
नमुचि नामक असुरके अधिकारमें साठ हजार रथ थे, जिनमें गदहे जोते जाते थे। वे सब के सब मेघके तुल्य गम्भीर घोष करनेवाले थे ॥ ३७ ॥
नानाप्रहरणाः सर्वे सर्वे ते चित्रयोधिनः ।
महाभ्रघनसंकाशा वेगवन्तो महाबलाः ॥ ३८ ॥
वे सभी रथ और रथी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त तथा विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। वे देखनेमें मेघोंकी भारी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके वेग और बल महान् थे ॥ ३८ ॥
रथो व्याघ्रसहस्रेण युक्तः परमवेगवान् ।
नमुचेरसुरेन्द्रस्य सर्वरत्नविभूषितः ॥ ३९ ॥
असुरराज नमुचिका रथ अत्यन्त वेगशाली था। उसमें एक सहस्र व्याघ्र जुते हुए थे। वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था ॥ ३९ ॥
शार्दूलचिह्नः शुशुभे तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
रथमध्येऽसुरेन्द्रस्य मध्यंदिनरविर्यथा ॥ ४० ॥
उसकी ध्वजामें व्याघ्रका चिह्न बना हुआ था, इससे उस स्वर्णमय ध्वजकी बड़ी शोभा हो रही थी।