भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 905

भविष्यपर्व ] एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८१

वरिष्ठश्च गरिष्ठश्च भूतलोमा तथा विघुः। दुष्प्रसादः किरीटी च सूचीवक्त्रो महासुरः॥ १३॥ सुबाहुः कञ्जबाहुश्च करणः कलशोदरः। सोमपो देवयाजी च प्रवरो वीरमर्दनः ॥ १४॥ सुपथः खण्डमुक्तिश्च शिखिनेत्रः शिखिध्वजः। यथास्मृति मया प्रोक्ता मरीचेः कीर्तिवर्धनाः॥ १५॥ एते चान्ये च बहवो नानाभूषणभूषिताः। रथौघैर्बहुसाहस्रैर्ययुर्द्विषन्मर्दिनाः ॥ १६॥

महापद्म, निकुम्भ, पराक्रमी कुम्भकर्ण, काञ्चनाक्ष, कपिस्कन्ध, मैनाक, क्षितिकम्पन, शितकेश, ऊर्ध्ववक्त्र, वज्रनाभ, शिखी, जटी, सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, प्रियदर्शन, एकाक्ष, एकपाद, मुण्ड, विद्युद्दक्ष, चतुर्भुज, गजोदर, गजशिरा, गजस्कन्ध, गजेक्षण, अष्टदंष्ट्र, चतुर्वक्त्र, मेघनादी, जलंधर, कराल, ज्वालजिह्वास्य, शताङ्ग, शतलोचन, सहस्रपाद, सुमुख, महासुर कृष्ण, रणोत्कट, दानपति, शैलकम्पी, कुलाकुलि, समुद्र, रमस, चण्ड, महासुर धूम्र, गोव्रज, गोक्षुर, रौद्र, गोदन्त, स्वस्तिक, ध्रुव, मांसल, मांसभक्ष, वेगवान्, केतुमान्, शिवि, पंकदिग्धशरीर, वृहत्कीर्ति, महाहनु, समप्रभ, विकुम्भाण्ड, विरूपाक्ष, महोदर, श्वेतशीर्ष, चन्द्रहन्तु, चन्द्रहा, चन्द्रतापन, विक्षर, दीर्घबाहु, मद्यप, मारुताशन, तालजंघ, महाभाग सरभ, शलभ, क्रथ, समुद्रमथन, नादी, महाबली वितत, प्रलम्ब, नरक, व्याली, धेनुक, काललोचन, वरिष्ठ, गरिष्ठ, भूतलोमा, विघु, दुष्प्रसाद, किरीटी, महासुर सूचीवक्त्र, सुबाहु, कञ्जबाहु, करण, कलशोदर, सोमप, देवयाजी, प्रवर, वीरमर्दन, सुपथ, खण्डमुक्ति, शिखिनेत्र और शिखिध्वज—ये मरीचिके कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले दैत्य अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार मैंने बतलाये हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुदमन दैत्य वीर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो कई सहस्र रथ-समूहोंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ ३—१६ ॥

दिव्याम्बरधरा दैत्या दिव्यमाल्यानुलेपनाः । दिव्यैश्च कवचैर्नद्धा दिव्यैश्चैवोच्छ्रितैर्ध्वजैः ॥ १७ ॥

समस्त दैत्योंने दिव्य वस्त्र धारण किये थे। वे दिव्य माला और अनुलेपनसे विभूषित थे। उनके अङ्गोंमें दिव्य कवच बँधे हुए थे। उनके दिव्य और ऊँचे ध्वज सदा फहराते रहते थे ॥ १७ ॥

दिव्यायुधधरा दैत्या गर्जमाना यथाम्बुदाः । बृहद्भी रथघोषैश्च चालयन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥

सभी दैत्य दिव्य आयुध धारण किये हुए थे, सभी मेघोंके समान गर्जना करते थे और रथोंके गम्भीर घोषोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए चलते थे ॥ १८ ॥

महाबला दिव्यबलास्त्रधारिणो भुजङ्गभोगप्रतिमैर्महाभुजैः । सुदुर्जय दैत्यवृषाः सुरारयो दितिप्रिया लोहितलोहितेक्षणाः ॥ १९ ॥

उनमें महान् बल था, वे दिव्य शक्तिसे सम्पन्न अस्त्र धारण करते थे और सर्पोंके शरीरकी भाँति मोटी एवं विशाल भुजाओंके द्वारा अत्यन्त दुर्जय थे। देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले वे दैत्यशिरोमणि वीर दितिके लाड़ले थे, उन सबके नेत्र लाल-लाल हो रहे थे ॥ १९ ॥

ते जग्मुरर्कज्वलनेन्द्रवीर्या महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः । विवृत्तदंष्ट्रा हरिधूम्रकेशा विवर्धमानाः शरद्रीव मेघाः ॥ २० ॥

वे सूर्य, अग्नि और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। इन्द्रके वज्र और अशनिके समान उनका वेग था। वे अपनी दाढ़ें सदा खोले रखते थे। उनके केश हरित और धूम्रवर्णके थे। वे शरत्कालके मेघोंके समान निरन्तर बढ़ रहे थे ॥ २० ॥

सहस्रबाहुर्वाणश्च बलेः पुत्रो महाबलः । रथातिरथकोट्या वै संनद्धस्तु महाबलः ॥ २१ ॥

बलिके महाबली पुत्र सहस्रबाहु वाणासुर करोड़ों रथियों और अतिरथियोंकी विशाल सेना साथ ले युद्धके लिये कवच बाँधकर तैयार हो गया ॥ २१ ॥

सर्वे मायाधरा दैत्याः सर्वे दिव्यास्त्रयोधिनः । सर्वे मदबलोत्सिक्ताः सर्वे लब्धवराः पुरा ॥ २२ ॥

सभी दैत्य माया धारण करनेवाले थे। सभी दिव्यास्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ थे। सभी बलके मदसे उन्मत्त थे तथा सबने पहले देवताओंसे वरदान प्राप्त किया था ॥ २२ ॥

सर्वे काञ्चनशैलाभाः पीतकौशेयवाससः । किरीटोष्णीषमुकुटा दिव्यभूषणभूषिताः ॥ २३ ॥

सबके शरीर सोनेके पर्वतके समान थे। सबने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखे थे। सबके मस्तकपर किरीट, पगड़ी एवं मुकुट शोभा देते थे तथा सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २३ ॥

हिरण्यकवचाः सर्वे हिरण्यध्वजकेतवः । स्यन्दनस्था व्यराजन्त शारदा इव खे ग्रहाः ॥ २४ ॥

सबके कवच तथा ध्वजा-पताकाएँ स्वर्णमयी थीं। रथोंपर बैठकर वे दैत्य वीर शरत्कालके आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २४ ॥

ताप्नीयैर्वरैर्निष्कैरनलज्वलितप्रभैः । हेमपर्वतशृङ्गस्थाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ २५ ॥

उनके गलेमें सोनेके बने हुए सुन्दर पदक अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होते थे। उनसे भूषित हुए ये रथी वीर स्वर्णमय पर्वतके शिखरपर खिले हुए पलाश वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ २५ ॥