विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भविष्यपर्व ] एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८१
वरिष्ठश्च गरिष्ठश्च भूतलोमा तथा विघुः। दुष्प्रसादः किरीटी च सूचीवक्त्रो महासुरः॥ १३॥ सुबाहुः कञ्जबाहुश्च करणः कलशोदरः। सोमपो देवयाजी च प्रवरो वीरमर्दनः ॥ १४॥ सुपथः खण्डमुक्तिश्च शिखिनेत्रः शिखिध्वजः। यथास्मृति मया प्रोक्ता मरीचेः कीर्तिवर्धनाः॥ १५॥ एते चान्ये च बहवो नानाभूषणभूषिताः। रथौघैर्बहुसाहस्रैर्ययुर्द्विषन्मर्दिनाः ॥ १६॥
महापद्म, निकुम्भ, पराक्रमी कुम्भकर्ण, काञ्चनाक्ष, कपिस्कन्ध, मैनाक, क्षितिकम्पन, शितकेश, ऊर्ध्ववक्त्र, वज्रनाभ, शिखी, जटी, सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, प्रियदर्शन, एकाक्ष, एकपाद, मुण्ड, विद्युद्दक्ष, चतुर्भुज, गजोदर, गजशिरा, गजस्कन्ध, गजेक्षण, अष्टदंष्ट्र, चतुर्वक्त्र, मेघनादी, जलंधर, कराल, ज्वालजिह्वास्य, शताङ्ग, शतलोचन, सहस्रपाद, सुमुख, महासुर कृष्ण, रणोत्कट, दानपति, शैलकम्पी, कुलाकुलि, समुद्र, रमस, चण्ड, महासुर धूम्र, गोव्रज, गोक्षुर, रौद्र, गोदन्त, स्वस्तिक, ध्रुव, मांसल, मांसभक्ष, वेगवान्, केतुमान्, शिवि, पंकदिग्धशरीर, वृहत्कीर्ति, महाहनु, समप्रभ, विकुम्भाण्ड, विरूपाक्ष, महोदर, श्वेतशीर्ष, चन्द्रहन्तु, चन्द्रहा, चन्द्रतापन, विक्षर, दीर्घबाहु, मद्यप, मारुताशन, तालजंघ, महाभाग सरभ, शलभ, क्रथ, समुद्रमथन, नादी, महाबली वितत, प्रलम्ब, नरक, व्याली, धेनुक, काललोचन, वरिष्ठ, गरिष्ठ, भूतलोमा, विघु, दुष्प्रसाद, किरीटी, महासुर सूचीवक्त्र, सुबाहु, कञ्जबाहु, करण, कलशोदर, सोमप, देवयाजी, प्रवर, वीरमर्दन, सुपथ, खण्डमुक्ति, शिखिनेत्र और शिखिध्वज—ये मरीचिके कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले दैत्य अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार मैंने बतलाये हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुदमन दैत्य वीर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो कई सहस्र रथ-समूहोंके साथ युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥ ३—१६ ॥
दिव्याम्बरधरा दैत्या दिव्यमाल्यानुलेपनाः । दिव्यैश्च कवचैर्नद्धा दिव्यैश्चैवोच्छ्रितैर्ध्वजैः ॥ १७ ॥
समस्त दैत्योंने दिव्य वस्त्र धारण किये थे। वे दिव्य माला और अनुलेपनसे विभूषित थे। उनके अङ्गोंमें दिव्य कवच बँधे हुए थे। उनके दिव्य और ऊँचे ध्वज सदा फहराते रहते थे ॥ १७ ॥
दिव्यायुधधरा दैत्या गर्जमाना यथाम्बुदाः । बृहद्भी रथघोषैश्च चालयन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥
सभी दैत्य दिव्य आयुध धारण किये हुए थे, सभी मेघोंके समान गर्जना करते थे और रथोंके गम्भीर घोषोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए चलते थे ॥ १८ ॥
महाबला दिव्यबलास्त्रधारिणो भुजङ्गभोगप्रतिमैर्महाभुजैः । सुदुर्जय दैत्यवृषाः सुरारयो दितिप्रिया लोहितलोहितेक्षणाः ॥ १९ ॥
उनमें महान् बल था, वे दिव्य शक्तिसे सम्पन्न अस्त्र धारण करते थे और सर्पोंके शरीरकी भाँति मोटी एवं विशाल भुजाओंके द्वारा अत्यन्त दुर्जय थे। देवताओंसे शत्रुता रखनेवाले वे दैत्यशिरोमणि वीर दितिके लाड़ले थे, उन सबके नेत्र लाल-लाल हो रहे थे ॥ १९ ॥
ते जग्मुरर्कज्वलनेन्द्रवीर्या महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः । विवृत्तदंष्ट्रा हरिधूम्रकेशा विवर्धमानाः शरद्रीव मेघाः ॥ २० ॥
वे सूर्य, अग्नि और इन्द्रके समान पराक्रमी थे। इन्द्रके वज्र और अशनिके समान उनका वेग था। वे अपनी दाढ़ें सदा खोले रखते थे। उनके केश हरित और धूम्रवर्णके थे। वे शरत्कालके मेघोंके समान निरन्तर बढ़ रहे थे ॥ २० ॥
सहस्रबाहुर्वाणश्च बलेः पुत्रो महाबलः । रथातिरथकोट्या वै संनद्धस्तु महाबलः ॥ २१ ॥
बलिके महाबली पुत्र सहस्रबाहु वाणासुर करोड़ों रथियों और अतिरथियोंकी विशाल सेना साथ ले युद्धके लिये कवच बाँधकर तैयार हो गया ॥ २१ ॥
सर्वे मायाधरा दैत्याः सर्वे दिव्यास्त्रयोधिनः । सर्वे मदबलोत्सिक्ताः सर्वे लब्धवराः पुरा ॥ २२ ॥
सभी दैत्य माया धारण करनेवाले थे। सभी दिव्यास्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ थे। सभी बलके मदसे उन्मत्त थे तथा सबने पहले देवताओंसे वरदान प्राप्त किया था ॥ २२ ॥
सर्वे काञ्चनशैलाभाः पीतकौशेयवाससः । किरीटोष्णीषमुकुटा दिव्यभूषणभूषिताः ॥ २३ ॥
सबके शरीर सोनेके पर्वतके समान थे। सबने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखे थे। सबके मस्तकपर किरीट, पगड़ी एवं मुकुट शोभा देते थे तथा सभी दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २३ ॥
हिरण्यकवचाः सर्वे हिरण्यध्वजकेतवः । स्यन्दनस्था व्यराजन्त शारदा इव खे ग्रहाः ॥ २४ ॥
सबके कवच तथा ध्वजा-पताकाएँ स्वर्णमयी थीं। रथोंपर बैठकर वे दैत्य वीर शरत्कालके आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २४ ॥
ताप्नीयैर्वरैर्निष्कैरनलज्वलितप्रभैः । हेमपर्वतशृङ्गस्थाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ २५ ॥
उनके गलेमें सोनेके बने हुए सुन्दर पदक अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होते थे। उनसे भूषित हुए ये रथी वीर स्वर्णमय पर्वतके शिखरपर खिले हुए पलाश वृक्षोंके समान शोभा पाते थे ॥ २५ ॥
८८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
तेषां मध्यगतो बाणः प्रावृषीवोत्थितो घनः।
स्थितः शक्तिगदापाणिस्त्रिन्नलवप्रतिमे रथे ॥ २६ ॥
उनके बीचमें बाणासुर वर्षाऋतुमें घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान खड़ा हुआ था। वह बारह हाथ लंबे रथपर बैठा था और उसके हाथोंमें शक्ति एवं गदा शोभा पाती थीं ॥ २६ ॥
विचित्राश्वध्वजयुगे चित्रभक्तिविराजिते ।
गदापरिघसम्पूर्णे हेमजालविभूषिते ॥ २७ ॥
उसके रथमें जो घोड़े, ध्वज एवं जुए थे, वे सब-के सब विचित्र शोभा धारण करते थे। वह रथ विभिन्न प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित था, उसमें गदा और परिघ आदि अस्त्र भरे हुए थे तथा वह सोनेकी जालीसे विभूषित था ॥ २७ ॥
अन्वीयमानो दितिजैर्वालखिल्यैरिवांशुमान् ।
नानाप्रहरणैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैरिवोरगैः ॥ २८ ॥
जैसे सूर्यदेवके पीछे वालखिल्य नामक ऋषि चलते हैं, उसी प्रकार सब दैत्य बाणासुरके पीछे-पीछे चल रहे थे। वे दैत्य नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न एवं भयंकर थे तथा तीखी दाढ़वाले साँपोंके समान जान पड़ते थे ॥ २८ ॥
पञ्च तस्य महावीर्या दानवा युद्धदुर्मदाः ।
ररक्षू रथमव्यग्रा व्यादितास्या भयावहाः ॥ २९ ॥
पाँच महापराक्रमी रणदुर्मद दानव स्वस्थचित्त होकर बाणासुरके रथकी रक्षा करते थे। वे पाँचों दानव मुँह बाये हुए होनेके कारण बड़े भयावह प्रतीत होते थे ॥ २९ ॥
सुबाहुर्मेघनादश्च भीमगर्भश्च वीर्यवान् ।
तथा कनकसूर्धा च वेगवान् केतुमानिति ॥ ३० ॥
उन पाँचोंके नाम इस प्रकार थे—सुबाहु, मेघनाद, पराक्रमी भीमगर्भ, कनकसूर्धा तथा वेगशाली केतुमान् ॥ ३० ॥
कनकरजतभक्तिचित्रपार्श्वे
पतगपतिप्रतिमे रथे स्थितोऽभूत् ।
जलदनिनादतुल्यनेमिघोषे
सुरगणसैन्यवधाय दानवेन्द्रः ॥ ३१ ॥
देवसमुदायकी सेनाका वध करनेके लिये दानवराज बलि जिस रथपर बैठे थे, वह पक्षिराज गरुड़के समान प्रतीत होता था। उसके पार्श्वभागोंमें विभागपूर्वक सोने और चाँदीके चित्र लगे हुए थे तथा उसके पहियोंकी घरघराहट मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान सुनायी देती थी ॥ ३१ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वलो नाम महासुरः ।
वृतः शतसहस्रेण रथानां भीमवर्चसाम् ॥ ३२ ॥
दनायुषाका पुत्र बल नामक महान् असुर भयंकर तेजवाले एक लाख रथोंसे घिरा हुआ था ॥ ३२ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण रथमारुह्य वीर्यवान् ।
नीलायसमयं घोरं वायसाङ्कं सुदुर्जयम् ॥ ३३ ॥
वह पराक्रमी दैत्य एक सहस्र रीछोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये निकला था। काले लोहेका बना हुआ उसका वह भयंकर रथ अत्यन्त दुर्जय था। उसपर कौएके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहरा रही थी ॥ ३३ ॥
नीलाम्बरधरः श्रीमान् वैडूर्याचलसंनिभः ।
महता रथवेगेन प्रययौ दानवस्तदा ॥ ३४ ॥
वह कान्तिमान् दानव नील वस्त्र धारण करके वैडूर्यमणि-के पर्वत-सा प्रतीत होता था। उसके रथका वेग महान् था और उसीके द्वारा वह युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ३४ ॥
तत्रैकार्णवसंकाशे सैन्यमध्ये व्यराजत ।
प्रभातसमये श्रीमान् समुद्रस्य इवांशुमान् ॥ ३५ ॥
उसकी सेनाका मध्य-भाग एकार्णवके समान जान पड़ता था, उसमें वह कान्तिमान् दानव प्रभातकालमें समुद्रके मध्य-भागमें स्थित सूर्यदेवके समान शोभा पा रहा था ॥ ३५ ॥
सुतप्तजाम्बूनदतुल्यवर्चसा
निशाकराकारतडिद्गुणाकरः ।
किरीटमुख्येन विभाति शोभिना
यथा गिरिः शृङ्गवरेण भास्वता ॥ ३६ ॥
उसका श्रेष्ठ किरीट तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान तेजस्वी था, वह सूर्य चन्द्रमाके समान आकार तथा विद्युत्के समान प्रकाश आदि गुणोंसे सम्पन्न था। उस शोभाशाली किरीटसे उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी जैसे कोई पर्वत अपने प्रकाशमान सुन्दर शिखरसे सुशोभित होता है ॥ ३६ ॥
षष्टी रथसहस्राणि नमुचेरसुरस्य वै ।
खरयुक्तानि सर्वाणि मेघतुल्यरवाणि च ॥ ३७ ॥
नमुचि नामक असुरके अधिकारमें साठ हजार रथ थे, जिनमें गदहे जोते जाते थे। वे सब के सब मेघके तुल्य गम्भीर घोष करनेवाले थे ॥ ३७ ॥
नानाप्रहरणाः सर्वे सर्वे ते चित्रयोधिनः ।
महाभ्रघनसंकाशा वेगवन्तो महाबलाः ॥ ३८ ॥
वे सभी रथ और रथी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त तथा विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। वे देखनेमें मेघोंकी भारी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके वेग और बल महान् थे ॥ ३८ ॥
रथो व्याघ्रसहस्रेण युक्तः परमवेगवान् ।
नमुचेरसुरेन्द्रस्य सर्वरत्नविभूषितः ॥ ३९ ॥
असुरराज नमुचिका रथ अत्यन्त वेगशाली था। उसमें एक सहस्र व्याघ्र जुते हुए थे। वह सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था ॥ ३९ ॥
शार्दूलचिह्नः शुशुभे तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
रथमध्येऽसुरेन्द्रस्य मध्यंदिनरविर्यथा ॥ ४० ॥
उसकी ध्वजामें व्याघ्रका चिह्न बना हुआ था, इससे उस स्वर्णमय ध्वजकी बड़ी शोभा हो रही थी।
भविष्यपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ८८३
असुरेश्वर नमुचिके रथमें वह ध्वज मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता था ॥ ४० ॥
स भीमवेगश्च महाबलश्च
प्रगृह्य चापं हिमवानिव स्थितः ।
नीलाम्बरः काञ्चनपट्टनद्धो
दिशागजो यद्वदुपेतकक्षः ॥ ४१ ॥
नमुचिका वेग बड़ा भयंकर था। वह नीलाम्बरधारी महाबली दैत्य स्वर्णमय कवच बाँधे और हाथमें धनुष लिये हिमवान्के समान अविचलभावसे खड़ा था मानो कोई दिग्गज रस्सियोंसे कसा-कसाया खड़ा हो ॥ ४१ ॥
किङ्किणीजालनिर्घोषं तपनीयविभूषितम् ।
सपताकध्वजोपेतं ससंध्यमिव तोयदम् ॥ ४२ ॥
मयासुरका रथ स्वर्णसे विभूषित था। उसमें छोटी-छोटी घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती थी। ध्वजा-पताकाओंसे युक्त वह रथ संध्याकालके मेघकी भाँति सुशोभित होता था ॥ ४२ ॥
चक्रैश्चतुर्भिः संयुक्तमष्टनलवायतान्तरम् ।
हेमजालाकुलं दीप्तं कालचक्रमिवोदितम् ॥ ४३ ॥
उसमें चार पहिये लगे थे। उसके भीतरी भागकी लंबाई-चौड़ाई बत्तीस हाथकी थी। उस रथपर सोनेकी जाली लगी हुई थी। वह दीप्तिमान् रथ उदित हुए कालचक्रके समान शोभा पाता था ॥ ४३ ॥
नानायुधधरं घोरं व्याघ्रचर्मपरिष्कृतम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं चित्रभक्तिविराजितम् ॥ ४४ ॥
नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त वह भयंकर रथ व्याघ्रचर्मसे मँढ़ा हुआ था। उसमें क्रीड़ाके लिये कृत्रिम मृगगण सजाकर रखे गये थे। विभिन्न प्रकारके चित्र उस रथकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४४ ॥
तूणीरशरसम्पूर्णं शक्तितोमरसंकुलम् ।
गदामुद्गरसम्बाधं चापरत्नविभूषितम् ॥ ४५ ॥
वह बाणों और तरकसौंसे भरा हुआ था, शक्तियों और तोमरोंसे व्याप्त था, गदाओं और मुद्गरोंसे उसके स्थान संकीर्ण हो रहे थे तथा बहुत-से धनुष-रत्न उसे विभूषित किये हुए थे ॥ ४५ ॥
युक्तमृक्षसहस्रेण लम्बकेसरवर्चसा ।
राजतेन विकीर्णेन शोभितं सिंहकेतुना ॥ ४६ ॥
लंबे केसरोंकी कान्तिसे युक्त एक सहस्र रीछ उस रथमें जुते हुए थे। सिंहके चिह्नसे युक्त एवं फहराते हुए रजतमय ध्वजसे उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४६ ॥
स तेन शुशुभे दैत्यो मयो मायाविसर्पिणा ।
रथरतने स्थितः श्रीमानुदयस्थ इवांशुमान् ॥ ४७ ॥
मायाको फैलानेवाले उस रथके द्वारा उस रत्नरूप रथमें बैठा हुआ मय दैत्य उदयाचलके शिखरपर स्थित हुए तेजस्वी सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४७ ॥
विमलरजतबिन्दुशोभिताङ्गं
मणिकनकोज्ज्वलचारुभक्तिचित्रम् ।
अयुतशतसहस्रमूर्जितानां
मयममुयाति तदा महारथानाम् ॥ ४८ ॥
मयासुरका प्रत्येक अङ्ग निर्मल रजतबिन्दुओंसे सुशोभित था। उसमें मणि और स्वर्णके योगसे उज्ज्वल एवं मनोहर चित्रभङ्गीकी रचना की गयी थी। उस समय एक अरब तेजस्वी महारथी मय दानवके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे मयस्य युद्धाभिगमने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें मयासुरका युद्धमें प्रस्थानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
पुलोमा, हयग्रीव, प्रह्लाद और शम्बरासुरका युद्धके लिये उद्योग
वैशम्पायन उवाच
पुलोमा तु महादैत्यस्तिमिराकारगह्वरम् ।
आरुरोहायसं घोरं रथं पररथारुजम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुलोमा नामक महादैत्य घनीभूत अंधकारके समान रंगवाले लोहेके बने हुए भयंकर रथपर आरूढ़ हुआ। वह रथ शत्रुओंके रथोंको नष्ट करनेवाला था ॥ १ ॥
उत्कीर्णपर्वताकारं लोहजालान्तरान्तरम् ।
नेमिघोषेण महता क्षुभ्यन्तमिव सागरम् ॥ २ ॥
खण्डित होकर पृथ्वीपर गिरे हुए पर्वतके समान उसका विशाल आकार था, उसका भीतरी भाग लोहेकी जालसे आवृत्त था तथा अपने पहियोंके महान् घोषसे वह समुद्रमें भी क्षोभ-सा उत्पन्न कर देता था ॥ २ ॥
गदापरिघनिस्त्रिशैः सतोमरपरश्वधैः ।
शक्तिमुद्गरसंकीर्णं सतोयमिव तोयदम् ॥ ३ ॥
गदा, परिघ, खङ्ग, तोमर, फरसे, शक्ति और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा होनेके कारण वह रथ सजल जलधरके समान प्रतीत होता था ॥ ३ ॥
रथमुष्ट्रसहस्रेण संयुक्तं वायुवेगिना ।
पुलोमाऽऽरुह्य युद्धाय प्रस्थितो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥
८८४ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उनमें वायुके समान वेगशाली एक सहस्र ऊँट जुते हुए थे, रणदुर्मद पुलोमा उसी रथपर आरूढ हो युद्धके लिये प्रस्थित हुआ ॥ ४ ॥
षष्टी रथसहस्राणि पुलोमानं महारथम् । अन्वयुः सूर्यवर्णानि प्रदीप्तानीव तेजसा ॥ ५ ॥
अपने तेजसे सूर्यके समान उद्भासित होनेवाले साठ हजार रथ महारथी पुलोमाके पीछे-पीछे चले ॥ ५ ॥
खङ्गध्वजेन महता तप्तकाञ्चनवर्चसा । भ्राजते रथमध्यस्थः पर्वतस्य इवांशुमान् ॥ ६ ॥
पुलोमाका रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाले खङ्गचिह्नित विशाल ध्वजसे सुशोभित होता था, रथके भीतर बैठा हुआ पुलोमा उदयगिरिपर विराजमान अंशुमाली सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ६ ॥
सुचारुचामीकरपट्टनद्धां महागदां कालनिभां महाबलः । प्रगृह्य वभ्राज स शत्रुमध्ये कार्ष्णायसीं केतुरिवास्थितोर्व्याम् ॥ ७ ॥
वह महाबली योद्धा वहाँ शत्रुओंके बीच काले लोहेकी बनी हुई कालसदृश विशाल गदा हाथमें लेकर पृथ्वीपर खड़े किये गये ध्वजके समान शोभा पाता था, उसकी उस गदापर सुन्दर सुवर्णके पत्र मँढे हुए थे ॥ ७ ॥
हयग्रीवस्तु बलवान् हयग्रीवैर्महासुरैः । वृतः शतसहस्रेण रथानां रथिसत्तमः ॥ ८ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ बलवान् हयग्रीव घोड़ेके समान गर्दनवाले बड़े-बड़े असुरोंके साथ एक लाख रथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये आया ॥ ८ ॥
घराघरनिभाकारं सपत्नानीकमर्दनम् । स्यन्दनं भीममास्थाय युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ ९ ॥
उसके रथका आकार मेघके समान भयंकर था, वह शत्रुओंकी सेनाका मर्दन करनेवाला था, उसीपर आरूढ़ होकर वह युद्धके लिये उद्यत होकर सामने खड़ा या ॥ ९ ॥
श्वेतशैलप्रतीकाशः श्वेतकुण्डलभूषणः । शुशुभे रथमध्यस्थः श्वेतशृङ्ग इवाचलः ॥ १० ॥
वह श्वेत पर्वतके समान कान्तिमान् और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित हो रथके भीतर बैठकर श्वेत शिखरवाले शैलके समान शोभा पाता था ॥ १० ॥
महता सप्तशीर्षेण शोभितो नागकेतुना । वैदूर्यमणिचित्रेण प्रवालाङ्कुरशोभिना ॥ ११ ॥
सात फनवाले सर्पसे चिह्नित विशाल ध्वज, जो वैदूर्य-मणिसे जटिल होनेके कारण विचित्र जान पड़ता था तथा नये-नये पल्लवोंके अंकुरोंसे अलंकृत था, हयग्रीवके रथकी शोभा बढ़ा रहा था ॥ ११ ॥
अमितबलपराक्रमाकृतीनां वररथिनामनुजग्मुरूजितानाम् । असुरगणशतानि गच्छमानं त्रिदशगणा इव वासवं प्रयान्तम् ॥ १२ ॥
जैसे यात्रा करते हुए इन्द्रके पीछे देवताओंके समुदाय चलते हैं, उसी प्रकार युद्धके लिये जाते हुए हयग्रीवके पीछे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न शरीरवाले ओजस्वी श्रेष्ठ रथी असुर सैकड़ोंकी संख्यामें चले ॥ १२ ॥
प्रह्लादस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । सर्वमायाधरः श्रीमान् यष्टा क्रतुशतैरपि ॥ १३ ॥
महाज्ञानी तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् श्रीमान् प्रह्लाद सम्पूर्ण मायाओंको धारण करनेवाले थे, वे सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे ॥ १३ ॥
समनह्यत तेजस्वी पावकार्चिःसमप्रभः । रथानीकेन महता दुर्दिनाम्भोदनादिना ॥ १४ ॥
उनकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होती थी, वे बड़े तेजस्वी थे, वे भी वर्षाकालके मेघकी भाँति गम्भीर घोष करनेवाले विशाल रथ-सेनाको साथ लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १४ ॥
शूरेणामितवीर्येण हेमकुण्डलधारिणा । वृतो दैत्यसहस्रेण देवैरिव पितामहः ॥ १५ ॥
देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजीके समान प्रह्लाद सोनेके कुण्डल धारण करनेवाले सहस्रों अमित पराक्रमी शूरवीर दैत्योंसे घिरे हुए थे ॥ १५ ॥
स्ववीर्यादग्रणीर्दृप्तो मत्तवारणविक्रमः । सुरसैन्यस्य सर्वस्य प्रतिक्षोभ इव स्थितः ॥ १६ ॥
अपने पराक्रमसे वे सबके अगुआ थे। उन्हें अपने बलपर गर्व था। वे मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और समस्त देवसेनाका सामना करनेके लिये मूर्तिमान् क्षोभके समान खड़े थे ॥ १६ ॥
स्ववीर्येणोदधेस्तुल्यः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । तेजसा भास्कराकारः क्षमया पृथिवीसमः ॥ १७ ॥
अपने अगाध बलसे वे समुद्रके समान थे, कान्तिसे प्रज्वलित अग्निकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे, तेजसे सूर्यके तुल्य और क्षमासे पृथ्वीके समान जान पड़ते थे ॥ १७ ॥
तालध्वजेन दीप्तेन रथेनातिविराजता । तं यान्तमनुयान्ति स्म दानवाः शतसंघशः ॥ १८ ॥
दीप्तिमान् तालध्वजसे अत्यन्त सुशोभित होनेवाले रथके द्वारा युद्धकी ओर जाते हुए प्रह्लादके पीछे सैकड़ों दानवोंके समूह चलते थे ॥ १८ ॥
सर्वे हिरण्यकवचाः सर्वे रत्नविभूषिताः । दिव्याङ्गरागाभरणाः समरेष्वनिवर्तिनः ॥ १९ ॥
| भविष्यपर्व ] | एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ८८५ |
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वे सब-के सब सुवर्णमय कवचसे युक्त तथा रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनके अङ्गराग और आभूषण दिव्य थे तथा वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते थे ॥ १९ ॥
जाम्बूनदविचित्राङ्गा वैदूर्यविकृताङ्गदाः ।
दिव्यस्यन्दनमध्यस्थाः खस्था इव महाग्रहाः ॥ २० ॥
जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उनके अङ्गोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे वैदूर्यमणिके बने हुए बाजूबंद धारण करते थे तथा दिव्य रथके अंदर बैठकर आकाशमें स्थित हुए महान् ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २० ॥
आचारवांश्चैव जितेन्द्रियश्च धर्मे रतः सत्यपरोऽनसूयः ।
स्थितोऽग्नितोयाम्बुदवायुकल्पो रूपी यथा सर्वहरः कृतान्तः ॥ २१ ॥
प्रह्लाद आचारवान्, जितेन्द्रिय, धर्मतत्पर, सत्यपरायण तथा दोषद्दष्टिसे रहित थे। वे अग्नि, जल, मेघ और वायुके समान शक्तिशाली थे तथा मूर्तिमान् सर्वसंहारकारी कालके समान वहाँ युद्धके लिये खड़े थे ॥ २१ ॥
शम्बरस्तु महामायो रथयूथपयूथपः ।
आरुरोह रथं दिव्यं सर्वयुद्धविशारदः ॥ २२ ॥
महामायावी शम्बर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति था, सब प्रकारके युद्धकी कलामें कुशल था। वह भी दिव्य रथ-पर आरूढ हुआ ॥ २२ ॥
लोहिताक्षो महाबाहुः प्रतप्तोत्तमकुण्डलः ।
जीमूतघनसङ्काशो दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ २३ ॥
उसके नेत्र लाल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, कानोंमें तपाये हुए सोनेके उत्तम कुण्डल शोभा पाते थे, उसकी कान्ति मेघके समान श्याम थी, वह दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करता था ॥ २३ ॥
विद्युज्ज्योतिर्निकाशेन मुकुटेनाकॅवर्चसा ।
मणिरत्नविचित्रेण वैदूर्यवरशोभिना ॥ २४ ॥
तपनीयेन महता कवचेन विराजता ।
संध्याभ्रेणेव संछन्नः श्रीमान्स्तशिलोच्चयः ॥ २५ ॥
उसके मस्तकपर विद्युत्की ज्योति तथा सूर्यके तेजके समान प्रकाशमान मुकुट था, उससे तथा मणि और रत्नोंसे जटित सुन्दर वैदूर्यमणिसे सुशोभित, सुवर्णनिर्मित शोभा-शाली विशाल कवचसे ढका हुआ शम्बरासुर संध्याकालके लाल बादलोंसे आच्छादित श्रीमान् अस्ताचलके समान जान पड़ता था ॥ २४-२५ ॥
त्रिंशच्छतसहस्राणि दैत्यानां चित्रयोधिनाम् ।
बलिनां कालकल्पानामन्वयुः शम्बरं तदा ॥ २६ ॥
उस समय विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले तथा कालके समान बलवान् तीस लाख दैत्य शम्बरासुरके पीछे-पीछे चलते थे ॥ २६ ॥
युक्तं हयसहस्रेण शुक्लबर्णेन राजता ।
क्रौञ्चध्वजेन दीप्तेन रथेनाहवशोभिना ॥ २७ ॥
उसके रथमें श्वेत रंगके एक सहस्र सुन्दर घोड़े जुते हुए थे। युद्धमें शोभा पानेवाला वह रथ क्रौञ्चके चिह्नसे युक्त विशाल ध्वजसे सुशोभित था (ऐसे रथके द्वारा वह युद्धके लिये आया था) ॥ २७ ॥
व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालं नानाविहङ्गैरपि भक्तिचित्रम् ।
विद्युत्प्रभं भीमरवं सुवेगं रथं समारुह्य रराज दैत्यः ॥ २८ ॥
उस रथमें वैदूर्यमणि और सुवर्णकी जाली लगी हुई थी, नाना प्रकारके पक्षियोंके पृथक्-पृथक् चित्र बने हुए थे, वह रथ विद्युत्के समान कान्तिमान् था, उससे भयंकर शब्द होता रहता था। उस उत्तम वेगशाली रथपर आरूढ़ हो वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे शम्बरादिदैत्यसन्नहने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसंगमें शम्बर आदि दैत्योंकी युद्धकी तैयारीविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अनुह्राद, विरोचन, कुजम्भ, असिलोमा, वृत्र, एकचक्र, वृत्रभ्राता, राहु, विप्रचित्ति, केशी, वृषपर्वा तथा बलिके युद्धके लिये तैयार होकर आगे बढ़ना
वैशम्पायन उवाच
अनुह्रादश्च तत्रैव दैत्यः परमदुर्जयः ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रययौ युद्धलालसः ॥ १ ॥
चतुश्चक्रेण यानेन त्रिनलद्वप्रतिमेन तु ।
युक्तेनाश्वैर्महावीर्यैः सिंहवक्त्रैरजिह्मगैः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! हिरण्यकशिपु-का पुत्र अनुह्राद भी, जो परम दुर्जय दैत्य था, देवताओंके साथ युद्धकी लालसा रखकर वहीं गया ॥ १ ॥
जिस रथसे वह गया था उसमें चार पहिये लगे थे, उसकी ऊँचाई बारह हाथकी थी, उसमें सिंहके समान मुखवाले और सीधे चलनेवाले महाबलशाली अश्व जुते हुए थे ॥ २ ॥
८८६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
भीमगम्भीरनादेन नेमिघोषेण वीर्यवान् । चालयन् वसुधां सर्वां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥ उसके पहियोंकी घरघराहट बड़ा गम्भीर और भयंकर शब्द प्रकट करती थी। पराक्रमी अनुह्राद उस रथके द्वारा पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको कम्पित करता हुआ चलता था ॥ ३ ॥
विनर्दमाना दैत्यौघा अनुह्रादं ययुः शुभाः । शतं शतसहस्राणां रथानां हेममालिनाम् ॥ ४ ॥ अनुह्रादके पीछे बहुत-से सुन्दर दैत्यसमुदाय गर्जना करते हुए चले। सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एक करोड़ रथी उसके साथ थे ॥ ४ ॥
परिघैर्भिन्दिपालैश्च भल्लैः पाशैः परश्वधैः । विविधायुधहस्तास्ते शूलमुद्गरपाणयः ॥ ५ ॥ उनके हाथोंमें परिघ, भिन्दिपाल, भल्ल, पाश, फरसे आदि नाना प्रकारके आयुध थे। वे अपने हाथोंमें शूल और मुद्गर भी लिये हुए थे ॥ ५ ॥
सुवर्णजालनिर्मुक्तैर्वज्रैश्च समलंकृताः । रत्नैर्विचित्रैश्च कवचैः सज्जमाना महासुराः ॥ ६ ॥ वे महान् असुर सोनेकी जालियोंसे युक्त वज्र नामक मणियों (हीरों) से अलंकृत थे। विचित्र रथ और कवच उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६ ॥
तदा विशालोच्छ्रितशैलरूपे वभौ रथे काञ्चनचित्रिताङ्गे । दैत्याधिपः सत्त्वबलानुरूपे समास्थितस्स्वप्रतिमे सुरूपे ॥ ७ ॥ उस समय जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुवर्णसे चित्रित था तथा जो विशाल एवं ऊँचे पर्वतके समान प्रतीत होता था, अपने सत्त्व और बलके अनुरूप, उस अनुपम एवं सुन्दर रथपर बैठकर वह दैत्यराज अनुह्राद बड़ी शोभा पा रहा था ॥
विरोचनश्च बलवान् वैश्वानरसमद्युतिः । महता रथवंशेन सर्वास्त्रकुशलः शुचिः ॥ ८ ॥ अग्निके समान तेजस्वी और बलवान् विरोचन भी युद्ध-के लिये उद्यत होकर वहाँ आया। उसके साथ रथियोंकी विशाल सेना थी। वह सब प्रकारके अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल एवं शुद्ध हृदयका था ॥ ८ ॥
व्यूहानां विनियोगज्ञो ज्ञानविज्ञानतत्त्ववित् । बलेः पितासुरवरः सुराणामिव वासवः ॥ ९ ॥ किस व्यूहका कहाँ प्रयोग करना चाहिये, इसका उसे विशेष ज्ञान था। वह ज्ञान-विज्ञानके तत्त्वको जाननेवाला था। विरोचन बलिका पिता था। जैसे देवताओंमें इन्द्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार असुरोंमें विरोचन श्रेष्ठ था ॥ ९ ॥
सर्वायुधसमोपेतं किङ्किणीजालभूषितम् । युक्तानां वाजिमुख्यानां सहस्रेणाशुगामिनाम् ॥ १० ॥ उसका रथ छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरोंसे सुशोभित था। उसमें सब प्रकारके आयुध रखे गये थे। वह रथ एक सहस्र शीघ्रगामी श्रेष्ठ अश्वोंसे जुता हुआ था ॥ १० ॥
रथमारुह्य दैत्येन्द्रो वभौ मेरुरिवापरः । किङ्किणीजालपर्यन्तं गजेन्द्रध्वजशोभितम् । संध्याभ्रसमवर्णाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥ ११ ॥ उस रथपर आरूढ़ होकर दैत्यराज विरोचन दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था। उसके किनारे-किनारे क्षुद्र घण्टिकाओं-से युक्त जाली लगी हुई थीं। वह गजराजके चिह्नसे युक्त ध्वजसे सुशोभित होता था और संध्याकालीन बादलोंके समान वर्णवाली पताकाओंसे अलंकृत था ॥ ११ ॥
प्रवालजाम्बूनदभक्तिचित्रं व्यालम्बिमुक्ताफलभूषितं च । रथं समारुह्य किरीटमाली ययौ स युद्धाय महासुरेन्द्रः ॥ १२ ॥ वह महान् असुरेन्द्र मूँगे और सुवर्णकी चित्रमूर्तियोंसे सुशोभित तथा सब ओर लटकते हुए मोतियोंके दानोंसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो मस्तकपर किरीट धारण करके युद्धके लिये चला ॥ १२ ॥
विरोचनानुजश्चैव कुजम्भो नाम दानवः । स्यन्दनैर्बहुसाहस्रैर्मणिकाञ्चनभूषितैः ॥ १३ ॥ वृतो मदबलात् सिक्तैर्देवारिभिररिंदमः । प्रासपाशगदाहस्तैर्दानवैर्युद्धकाङ्क्षिभिः ॥ १४ ॥ विरोचनका छोटा भाई कुजम्भ नामक दानव मणि और सुवर्णसे विभूषित कई सहस्र रथोंसे घिरा हुआ था। बलके अभिमानसे मत्त हुए देवद्रोही दैत्य उसे घेरकर खड़े थे। उन दैत्योंके हाथमें प्रास, पाश और गदा आदि अस्त्र शोभा पा रहे थे। वे सभी दानव युद्धकी अभिलाषा रखते थे, उनके साथ आया हुआ कुजम्भ शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ था ॥
स पर्वतनिभाकारो भिन्नाञ्जनचयप्रभः । महता भ्राजमानेन किरीटेन सुवर्चसा ॥ १५ ॥ सर्वरत्नविचित्रेण कवचेन च संवृतः । महता दीप्तवपुषा रथेनेन्दुरिवांशूमान् ॥ १६ ॥ उसका आकार पर्वतके समान विशाल था, खानसे काट-कर निकाले गये कोयलोंकी राशिके समान उसका काला रंग था, उसके मस्तकपर अत्यन्त तेजस्वी एवं कान्तिमान् महान् मुकुट शोभा पाता था, उस मुकुटसे तथा सर्वरत्नमय विचित्र कवचसे आच्छादित हुआ कुजम्भ अपने महान् तेजस्वी रथके द्वारा श्वेत रश्मियोंसे युक्त चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था ॥ १५-१६ ॥
शातकौम्भेन महता तालवृक्षेण केतुना । रराज रथमध्यस्थो मेरुस्थ इव भास्करः ॥ १७ ॥ तालवृक्षके चिह्नवाले सोनेके बने हुए विशाल ध्वजसे
भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८८७
उपलेखित रथके भीतर बैठा हुआ वह दैत्य मेरु पर्वतके शिखरपर विराजमान सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥ १७॥
रणपटुरतिवीर्यसत्त्वबुद्धिः सुरसमराभिमुखः प्रयाति तूर्णम् । असुरगणसमावृतः कुजम्भ- स्त्रिदशगणैरिव वृत्रहामरेन्द्रः ॥ १८ ॥
जैसे वृत्रासुरका नाश करनेवाले देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए चलते हैं, उसी प्रकार युद्धकुशल, अतिशय वीर्य, सत्त्व तथा बुद्धिसे युक्त कुजम्भ असुरोंसे घिरकर देवताओंसे युद्धके लिये उत्सुक हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ रहा था ॥ १८॥
असिलोमा च तत्रैव दानवः पर्वतायुधः । दारुणं वपुरास्थाय दारुणो दारुणाननः ॥ १९ ॥
वहीं असिलोमा नामक दानव भी उपस्थित था, जो बड़े-बड़े पर्वतखण्डोंको ही आयुधके रूपमें धारण करता था। वह दारुण स्वभावका दानव दारुण शरीर धारण करके वहाँ आया था, उसका मुख बड़ा ही दारुण (निर्दय) प्रतीत होता था ॥ १९ ॥
रौद्रः शकटचक्राक्षो महाकायो महाबलः । कृष्णवासा महादंष्ट्रः किरीटी लोहिताननः ॥ २० ॥
वह महाबली महाकाय दानव देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसके नेत्र गाड़ीके पहियोंके समान जान पड़ते थे। वह काले रंगका वस्त्र धारण करता था। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं। उसका मुँह लाल था और वह मस्तकपर मुकुटसे सुशोभित था ॥ २० ॥
वृतो दैत्यसहस्रैर्वैर्गिरिपादपयोधिभिः । नानारूपधरैर्दृप्तैर्दैत्यैस्त्रिदशशत्रुभिः ॥ २१ ॥
पर्वतखण्डों और वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले नाना रूपधारी, बलाभिमानी और देवद्रोही सहस्रों दैत्य उसे घेरकर खड़े थे ॥ २१ ॥
ते शूलहस्ता गगने चरन्त इतस्ततस्तोयदवृन्दतुल्याः । खं छादयन्तस्तपनीयनिष्का यथोन्नताः प्रावृषि कालमेघाः ॥ २२ ॥
वे दैत्य हाथोंमें त्रिशूल लेकर मेघसमूहके समान व्योममण्डलमे इधर-उधर विचरते थे। उनके कण्ठमें सोनेके पदक प्रकाशित हो रहे थे, अतः वे वर्षाऋतुमें उमड़-घुमड़कर आये हुए (विद्युत्सहित) काले मेघोंके समान आकाशमें छा रहे थे ॥ २२ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वृत्रो नाम महासुरः । देवशत्रुर्महाकायस्ताम्रास्यो निर्नतोदरः ॥ २३ ॥
दनायुषाका पुत्र वृत्र नामक महान् असुर भी वहाँ युद्धके लिये उपस्थित था, उस विशालकाय देवद्रोही दैत्यका मुख ताँबेके समान लाल था और पेट भीतरकी ओर दबा हुआ था ॥ २३ ॥
दीप्तजिह्वो हरिशमश्रूरूर्ध्वरोमा महाहनुः । नीलाङ्गो लोहितमुखः किरीटी लोहिताम्बरः ॥ २४ ॥ आजानुबाहुर्विकृतः श्वेतदंष्ट्रो विभीषणः । महामायाधरो भीमो हेमकेयूरभूषणः ॥ २५ ॥
उसकी जीभ आगके समान चमक रही थी, दाढ़ी, मूँछ नीली थीं, रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए थे और ठोड़ी मांसल थी। नीला शरीर, लाल मुँह, लाल वस्त्र और मस्तकपर किरीट, बड़ी-बड़ी बाहें, विकृत रूप, सफेद दाढ़ें और भयानक आकृति—यही उसके रूप-रंगका परिचय है। वह बड़ी-बड़ी माया धारण करनेवाला भीमकाय दैत्य सोनेके बाजूबंदसे विभूषित था ॥ २४-२५ ॥
महता मणिचित्रेण कवचेन तु संवृतः । हेममालाधरो रौद्रश्चक्रकेतुरमर्षणः ॥ २६ ॥
मणिजटित विचित्र एवं महान् कवचसे आच्छादित अङ्गवाला वह अमर्षशील भयंकर दैत्य गलेमें सोनेकी माला धारण करता था। उसके ध्वजमें चक्रका चिह्न बना हुआ था ॥ २६॥
किंकिणीशतसंघुष्टं तपनीयविभूषितम् । युक्तं हयसहस्रेण रक्तध्वजपताकिनम् ॥ २७ ॥
उसके रथमें सैकड़ों छोटी-छोटी घंटियाँ लगी थीं, जिनका मधुर घोष होता रहता था। वह रथ सुवर्णसे विभूषित तथा लाल रंगकी ध्वजा-पताकासे अलंकृत था, उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे ॥ २७ ॥
स्थानीकेन महता युद्धायाभिमुखो ययौ । दिव्यं स्यन्दनमास्थाय दैत्यानां नन्दिवर्धनः ॥ २८ ॥
दैत्योंका आनन्द बढ़ानेवाला वृत्र उस दिव्य रथपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये उत्सुक हो रथोंकी विशाल सेनाके साथ चला ॥ २८ ॥
तपितकनकविन्दुपिङ्गलाक्षो दितितनयोऽसुरसैन्ययुद्धनेता । विकसितकमलाभचारुचक्षुः सितदशनः शुशुभे रथासनस्थः ॥ २९ ॥
उसकी आँखें तपाये हुए सुवर्णकी बूँदोंके समान पिंगल वर्णकी थीं। वह असुर-सेनाके युद्धका नेता था, उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान मनोहर थे। दाँत सफेद और चमकीले थे। रथके आसनपर बैठा हुआ वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था ॥ २९ ॥
एकचक्रस्तु तत्रैव सूर्यचक्र इवोदितः । कालचक्रसमो रौद्रश्चक्रायुध इवोद्यतः ॥ ३० ॥
एकचक्र नामक दैत्य भी वहीं था, जो सूर्यमण्डलके समान उदित हुआ था। वह कालचक्रके समान भयंकर था और चक्रधारी श्रीहरिके समान युद्धके लिये उद्यत था ॥ ३०॥
८८८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्वायसमयं दिव्यं रथमास्थाय भासुरम्।
वृतो दैत्यगणैर्दैत्यैः कालायसशिलायुधैः ॥ ३१ ॥
सम्पूर्णतः लोहेके बने हुए दिव्य एवं तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वह काले लोहे और शिलाखण्डोंके आयुध धारण करनेवाले बलाभिमानी दैत्यसमूहोंसे घिरा हुआ था ॥ ३१ ॥
तस्याशीतिसहस्राणि रथिनां चित्रयोधिनाम्।
सर्वे कालान्तकप्रख्या रुधिराक्षा महाबलाः।
आयसैः काञ्चनैश्चैव संनद्धा वरवर्णिनः ॥ ३२ ॥
उसके साथ विचित्र युद्ध करनेवाले अस्सी हजार रथी योद्धा थे। वे सब-के-सब काल और अन्तकके समान प्रभाव-शाली और महाबली थे। उनके नेत्र लाल थे, वे लोहे और सोनेके बने हुए कवचोंसे सुसज्जित तथा देखनेमें सुन्दर थे ॥
व्यराजन्तान्तरिक्षस्था नीला इव पयोधराः।
सर्वे कालान्तकप्रख्या धीराः समरदुर्जयाः ॥ ३३ ॥
आकाशमें स्थित हुए वे दैत्य नीले मेघोंके समान शोभा पाते थे। वे सभी काल और अन्तकके समान भयंकर, धीर तथा रणदुर्जय थे ॥ ३३ ॥
सागरोदरगम्भीरा नीलचक्रा दुरासदाः।
नेदुर्यान्तोऽसुरवरा वेलातीता इवार्णवाः ॥ ३४ ॥
वे समुद्रके उदरकी भाँति गम्भीर थे। उनके हाथोंमें नीले चक्र थे, उन्हें जीतना बहुत ही कठिन था। वे श्रेष्ठ असुर युद्धके लिये जाते समय अपनी तटभूमि या सीमाको लाँघकर आगे बढ़े हुए समुद्रोंके समान भीषण गर्जना करते थे ॥३४॥
ते भीममायाः सुसमृद्धकायाः
किरीटिनः काञ्चनभूषिताङ्गाः।
ययुस्तदा स्वायुधदीप्तहस्ता
नभः सपक्षा इव पर्वतेन्द्राः ॥ ३५ ॥
उनकी माया भयंकर थी और काया हृष्ट-पुष्ट। उनके मस्तकपर किरीट चमक रहे थे, उनके सारे अङ्ग सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके हाथ अपने-अपने आयुधोंसे उद्दीप्त दिखायी देते थे, वे सब दैत्य उस समय पंखधारी पर्वतराजोंके समान आकाशमें उड़े जा रहे थे ॥ ३५ ॥
संदिष्टो बलिपुत्रेण वृत्रभ्राता महासुरः।
वधाय सुरसैन्यस्य संनह्यस्वेति वीर्यवान् ॥ ३६ ॥
हेममाली महादंष्ट्रः स्रग्वी रुचिरकुण्डलः।
रक्तमाल्याम्बरधरश्चण्डः समरदुर्जयः ॥ ३७ ॥
बलिके पुत्र बाणासुरने वृत्रासुरके भाई एक महान् असुरको यह संदेश दिया कि तुम देवसेनाके वधके लिये कवच धारण करो। यह संदेश पाकर वह पराक्रमी दैत्य सुवर्णकी माला, फूलोंके हार और सोनेके कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये चला। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, वह लाल फूलोंकी माला और लाल वस्त्र धारण करता था। अत्यन्त क्रोधी होनेके साथ ही वह समरभूमिमें दुर्जय था (उसका नाम सम्भवतः वीर या विक्षर था) ॥३६-३७॥
सुमहावृत्तनयनः स किरीटी धनुर्धरः।
प्रभिन्न इव मातङ्गः शार्दूलसमविक्रमः ॥ ३८ ॥
उसके नेत्र बड़े-बड़े और गोलाकार थे। वह मस्तकपर मुकुट और हाथमें धनुष धारण किये हुए था, देखनेमें मदकी धारा बहानेवाले मतवाले हाथीके समान जान पड़ता था। उसका पराक्रम सिंहके समान था ॥ ३८ ॥
महातालनिभं चापं तथा रुचिरसायकम्।
विस्फारयन् महावेगं वज्रनिष्पेषनिःस्वनम् ॥ ३९ ॥
वह बहुत बड़े ताड़के समान विशाल तथा महान् वेगशाली सुन्दर सायकयुक्त धनुषको बारंबार खींच रहा था, ऐसा करनेसे ऐसी टङ्कारध्वनि होती थी मानो वज्रके टकराने-से भयंकर शब्द प्रकट हुआ हो ॥ ३९ ॥
रथेन खरयुक्तेन ध्वजेन भुजगेन ह।
शुशुभे स्यन्दनस्थः स संध्यागत इवांशुमान् ॥ ४० ॥
उसके रथमें गधे जुते हुए थे तथा उसके ऊपर सर्पके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती थी। उस रथपर बैठा हुआ वह दैत्य संध्याकालके सूर्यकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ४० ॥
रथैस्तु बहुसाहस्रैर्हेमपट्टविभूषितैः ।
शूलमुद्गरसम्पूर्णैर्जलपूर्णैरिवाम्बुदैः ।
स दैत्येन्द्रोऽभिचक्राम तस्मिन् युद्ध उपस्थिते ॥ ४१ ॥
उस युद्धके उपस्थित होनेपर वह दैत्यराज स्वर्णपट्टसे विभूषित तथा शूल और मुद्गरसे युक्त कई सहस्र रथोंके साथ आगे बढ़ने लगा। ये रथ जलसे भरे हुए मेघोंके समान जान पड़ते थे ॥ ४१ ॥
पवनसमगतिर्विशालवक्षा
विकसितपङ्कजचारुगर्भगौरः ।
प्रवररथगतो ययौ स तूर्णं
त्रिदशगणैरभिलक्षितप्रभावः ॥ ४२ ॥
वायुके समान उसकी प्रखर गति थी, वक्षःस्थल विशाल था, प्रफुल्ल कमलके मनोहर भीतरी भागके समान उसकी गौर कान्ति थी, वह उस श्रेष्ठ रथपर बैठकर तुरंत युद्धके लिये चल दिया। देवताओंने उसके प्रभावको अनेक बार देखा था ॥ ४२ ॥
सिंहिकातनयश्चैव राहुर्नाम महासुरः।
विकटः पर्वताकारः शतशीर्षा शतोदरः ॥ ४३ ॥
सिंहिकाका पुत्र राहु नामक महान् असुर भी युद्धके लिये आया था। उसकी आकृति बड़ी विकट थी, डीलडौल पर्वतके समान जान पड़ता था। उसके सैकड़ों सिर और पेट थे ॥ ४३ ॥
पीतमाल्याम्बरधरो जाम्बूनदविभूषितः।
सिताभ्रवैडूर्यसंकाशः पद्मपत्रनिभेक्षणः ॥ ४४ ॥
भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ·८८९
वह पीले रंगके फूलोंकी माला और पीला ही वस्त्र धारण करता था, जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित था। स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान उसकी श्याम कान्ति थी तथा कमलदलके समान सुन्दर नेत्र थे ॥ ४४ ॥
सर्वकाञ्चनसंयुक्तं मणिजालपरिष्कृतम् ।
पताकाशतसंकीर्णं युक्तं परमवाजिभिः ॥ ४५ ॥
उसका रथ पूर्णतः सुवर्णसे जड़ा हुआ था। मणिमय झालरोंसे उसको सजाया गया था। वह सैकड़ों पताकाओंसे व्याप्त था तथा उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे ॥ ४५ ॥
आरुरोह रथं दिव्यं दैत्यः परमवीर्यवान् ।
ननाद च महानादं कम्पयन् वसुधातलम् ॥ ४६ ॥
वह परम पराक्रमी दैत्य उस दिव्य रथपर आरूढ़ हुआ और पृथ्वीतलको कँपाता हुआ बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ४६ ॥
मयेन विहितो दिव्यस्तस्य केतुर्हिरण्मयः ।
मयूरपक्षसंकाशं कवचं चायसं महत् ॥ ४७ ॥
मयासुरने उसके लिये दिव्य सुवर्णमय ध्वजका निर्माण किया था, साथ ही मोरपंखके समान विशाल लौहमय कवच भी बनाया था ॥ ४७ ॥
भीमवेगरवैश्चान्यै रथैर्दिव्यैः सुभासुरैः ।
नानाप्रहरणार्कीर्णैः सेव्यमानो महाबलः ॥ ४८ ॥
उस महाबली दानवकी सेवामें भयंकर वेग और शब्दवाले दूसरे-दूसरे बहुत से दिव्य एव तेजस्वी रथ भी उपस्थित थे, जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरे हुए थे ॥ ४८ ॥
असुरगणपतिर्गजेन्द्रगामी
अतिरभसगतिर्महासुराणाम् ।
अरिगणमभिते विभुः प्रयातो
गिरिवरमस्तमिवांशुमान् सुदीप्तः ॥ ४९ ॥
असुरगणोंका स्वामी राहु गजराजके समान मस्तीके साथ चलता था। उन महान् असुरोंमें उसकी चाल बहुत तेज थी। वह प्रभावशाली योद्धा शत्रुसमूहके पास उसी प्रकार बढ़ता चला गया, जैसे अत्यन्त दीप्तिमान् सूर्य अस्ताचलके समीप चले जा रहे हों ॥ ४९ ॥
विप्रचित्तिस्तु तत्रैव दनोर्वंशविवर्धनः ।
कश्यपस्यात्मजः श्रीमान् ब्रह्मणस्तेजसा समः॥ ५० ॥
दानववंशकी वृद्धि करनेवाला विप्रचित्ति भी वहीं आ पहुँचा था। वह कान्तिमान् दानव साक्षात् कश्यपजीका पुत्र तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी था ॥ ५० ॥
यष्टा क्रतुसहस्त्राणां वेदवित् तपसान्वितः ।
स्वयम्भुवा दत्तवरो वरदश्च स्वयम्भुवः ।
ईशित्वं च महत्त्वं च वशित्वं च महाद्युतेः ॥ ५१ ॥
वह सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला, वेदवेत्ता और तपस्वी था। ब्रह्माजीने उसे वर दे रक्खा था और वह स्वयं भी ब्रह्माजीको वर देनेमें समर्थ हो गया था। उस महातेजस्वी विप्रचित्तिको ईशित्व, महत्त्व (महिमा) और वशित्व आदि सिद्धियाँ उपलब्ध थीं ॥ ५१ ॥
ऐश्वर्यगुणसम्पन्नो ब्रह्मेव स्वयमूर्जितः ।
सार्धं पुत्रैश्च पौत्रैश्च संनद्धात महाबलः ॥ ५२ ॥
वह ब्रह्माजीके समान ऐश्वर्य-गुणसे सम्पन्न तथा ओजस्वी था। वह महाबली दानव अपने पुत्रों और पौत्रोंके साथ कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ ५२ ॥
सर्वे मायाधराः शूराः कृतास्त्रा रणदुर्जयाः ।
सर्वे कमलवर्णाभा हेमकूटोच्छ्रयोच्छ्रयाः ॥ ५३ ॥
वे सब-के-सब माया धारण करनेवाले, शूर, अस्त्रवेत्ता तथा रणदुर्जय थे। उन सबकी कान्ति कमलके समान थी। वे हेमकूट पर्वतके शिखरके समान ऊँचे कदके थे ॥ ५३ ॥
सर्वे रजतसंकाशाः कैलासशिखरोपमाः ।
मयेन निर्मितास्तेषां सर्वे मायामया रथाः ॥ ५४ ॥
वे सब-के-सब रूप-रंग और वेष-भूषासे रजत (चाँदी) के समान श्वेत प्रतीत होते थे। कैलास-शिखरके समान जान पड़ते थे। मयने उन सबके लिये मायामय रथका निर्माण किया था ॥ ५४ ॥
विचरन्तो व्यराजन्त शारदा इव तोयदाः ।
सर्वे हंसध्वजाः श्वेताः श्वेतदण्डसमुच्छ्रयाः ॥ ५५ ॥
उन सभी रथोंपर हंसचिह्नित श्वेत ध्वज फहराते थे तथा उन उन्नत श्वेत दण्डोंके कारण उन रथोंकी ऊँचाई बहुत बढ़ गयी थी। वे रथ शरद् ऋतुके श्वेत बादलोंके समान आकाशमें विचरते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ५५ ॥
श्वेताम्बरधरा दैत्याः श्वेतमाल्यविभूषिताः ।
श्वेतातपत्राः सर्वे ते श्वेतकुण्डलखण्डिताः ॥ ५६ ॥
वे दैत्य श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे और श्वेत पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे। उन सबके छत्र भी श्वेत ही थे और उनके कानोंमें श्वेत कुण्डल शोभा दे रहे थे ॥ ५६ ॥
मुक्ताहारवृतोरस्का भान्ति नाकेश्वरा इव ।
महाग्रहनिभाकाराः शत्रूणां लोमहर्षणाः ॥ ५७ ॥
रक्तचित्राम्बरधराश्चित्राभरणभूषिताः ।
उनके वक्षःस्थल मोतियोंके हारोंसे अलंकृत थे। वे स्वर्गलोकके अधीश्वर-से जान पड़ते थे। उनके आकार महान् ग्रहोंके समान तेजस्वी थे और वे शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देते थे। उनमेंसे कितने ही दानव लाल और विचित्र वस्त्र धारण करनेवाले तथा विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे ॥
त्रैलोक्यविजयं नाम रथमास्थाय वीर्यवान् ।
कैलासशिखराकारमष्टनल्वायतान्तरम् ॥ ५८ ॥
पराक्रमी विप्रचित्ति 'त्रैलोक्यविजय' नामक रथपर आरूढ़ होकर आया था। उस रथका आकार कैलासशिखरके समान था। उसके भीतरी भागकी लम्बाई बत्तीस हाथकी थी ॥
| ८९० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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युक्तं वाजिसहस्रेण सितेन सितवर्चसा।
पताकाशतसंछन्नं नानायुद्धविकल्पितम्॥ ५९॥
उसमें श्वेत कान्तिसे युक्त एक सहस्र श्वेत घोड़े जुते हुए थे। वह सैकड़ों पताकाओंसे आच्छादित था तथा उसके भीतर नाना प्रकारके आयुध सजाकर रखे गये थे॥ ५९॥
हिमांशुकुन्दप्रतिमं विशालं सितातपत्रं दनुजेश्वरस्य।
विभाति तस्योपरि धार्यमाणं श्वेताद्रिमूर्धोपगतः शशाङ्कः॥ ६०॥
उस दानवराजके ऊपर तना हुआ इन्दु और कुन्दके समान वर्णवाला विशाल श्वेत छत्र श्वेताचलके शिखरपर उदित हुए चन्द्रदेवके समान शोभा पा रहा था॥ ६०॥
केशी दानवमुख्यस्तु जिह्माताम्राक्षदर्शनः।
नीलमेघचयप्रख्यः कालः पुरुषविग्रहः॥ ६१॥
दानवोंमें प्रधान केशी बड़ा कुटिल था। उसके नेत्र ताँबेके समान लाल दिखायी देते थे। उसकी कान्ति मेघोंकी काली घटाके समान थी। वह पुरुषके आकारमें काल था॥
महाग्रहनिभाकारः शत्रूणां लोमहर्षणः।
चित्रमाल्याम्बरधरो रक्ताभरणभूषितः॥ ६२॥
उसकी आकृति विशाल ग्रहके समान थी। वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसने विचित्र माला और वस्त्र धारण कर रखे थे तथा वह लाल रंगके आभूषणोंसे विभूषित था॥ ६२॥
शताक्षः शतबाहुश्च हरिमश्रुर्महाबलः।
शङ्कुकर्णो महानादो वपुषा घोरदर्शनः॥ ६३॥
सौ आँखें, सौ भुजाएँ, (पचास मुख) काली या नीली दाढ़ी-मूँछ, खूँटे-जैसे कान तथा शरीर देखनेमें भयंकर—यही उसकी रूपरेखा थी। वह महाबली दानव बड़े जोरसे गर्जना करता था॥ ६३॥
युक्तं महिषकैर्दिव्यैर्घण्टाकोटिकृतस्वनम्।
महावारिधराकारमास्थाय रथमुत्तमम्॥ ६४॥
उसके उत्तम रथका आकार महान् मेघके समान था। उसमें करोड़ों घण्टाओंकी ध्वनि होती रहती थी तथा उसमें दिव्य भैंसे जुते हुए थे। केशी उसी रथपर आरूढ़ होकर आया था॥
ध्वजेनोष्ट्रेण महता नीलकेसरवर्चसा।
नानारागविचित्राभिः पताकाभिर्विभूषितम्॥ ६५॥
वह रथ नील केसरकी-सी कान्ति और ऊँटके चिह्नवाले विशाल ध्वजसे तथा नाना रंगोंके कारण विचित्र दिखायी देनेवाली पताकाओंसे अलंकृत था॥ ६५॥
द्विपञ्चाशत्सहस्राणि रथानामुग्रवर्चसाम्।
ययुस्तस्यासुरेन्द्रस्य प्रयातस्य सुरान् प्रति॥ ६६॥
देवताओंकी ओर बढ़े जाते हुए उस असुरेश्वर केशीके साथ भयंकर तेजवाले बावन हजार रथी भी जा रहे थे॥६६॥
भान्ति भिन्नाञ्जननिभाः प्रयातस्य महात्मनः।
दंष्ट्रार्धचन्द्रवदनाः सबलाका इवाम्बुदाः॥ ६७॥
यात्रा करते समय कटे हुए कोयलेके समान काले और दाढ़ोंके कारण अर्धचन्द्राकार प्रतीत होनेवाले उस महाकाय दानवके मुख बगुलोंकी पंक्तियोंसे युक्त मेघोंके समान जान पड़ते थे॥ ६७॥
तत् तस्य वैदूर्यसुवर्णचित्रं विद्युत्प्रभं भास्कररश्मितुल्यम्।
किरीटमाभात्यसुरोत्तमस्य दावाग्निदीप्तं शिखरं यथाद्रेः॥ ६८॥
असुरशिरोमणि केशीका किरीट वैदूर्यमणि और सुवर्णके संयोगसे विचित्र शोभा पाता था, विद्युत्की-सी प्रभासे प्रकाशित हो रहा था तथा सूर्यकी रश्मियोंके समान उद्भासित होता था। उससे केशीका मस्तक दावानलसे उद्दीप्त हुए पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होता था॥ ६८॥
वृषपर्वासुरश्चैव श्रीमांश्च सुरसूदनः।
आरुरोह रथं दिव्यं मेरुशृङ्गमिवांशूमान्॥ ६९॥
देवताओंका संहार करनेवाला तेजस्वी असुर वृषपर्वा अपने दिव्य रथपर उसी प्रकार आरूढ़ हुआ, जैसे अंशुमाली सूर्य मेरु पर्वतके शिखरपर आरूढ़ होते हैं॥ ६९॥
प्रवालजाम्बूनदचित्रकूबरं महार्थ्यं भारसहं महार्हम्।
स्वलंकृतं राजतनेमिमण्डलं गभस्तिनक्षत्रतडिन्निकाशम्॥ ७०॥
उसके महान् रथका कूबर मूँगे और सुवर्णसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा पाता था। वह बहुमूल्य रथ भार सहन करनेमें समर्थ था। उसके पहियोंका नेमि-भाग (किनारा) चाँदीसे मँढ़ा गया था। उस रथको अच्छी तरह सजाया गया था। वह सूर्यकी किरणों, नक्षत्रों तथा विद्युत्के समान प्रकाशित होता था॥ ७०॥
केयूरयुक्ताङ्गदबद्धबाहुः सहस्रतारेण च चर्मणा सः।
सांग्रामिकैराभरणैश्च चित्रैर्मध्याह्नसूर्यप्रतिमो बभूव॥ ७१॥
वृषपर्वाने अपनी भुजाओंमें केयूरयुक्त अङ्गद (बाजू-बंद) पहन रखे थे। वह सहस्र तारिकाओंके चिह्नोंसे युक्त ढाल तथा युद्धोपयोगी विचित्र आभूषणोंसे सुशोभित हो मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति देदीप्यमान होता था॥ ७१॥
महाबलो बद्धतलाङ्गुलित्रो बलोत्कटः किंशुकलोहिताक्षः।
प्रगृह्य चामीकरचारुचित्रं चापं स्थितो वृत्तविशालनेत्रः॥ ७२॥
उसका बल महान् था। उसने अपने दोनों हाथोंमें
भविष्यपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९१
दस्ताने बाँध रखे थे। वह बलसे उन्मत्त हो रहा था। उसकी आँखें पलाशके फूलकी भाँति लाल थीं। वह सुवर्णसे जटिल होनेके कारण मनोहर एवं विचित्र धनुष लेकर खड़ा था। उसके नेत्र गोल गोल और बड़े-बड़े थे॥ ७२ ॥
महासुरेन्द्रश्च महासुरैर्वृतो बलिस्तदा स्यन्दनमारुरोह । वैदूर्यहैमोपचितं विशालं विद्युतप्रभं षोडशनलवमात्रम् ॥ ७३ ॥
तदनन्तर उस समय बड़े-बड़े असुरोंसे घिरे हुए महान् असुरराज बलि रथपर आरूढ़ हुए। उनका वह विशाल रथ वैदूर्यमणि और सुवर्णसे जटिल था, विद्युत्के समान प्रकाशित होता था और उसकी लंबाई चौसठ हाथकी थी ॥ ७३ ॥
युक्तं सहस्रेण दितेः सुतानां गजाननानां विकृताकृतीनाम् । चामीकरोरःस्थलभूषितानां प्रनर्दतां प्रावृषि चाम्बुदानाम् ॥ ७४ ॥
उसमें हाथीके-से मुख और विकट आकारवाले एक सहस्र दैत्य जुते हुए थे। उन सबके वक्षःस्थल सुवर्णसे विभूषित थे तथा वे वर्षाकालके मेघोंके समान जोर-जोरसे गर्जना करते थे ॥ ७४ ॥
महारथं देवरथप्रकाशं सहस्रमायेन मयेन सृष्टम् । ईहामृगाक्रीडितभक्तिचित्रं दिव्यं रथं दिव्यरथानुयातम् ॥ ७५ ॥
वह महान् रथ देवताओंके रथ (विमान) की भाँति प्रकाशित होता था। सहस्रों मायाओंके ज्ञाता मयासुरने उसका निर्माण किया था। उसके भीतर क्रीडा-मृग और उनके क्रीडास्थलके विभिन्न चित्र बने हुए थे, जो उस दिव्य रथकी शोभा बढ़ाते थे। उस रथके पीछे और भी बहुत-से दिव्य रथ चलते थे ॥ ७५ ॥
सकिङ्किणीकं विमलं सुविस्तृतं हिरण्मयैः पद्मशतैरलंकृतम् । अभ्याददे वैजयिकीं जयाय स्रजं बलिर्हैमविचित्रपुष्पाम् ॥ ७६ ॥
उसमें छोटी-छोटी घण्टियाँ लगी थीं। वह निर्मल एवं सुविस्तृत रथ सैकड़ों सुवर्णमय कमलोंसे अलंकृत था। उसपर आरूढ़ होकर बलिने विजयके लिये वैजयन्तीकी माला ग्रहण की, जिसमें विचित्र सुवर्णमय पुष्प गुँथे हुए थे ॥ ७६ ॥
आबध्य मालां प्रभया विचित्रां बलिस्तदा भाति भुजैर्विशालैः । रराज तैः सर्वसमृद्धियुक्तै- र्महार्चिषा सूर्य इवाम्बरस्थः ॥ ७७ ॥
उस समय राजा बलि वह दिव्य प्रभासे युक्त विचित्र माला धारण करके सम्पूर्ण समृद्धियोंसे युक्त अपनी विशाल भुजाओंके द्वारा उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे आकाशमें स्थित हुए सूर्य अपनी महाप्रभासे अत्यन्त उद्भासित होते रहते हैं ॥
स्रजं तदा बध्नति चास्य दुर्गा सर्वासुराणामिव हारभूताम् । वैरोचनिः सर्वश्रियाभिजुष्टो विभ्राजतेऽसौ शरदीव चन्द्रः ॥ ७८ ॥
उस समय साक्षात् दुर्गादेवीने समस्त असुरोंके लिये हारस्वरूप उस पुष्पमालाको बलिके गलेमें पहनाया था। उसे पहनकर सब प्रकारकी शोभा-सम्पत्तिसे सेवित विरोचन-कुमार बलि शरद्-ऋतुके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगे ॥ ७८ ॥
मेरोस्तटे वा ज्वलनप्रकाशे ह्यादित्यसंयुक्तमिवाभ्रजालम् । प्रासांश्च पाशांश्च हिरण्यबद्धा वर्माणि खड्गांश्च परश्वधांश्च ॥ ७९ ॥ धनूंषि वज्रायुधसप्रभाणि दिव्या गदा वज्रमुखाश्च शक्त्यः । दिव्याश्च खङ्गा विशिखाश्च दीप्ता नाराचपूर्णा विविधाश्च तूणाः ॥ ८० ॥ धृता रथे दैत्यवृषस्य तस्य चकाशिरे प्रज्वलिता यथोल्काः ।
अथवा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले मेरु पर्वतके तट-प्रान्तमें सूर्यसे संयुक्त हुए मेघसमूहकी जैसी शोभा होती है, वैसी ही शोभा उस समय राजा बलिकी हो रही थी। उन दैत्यप्रवर बलिके रथमें प्रास, सुवर्णजटिल पाश, कवच, खड्ग, फरसे, वज्रके समान प्रकाशित होनेवाले धनुष, दिव्य गदा, वज्रमुखी शक्तियाँ, दिव्य खड्ग, प्रज्वलित बाण तथा उन बाणोंसे भरे हुए नाना प्रकारके तरकस रखे गये थे, जो प्रज्वलित उल्काओंके समान प्रकाशित होते थे ॥७९-८०½॥
तं चामरापीडधराः सुदंष्ट्राः सुवर्णमुक्तामणिहेमचित्राः ॥ ८१ ॥ वीजन्ति वालव्यजनैर्विनीता महासुराः स्यन्दनवेदिकास्थाः ।
हाथमें चँवर और सिरपर पगड़ी धारण किये, सोना, मोती, मणि और हेमके विचित्र आभूषणोंसे अलंकृत, सुन्दर दाढ़ोंवाले और विनयशील महान् असुर उस रथकी वेदिका-पर खड़े हो बालव्यंजनों (चँवरों) से राजा बलिको हवा करते थे ॥ ८१½ ॥
अयःशिरा अश्वशिरा दुरापः शिविर्मतङ्गो विशिराः शताक्षः ॥ ८२ ॥ अयो निकुम्भः क्रथनश्च दानवो ररक्षिरे ते दश दानवाधिपम् ।
अयःशिरा, अश्वशिरा, दुराप, शिवि, मतङ्ग, विशिरा
| ८९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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शताक्ष, अयस्, निकुम्भ और कथन—ये दस दानव दानवराज बलिकी रक्षामें तत्पर रहते थे ॥ ८२ १/२ ॥
पुरश्चराश्चैव सहस्रशोऽसुराः पदातयो दानवराजरक्षिणः ॥ ८३ ॥ शतघ्निचक्राशनिशक्तिपाणयः प्रजग्मुरग्रेऽनिलतुल्यवेगिनः ।
दानवराज बलिकी रक्षाके लिये हजारों पैदल असुर उनके आगे-आगे भी चलते थे । वे सब शतघ्नी, चक्र, अशनि और शक्ति हाथमें लेकर वायुके समान वेगसे आगे-आगे चल रहे थे ॥ ८३ १/२ ॥
घण्टाः सुशब्दास्तपनीयबद्धा आडम्बरा गर्गरडिण्डिमाश्च ॥ ८४ ॥ महारवा दुन्दुभयश्च नेदू रथप्रयाणे दितिजेश्वरस्य ।
दैत्यराज बलिको रथ जब प्रस्थित हुआ, उस समय सुवर्णजटित घण्टे सुन्दर शब्द करते हुए बजने लगे । तुरही वा बिगुल, गर्गर (प्राचीन वाद्यविशेष), नगाड़े तथा महान् शब्द करनेवाली दुन्दुभियाँ—इन सबकी तुमुल ध्वनि होने लगी ॥ ८४ १/२ ॥
तस्योत्थितः काञ्चनवेदिकाढ्यो हिरण्मयो दिव्यमहापताकः ॥ ८५ ॥ महाध्वजो वै तपनीयनद्धो रराज वीरस्य यथा विवस्वान् ।
वीर राजा बलिको सुवर्णजटित और विशेषतः सोनेका ही बना हुआ विशाल ध्वज ऊपरको उठा हुआ था, उसकी दिव्य पताका बहुत बड़ी थी तथा वह सुवर्णमयी वेदीसे संयुक्त था । वह विशाल ध्वज भगवान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था ॥ ८५ १/२ ॥
समुच्छ्रितं काञ्चनमातपत्रं स्रक्काञ्चनी वक्षसि चास्य भाति ॥ ८६ ॥ समन्ततश्चाप्यसुराश्चरन्ति दैत्यर्षयः प्राञ्जलयो जयन्ति ।
राजा बलिके ऊपर सोनेका ऊँचा छत्र तना हुआ था और उनके वक्षःस्थलपर सुवर्णमयी माला शोभा पा रही थी । उनके चारों ओर बहुत-से असुर विचरते थे और दैत्य, ऋषि हाथ जोड़कर जय-जयकार करते थे ॥ ८६ १/२ ॥
पुरोहिताः शत्रुवधे समाहिता- स्तथैव चान्ये श्रुतशीलवृद्धाः ॥ ८७ ॥ जपैश्च मन्त्रैश्च तथौषधीभि- र्महात्मनः स्वस्त्ययनं प्रचक्रुः ।
राजा बलिके पुरोहित तथा वेद और शीलमें बढ़े-चढ़े दूसरे ब्राह्मण राजाके शत्रुओंके वधके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो मन्त्रजप, वेदपाठ तथा ओषधियोंके प्रयोगद्वारा उन महात्मा नरेशके लिये स्वस्तिवाचन करते थे ॥ ८७ १/२ ॥
स तत्र वस्त्राणि शुभांश्च गावः फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् ॥ ८८ ॥ वलिर्द्विजेभ्यः प्रयतः प्रयच्छन् विराजतेऽतीव यथा धनेशः ।
राजा बलि अपने मनको संयममें रखकर वहाँ उन ब्राह्मणोंको वस्त्र, सुन्दर गौएँ, फल-फूल और पदक अधिक मात्रामें देते हुए धनाध्यक्ष कुबेरके समान अतिशय शोभा पा रहे थे ॥ ८८ १/२ ॥
सहस्रसूर्यो बहुकिङ्किणीकः परार्ध्यजाम्बूनदहेमचित्रः ॥ ८९ ॥ सहस्रचन्द्रायुततारकश्च रथो वलेरग्निरिवावभाति ।
बलिको रथ सहस्र सूर्योंके चित्रसे शोभित था, उसमें बहुत-सी छोटी-छोटी घंटियाँ लटकायी गयी थीं । उसमें बहुमूल्य जाम्बूनद और सुवर्ण जड़े गये थे, जिनसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । सहस्रों चन्द्रमाओं तथा दस हजार तारिकाओंसे युक्त बलिको वह रथ अग्निके समान उद्भासित हो रहा था ॥ ८९ १/२ ॥
तमास्थितो दानवसंगृहीतं महाबलः कार्मुकधृक् सवाणः ॥ ९० ॥ उद्धर्तिष्यंस्त्रिदशेन्द्रसेना- मतीव रौद्रं स विभर्ति रूपम् ।
उस रथकी वागडोर एक दानवने ले रखी थी। महाबली बलि उसपर आरूढ़ हो धनुष और बाण लेकर अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये हुए थे । उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वे देवेन्द्रकी सेनाका संहार कर डालेंगे ॥
स वेगवान् वीररथौघसंकुलः प्रयाति देवान् प्रति दैत्यसागरः ॥ ९१ ॥ महार्णवो वीचितरङ्गसंकुलो यथा जलौघैर्युगसंक्षये तथा ।
वीर रथियोंके प्रवाहसे व्याप्त हुआ वह वेगशाली दैत्य-सागर देवताओंकी ओर बढ़ा जा रहा था । ठीक उसी तरह जैसे प्रलयकालमें जलके प्रवाह और उत्ताल तरङ्गोंसे व्याप्त महासागर समस्त त्रिलोकीको डुबो देनेके लिये बढ़ने लगता है ॥
त्रैलोक्यवित्रासकरैर्वपुर्भि- स्तान्यग्रतो यान्ति वले रथस्य ॥ ९२ ॥ महाबलान्युच्छ्रितकार्मुकाणि सपर्वतानीव वनानि राजन् ॥ ९३ ॥
| भविष्यपर्व ] | द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः | ८९३ |
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राजन् ! बलिके रथके आगे उनके बड़े-बड़े सैनिक धनुष उठाये तीनों लोकोंको भयभीत कर देनेवाले शरीरोंसे बढ़े जा रहे थे, उस समय वे पर्वतोंसहित वनोंके समान जान पड़ते थे ॥ ९२-९३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने बलेरुद्योगे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसङ्गमें बलिके उद्योगविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
इन्द्र आदि देवताओं और लोकपालोंका युद्धके लिये उद्योग और प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरो जनमेजय ।
भूयस्त्रिदशसैन्यस्य शृणु विस्तरमादितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तुमने दैत्योंकी सेनाका विस्तारपूर्वक वर्णन सुन लिया; अब पुनः देवताओंकी सेनाका विस्तार आरम्भसे ही बता रहा हूँ, सुनो ॥ १ ॥
सुराधिपस्तु भगवानाज्ञापयत वै सुरान् ।
मरुद्गणांस्तथादित्यान् विश्वान् देवांश्च वासवः ॥ २ ॥
वस्तूनथौ भृशं सर्वान् यक्षरक्षोमहोरगान् ।
विद्याधरगणान् सर्वान् गन्धर्वांश्च महाबलान् ॥ ३ ॥
महार्णवांश्च शैलांश्च तथा रुद्रान् महौजसः ।
यमवैश्रवणौ चोभौ वरुणं च जनाधिपम् ॥ ४ ॥
देवताओंके अधिपति भगवान् इन्द्रने देवता, मरुद्गण, आदित्य, विश्वेदेव, आठ वसु, यक्ष, राक्षस, बड़े-बड़े नाग, समस्त विद्याधर-गण, महाबली गन्धर्व, महासागर, पर्वत, महातेजस्वी रुद्र, यम, कुबेर तथा राजा वरुणको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी ॥ २-४ ॥
ये तु सिद्धा महात्मानः पितरश्च मनस्विनः ।
राजर्षयश्च शतशो योगसिद्धास्तथैव च ॥ ५ ॥
त्रिदशाज्ञापकः शक्र आज्ञापयति वीर्यवान् ।
भवन्तो दैत्यनाशाय संनह्यन्तामिति प्रभुः ॥ ६ ॥
उनके आदेशकी घोषणा इस प्रकार हुई—'जो सिद्ध महात्मा हैं, जो मनस्वी पितर हैं तथा जो राजर्षि और सैकड़ों योग-सिद्ध पुरुष हैं, उन सबको सर्वसमर्थ, देवशासक, पराक्रमी इन्द्र आज्ञा देते हैं कि आपलोग दैत्योंका विनाश करनेके लिये कमर कसकर तैयार हो जायें' ॥ ५-६ ॥
शक्रस्य वचनं श्रुत्वा ततः सर्वे दिवौकसः ।
संनह्यन्त महात्मानः शक्रस्य समविक्रमाः ॥ ७ ॥
देवेन्द्रका यह वचन सुनकर उनके समान ही पराक्रम प्रकट करनेवाले समस्त महामनस्वी देवता युद्धके लिये तैयार होने लगे ॥ ७ ॥
नानाकवचिनः सर्वे विचित्रकवचध्वजाः ।
नानायुधोद्यतकरा मत्ता इव महागजाः ॥ ८ ॥
उन सबने नाना प्रकारके कवच धारण किये। उनके कवच और ध्वज विचित्र थे । वे हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे और मतवाले गजराजोंके समान युद्धके लिये उद्यत थे ॥ ८ ॥
केचिदारुरुहुर्व्याघ्रान् केचिदारुरुहुर्गजान् ।
केचिदारुरुहुर्नागान् केचिदारुरुहुर्वृषान् ॥ ९ ॥
उनमेंसे कुछ लोग व्याघ्रोंपर सवार थे और कुछ लोग हाथियोंपर । कोई नागोंपर चढ़े थे और कोई बैलोंपर ॥ ९ ॥
हरिनेत्रो हरिशमश्रुर्द्विरदैरावतध्वजम् ।
रथं हरिहयैर्युक्तं स प्रायात् समरं प्रति ॥ १० ॥
इन्द्रके नेत्र सिंहके समान चमकीले हैं, उनकी मूँछ नीले रंगकी है, उनका ध्वज ऐरावत हाथीसे चिह्नित है, उनके रथमे हरे रंगके घोड़े जुते हुए हैं । वे उसी रथपर आरूढ़ हो समरकी ओर चले ॥ १० ॥
आदित्यवर्णं विरजं सुधौतं
त्वष्ट्रा स्वयं निर्मितमीश्वरार्थम् ।
जालैश्च जाम्बूनद्भक्तिचित्रै-
रलंकृतं काञ्चनदामभिश्च ॥ ११ ॥
उस रथकी कान्ति सूर्यके समान थी । वह निर्मल तथा स्वच्छ धुला हुआ था । साक्षात् विश्वकर्माने इन्द्रके लिये उसका निर्माण किया था। वह सोनेकी जालियों, जाम्बूनदकी चित्रभङ्गी तथा सुवर्णकी लड़ियोंसे अलंकृत था ॥ ११ ॥
सकूबरोपस्करवन्धुरेषं
विद्युत्प्रभाभिः कृतमाभिताम्रम् ।
कैलासशृङ्गोपममिन्द्रयानं
सुचारुचारुं प्रतिचक्रचक्रम् ॥ १२ ॥
कूबर, अन्य उपकरण तथा मनोहर ईषादण्डसहित वह रथ विद्युत्की प्रभासे ताम्रवर्णका हो गया था । वह इन्द्र-यान कैलास-शिखरके समान दिखायी देता था और मनोहरसे भी मनोहर तथा शत्रुमण्डलीपर शासन करनेवाला था ॥ १२ ॥
तारासहस्रैः खचितं ज्वलद्भि-
र्देवार्हमाल्यार्चितसर्वदेहम् ।
८९४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
समुच्छ्रितश्रीध्वजमक्षयाक्षं प्रज्वाल्यमानं पुरुषोत्तमेन ॥ १३ ॥ उसमें सहस्रों प्रकाशमान तारे जड़े हुए थे। उस रथका सम्पूर्ण अङ्ग देवोचित मालाओंसे पूजित था। उसमें शोभा-शाली ऊँचा ध्वज फहरा रहा था तथा उसका धुरा कभी क्षीण होनेवाला नहीं था। पुरुषोत्तम इन्द्रकी कान्तिसे वह रथ और भी उद्भासित हो रहा था ॥ १३ ॥
आस्थाय तं भास्करमाशुवेगं शचीपतिर्लोकपतिः सुरेशः । वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता ययौ महात्मा भगवान् महेन्द्रः ॥ १४ ॥ तीव्र वेगसे चलनेवाले उस तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके ईश्वर वज्रधारी भुवनरक्षक शचीपति महात्मा भगवान् महेन्द्र युद्धके लिये चले ॥ १४ ॥
आमुच्य वर्मीथ सहस्रतारं हुताशनादित्यसमप्रभावम् । सूर्यप्रभं चामुमुचे किरीटं मालां च जाम्बूनदवैजयन्तीम् ॥ १५ ॥ उन्होंने अग्नि और सूर्यके समान प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण सहस्र तारिकावाले कवचको धारण करके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुटको रखा और गलेमें पैरोंतक लटकने-वाली जाम्बूनदमयी वैजयन्तीमाला धारण की ॥ १५ ॥
त्वष्ट्रा कृतं भास्कररश्मिदीप्तं सुतीक्ष्णघोरामलतीव्रधारम् । महासुराणां रुधिराईमुग्रं प्रगृह्य वज्रं शतपर्व भीमम् ॥ १६ ॥ इसके बाद सौ पर्वोंसे युक्त भयंकर वज्र हाथमें लिया, जो बड़े-बड़े असुरोंके रक्तसे भीगा हुआ था। सूर्यकी किरणोंके समान उदीप्त होनेवाले उस उग्र वज्रका निर्माण साक्षात् विश्वकर्माने किया था। उसकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण, घोर, निर्मल और तीव्र थी ॥ १६ ॥
महाशनी द्वे च महाग्रहाभे दीप्ताममोघां च सशक्तिमुग्राम् । चक्रं तथैन्द्रं सुमहत्प्रतापं प्रगृह्य शक्रः प्रययौ रणाय ॥ १७ ॥ महान् ग्रहोंके समान प्रकाशित होनेवाली दो अशनियाँ, प्रज्वलित एवं अमोघ उग्र शक्ति तथा महाप्रतापी ऐन्द्र-चक्र हाथमें लेकर देवराज इन्द्र युद्धके लिये प्रस्थित हुए ॥१७॥
सहस्रदृग् भूतपतिः सनातनः सनातनानामपि यः सनातनः । खङ्गं च देवाधिपतिर्महात्मा वैयाघ्रमादाय च चर्म चित्रम् ॥ १८ ॥ उनके सहस्र नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके सनातन पति हैं। सनातनोंके भी सनातन हैं। देवताओंके भी अधिपति और महामनस्वी हैं। वे उस समय व्याघ्रचर्मकी बनी हुई विचित्र ढाल और एक तलवार लेकर संग्रामभूमिकी ओर चले ॥१८॥
क्षीरोदविक्षोभसमुच्छ्रितानि पुरामृतादुत्तमभूषणानि । देवासुराणां श्रमनिर्जितानि सोमार्कनक्षत्रतडित्प्रभाणि ॥ १९ ॥ दत्तान्यदित्या मणिकुण्डलानि युद्धे प्रयातस्य सुरेश्वरस्य । तैरूपितो भाति सहस्रचक्षु- रुद्द्योतयन् वै विदिशो दिशश्च ॥ २० ॥ पूर्वकालमें क्षीरसागरके मन्थनसे जिनका प्राकट्य हुआ था, जो अमृतसे निकले थे तथा देवता और असुर दोनोंके परिश्रमसे उपलब्ध हुए थे, जिनकी प्रभा चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और विद्युत्के समान थी तथा जो सर्वोत्तम भूषण माने गये थे, उन मणिमय कुण्डलोंको अदितिने युद्धके लिये प्रस्थित हुए देवराज इन्द्रको दिया। उनसे भूषित होकर सहस्रलोचन इन्द्र दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १९-२० !
हरिः प्रभुर्नेत्रसहस्रचित्रो विभाति युद्धाभिमुखः सुरेन्द्रः । यथा सितं शारदमभ्रकल्पं नभस्तलं ऋक्षसहस्रचित्रम् ॥ २१ ॥ सर्वसमर्थ देवराज इन्द्र युद्धके लिये उत्सुक हो सहस्र नेत्रोंकी विचित्र शोभा धारण किये ऐसे जान पड़ते थे मानो शरद् ऋतुका मेघहीन स्वच्छ आकाश सहस्रों नक्षत्रोंसे चितकबरा दिखायी देता हो ॥ २१ ॥
स्तुवन्ति यान्तं विपुलैर्वचोभि- र्जयाशिषा चोर्जितसत्त्ववीर्यम् । अत्रिर्वसिष्ठो जमदग्निरुर्वो बृहस्पतिर्नारदपर्वतौ च ॥ २२ ॥ बढ़े हुए धर्म तथा बल पराक्रमसे सम्पन्न इन्द्र जब युद्धके लिये चले, तब अत्रि, वशिष्ठ, जमदग्नि, उर्व, बृहस्पति, नारद तथा पर्वत—ये ऋषि अपने विपुल वचनों-द्वारा उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥
तमन्वयुर्देवगणा महेन्द्रं प्रयान्तमादित्यसमानवर्चसम् । विश्वे च देवा मरुतस्तथैव साध्यास्तथाऽऽदित्यगणाश्च सर्वे ॥ २३॥ सूर्यके समान तेजस्वी महेन्द्रको जाते देख उनके पीछे विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्य, आदित्यगण तथा अन्य सब देवता भी चले ॥ २३ ॥
भविष्यपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९५
ते देवराजस्य पुरंदरस्य
हयाश्च ये मातुलिसंगृहीताः ।
प्रयान्ति देवेश्वरसमुद्वहन्तो
नभस्तलं पद्भिरिवाक्षिपन्तः ॥ २४ ॥
जिनकी रास मातलिने पकड़ रखी थी, वे देवराज इन्द्रके घोड़े देवेश्वरकी सवारी ढोते हुए आकाशको अपने पैरोंसे तिरस्कृत करते हुए-से तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे ॥ २४ ॥
ब्रह्मर्षयश्चैव महर्षयश्च
राजर्षयश्चाक्षयपुण्यलोकाः ।
सर्वेऽनुजग्मुः सहसा ज्वलन्तं
तेजोऽन्वितं शक्रममित्रसाहम् ॥ २५ ॥
अक्षय पुण्य-लोकोंमें निवास करनेवाले ब्रह्मर्षि, महर्षि तथा राजर्षि—ये सब लोग सहसा तेजसे प्रज्वलित होने और शत्रु का सामना करनेवाले इन्द्रके पीछे-पीछे चल दिये ॥२५॥
प्रगृह्य शूलांश्च परश्वधांश्च
दीप्तानि चापान्यशनीर्विचित्राः ।
वर्माणि चामुच्य हिरण्मयानि
प्रयान्ति सूर्याशुसमप्रभाणि ॥ २६ ॥
वे हाथोंमें शूल, फरसे, चमकते हुए धनुष और विचित्र अशनि लेकर सूर्यके समान तेजस्वी सुवर्णमय कवच धारण करके युद्धके लिये आगे बढ़ने लगे ॥ २६ ॥
तथा कुवेरोऽश्वसहस्रयुक्तं
श्रेष्ठं रथं सर्वसहं महार्हम् ।
दिव्यं समारुह्य रणाय यातो
धनेश्वरो दीप्तगदाग्रहस्तः ॥ २७ ॥
इसी प्रकार धनेश्वर कुवेर सहस्र अश्वोंसे जुते हुए सब कुछ सहनेमें समर्थ बहुमूल्य एवं दिव्य उत्तम रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले, उनके हाथके अग्रभागमें चमकती हुई गदा शोभा पा रही थी ॥ २७ ॥
निशाचराः पावकधूमकाया
रक्षोवृषा रुद्रसखस्य तस्य ।
विशालनानायुधदीप्तहस्ता
यान्त्यग्रतो वैश्रवणस्य राज्ञः ॥ २८ ॥
विश्रवाके पुत्र तथा रुद्रके सखा राजा कुबेरके आगे नाना प्रकारके विशाल आयुधोंसे चमकीले हाथवाले बहुत-से निशाचारी राक्षसप्रवर जा रहे थे । उनके शरीर अग्नि और धूमके समान वर्णवाले थे ॥ २८ ॥
ते लोहिताक्षाः परिवार्य देवं
व्रजन्ति भिन्नाञ्जनचूर्णवर्णाः ।
यक्षोत्तमा यक्षपतिं धनेशं
रक्षन्ति वै पाशगदासिखड्गाः ॥ २९ ॥
जिनके शरीरकी कान्ति फूटे हुए कोयलोंके चूर्णकी भाँति काली है, वे लाल नेत्रोंवाले यक्षशिरोमणि वीर हाथोंमें पाश, गदा और तलवार लिये यक्षराज धनेश्वर देवको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करते हैं ॥ २९ ॥
पुण्यः प्रभुः प्राणपतिर्जितात्मा
वैवस्वतो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
तडिद्गणाभं शतवाजियुक्तं
रथं समारोहत सूर्यकल्पम् ॥ ३० ॥
अपने मनको वशमें रखनेवाले, प्राणीमात्रके प्राणोंके अधिपति तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुण्यात्मा प्रभु सूर्यपुत्र यम सौ घोड़ोंसे जुते हुए, विद्युत्-गणोंसे प्रकाशित तथा सूर्यके समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुए ॥ ३० ॥
तं लोकपालं पितरोऽनुजग्मु-
र्विंविक्तपापा ज्वलितास्तपोभिः ।
सर्वे च भूता भुवनप्रधाना
नानायुधव्यग्रकराः सुभीमाः ॥ ३१ ॥
तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले पापरहित पितृगणोंने उन लोकपाल यमका अनुसरण किया । तीनों लोकोंमें जो प्रधान-प्रधान भयंकर भूत थे, वे सब हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उनके पीछे-पीछे चले ॥ ३१ ॥
दण्डं महास्त्रं परिगृह्य देवो
लोकाङ्कुशं निग्रहनिश्ञ्चितार्थम् ।
हिरण्मयानां कमलोत्पलानां
मालां मनोज्ञामवसज्य कण्ठे ॥ ३२ ॥
समस्त जगत्पर अङ्कुश (नियन्त्रण) रखनेवाले दण्ड नामक महान् अस्त्रको, जो शत्रुओंका निश्चितरूपसे निग्रह करनेवाला था, हाथमें लेकर यमराजने अपने कण्ठमें सुवर्णमय कमलों और उत्पलोंकी मनोहर माला पहन ली थी ॥ ३२ ॥
स्थितोऽस्थिमेदामिषलोहिताद्रं
सर्वासुराणां निधनं विरूपम् ।
तेजोमयं मुद्गरमुग्ररूपं
विकर्षमाणोऽरुणधूम्रनेत्रः ॥ ३३ ॥
उनके नेत्र अरुण और धूम्रवर्णके थे । वे रथपर बैठकर अपने उस तेजोमय, भयंकर एवं विरूप मुद्गरको साथ लिये जा रहे थे, जो समस्त असुरोंके लिये कालरूप था और उनके मेद, मांस, अस्थि तथा रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ३३ ॥
समन्वितो व्याधिशतैरनेकै-
र्ययौ हरिश्मश्रुरुदारसत्त्वः ।
महासुराणां निधनाय बुद्धिं
चक्रे तदा व्याधिपतिः कृतान्तः ॥ ३४ ॥
उनकी मूँछ काली या नीली थी । उनका अन्तःकरण उदार था । रोग-व्याधियोंके स्वामी उन यमराजने नाना प्रकारकी सैकड़ों व्याधियोंको साथ लेकर बड़े-बड़े असुरोंके विनाशका निश्चय कर लिया था ॥ ३४ ॥
| ८९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
ततस्त्रिशीर्षैर्भुजगैर्बृहद्भि-
र्युक्तं रथं हेमचितं महात्मा।
आस्थाय कुन्देन्दुनिभं जलेशो
ययौ रणायासुरदर्पहन्ता॥ ३५॥
तदनन्तर असुरोंके दर्पका दमन करनेवाले जलके स्वामी महात्मा वरुण कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल तथा सुवर्णजटित रथपर, जिसमें तीन सिरवाले विशालकाय सर्प जुते हुए थे, आरूढ हो युद्धके लिये चले॥ ३५॥
वैदूर्यमुक्तामणिभूषिताङ्ग-
स्तेजोमयः पाशगृहीतहस्तः।
महासुराणां निधनाय देवः
प्रयाति रूप्याङ्गदबद्धबाहुः॥ ३६॥
उनके अङ्ग वैदूर्य, मुक्ता एवं मणियोंसे विभूषित थे, उनकी भुजाओंमें चाँदीके बाजूबंद बँधे हुए थे और उन्होंने अपने हाथमें पाश ले रखा था, इस प्रकार वे तेजस्वी देवता वरुण उन महान् असुरोंके विनाशके लिये समराङ्गणकी ओर प्रस्थित हुए॥ ३६॥
अन्वीयमानो जलदेवताभि-
र्निषेच्यमाणो जलजैश्च सर्वैः।
संस्तूयमानश्च महर्षिवृन्दैः
सम्पूज्यमानश्च महाभुजङ्गैः॥ ३७॥
उस समय जलके अधिष्ठाता देवता उनका अनुसरण करते थे। जलमें उत्पन्न होनेवाले उनका अभिषेक कर रहे थे। महर्षियोंके समुदाय उनके गुण गा रहे थे और बड़े-बड़े भुजंग उनकी पूजामें लगे थे॥ ३७॥
कैलासशृङ्गप्रतिमोऽप्रमेयः
समुद्रनाथोऽमृतपो महात्मा।
महोरगैः स्वैस्तनयैः सुगुप्तो
ययौ रथेनार्कसमप्रभेन॥ ३८॥
समुद्रके स्वामी तथा अमृतपान करनेवाले महात्मा वरुण कैलास-शिखरके समान गौर-वर्णके थे। उनकी शक्ति अप्रमेय थी। उनके पुत्र और बड़े-बड़े नाग उनकी भलीभाँति रक्षा करते थे। वे सूर्यके समान तेजस्वी रथसे चले॥ ३८॥
युद्धाय तं यान्तमदीनसत्त्वं
नभस्तले चन्द्रमिवातिकान्तम्।
पश्यन्ति भूतानि महानुभावं
संहृष्टरोमाणि कृताञ्जलिनि॥ ३९॥
चन्द्रमाके समान अत्यन्त कान्तिमान् और उदार हृदय-वाले महानुभाव वरुण जब युद्धके लिये जा रहे थे, उस समय आकाशमें समस्त प्राणी पुलकित-शरीरसे हाथ जोड़कर उनकी ओर देख रहे थे॥ ३९॥
धातार्यमांशोऽथ भगो विवस्वान्
पर्जन्यमित्रौ च शशी च देवः।
त्वष्टा तथैवोर्जितविश्वकर्मा
पूषा च साक्षाद् दिवि देवराजः॥ ४०॥
सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै-
र्वैदूर्यनिष्कैश्चितहेमकण्ठैः।
हयैर्वरैः शाकरथप्रकाशै-
र्युक्तान् रथानारुरुहुः सुरास्ते॥ ४१॥
धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्, पर्जन्य, मित्र, चन्द्रदेव, त्वष्टा, तेजस्वी विश्वकर्मा, पूषा तथा साक्षात् देवराज इन्द्र—ये सभी देवता आकाशमें अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथों-पर आरूढ़ थे। ये सभी घोड़े हृदयको आच्छादित करनेवाले कवचोंसे युक्त थे। उनके गलेमें वैदूर्यमणिके पदक और सोनेके हार शोभा पाते थे। वे अश्व ध्वज और छोटी-छोटी घंटिकाओंसे युक्त थे। उन सबका रंग वही था, जो इन्द्रके रथमें जुते हुए घोड़ोंका था (इन्द्रके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे)॥ ४०-४१॥
दिवाकराकारनिभानि केचि-
द्धुताशनाचीःप्रतिमानि केचित्।
निशाकरांशुप्रतिमानि केचित्
तडिद्गणोद्द्योतनिभानि केचित्॥ ४२॥
नीलांशुमेघप्रतिमानि केचित्
कार्ष्णायसाकारनिभानि केचित्।
चर्माणि दिव्यानि महाप्रभाणि
त्वष्ट्रा कृतान्युत्तमभानुमन्ति॥ ४३॥
आमुच्य मालाश्च सुवर्णपुष्पाः
प्रयान्ति तोयानिलतुल्यवेगाः।
कुछ देवता सूर्यमण्डलके समान, कोई अग्निकी ज्वालाके समान, कोई चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश, कुछ देवता विद्युत्-की प्रभाके समान, कुछ नील वर्णवाले मेघोंके सदृश और कोई काले लोहेके समान महान् प्रभापुञ्जसे युक्त तथा उत्तम किरणोंसे उद्भासित दिव्य कवच धारण किये हुए थे, जिन्हें साक्षात् विश्वकर्माने बनाया था। जिनमें सुवर्णमय पुष्प गूँथे गये थे, ऐसी मालाएँ पहनकर जल और वायुके समान तीव्र वेगवाले वे देवता रणभूमिकी ओर बढ़े जा रहे थे॥ ४२-४४ १/२॥
द्वावश्विनौ चैव महानुभावौ
रूपोत्तमौ धर्मभृतां वरिष्ठौ॥ ४४॥
रथं समारुह्य सुवर्णचित्रं
रणं गतौ काञ्चनतुल्यवर्णौ।
रूपमें सबसे उत्तम तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार महानुभाव भी सुवर्णजटिल रथपर आरूढ़ हो रणभूमिमें गये। उन दोनोंके शरीरकी कान्ति सुवर्णके तुल्य थी॥ ४४ १/२॥
मनोः सुता वै वसवश्च सर्वे
बलोत्कटा दैत्यवधाय देवाः॥ ४५॥
भविष्यपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९७
रथैश्च नागांश्च महाप्रमाणा-
नास्थाय जग्मुः सुशुभास्त्रहस्ताः ।
मनुके पुत्र तथा समस्त वसु देवता जो उत्कट बलशाली और हाथोंमें उत्तम अस्त्र धारण करनेवाले थे, बड़े-बड़े रथों और हाथियोंपर आरूढ़ हो दैत्योंका वध करनेके लिये चले ॥
रुद्राश्च सर्वेऽरुणधूम्रवर्णाः
श्वेतैर्ययुर्गोपतिभिर्बृहद्भिः ॥ ४६ ॥
महौजसः सर्वगुणोपपन्ना
दीप्तात्मनो भाभिरिव ज्वलन्तः ।
नानायुधव्यग्रकरैर्भुजैस्तै-
र्लोकान् समस्तानिव निर्दहन्तः॥ ४७ ॥
अरुण और धूमके समान वर्णवाले समस्त रुद्रगण, जो महाबली, सर्वगुणसम्पन्न और दीप्तिमान् शरीरवाले थे तथा अपनी प्रभाओंसे प्रज्वलित-से हो रहे थे; श्वेत वर्णवाले विशाल वृषभोंद्वारा युद्धभूमिमें गये । नाना प्रकारके आयुधोंसे युक्त हाथवाली भुजाओंसे वे समस्त लोकोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे ॥ ४६-४७ ॥
ययुः ससैन्यास्तपनीयनद्धाः
सविद्युतस्तोयधरा यथैव ।
विश्वे च देवास्तपसा ज्वलन्तो
वीर्योत्तमाः सूर्यमरीचिवर्णाः ॥ ४८ ॥
ययुः ससैन्या युधि दुर्निवार्या
बलोत्कटाः पद्मसहस्रमालाः ।
सुवर्णमय कवच बाँधकर सेनाको साथ लिये जब वे आगे बढ़े, उस समय बिजलियोंसे युक्त मेघोंके समान शोभा पाने लगे। सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान्, उत्तम बलशाली तथा तपस्याके तेजसे प्रकाशित होनेवाले विश्वेदेवगण भी सेना साथ लेकर युद्धके लिये चले । शत्रुओंके लिये उनके वेग-को रोकना कठिन था । वे उत्कट बलशाली तथा सहस्र कमलोंकी मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ४८ १/२ ॥
रथैः सुयुक्तैस्तपनीयवर्णै-
र्वैदूर्यमुक्तामणिदामचित्रैः ॥ ४९ ॥
नानाविधाकारसमाकुलास्ते
पारिप्लवैश्चैव सितातपत्रैः ।
तेजोमयैः काञ्चनचारुचित्रैः
सुनिर्मलैः पावकसंनिभास्ते ॥ ५० ॥
सोनेके समान कान्तिवाले तथा वैदूर्य, मुक्ता और मणियोंकी लड़ियोंसे विचित्र शोभा पानेवाले, भलीभाँति जुते हुए रथोंद्वारा वे सब लोग समरभूमिमें गये । वे नाना प्रकार-की आकृतियोंसे युक्त थे । उनके ऊपर सुवर्णनिर्मित, मनोहर, विचित्र, अत्यन्त निर्मल, तेजस्वी और सब ओर घूमनेवाले श्वेत छत्र तने हुए थे । जिनके कारण वे सब लोग प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४९-५० ॥
सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै-
र्हयैश्च वायोः समवेगवद्भिः ।
दिशां गजैश्चैव महाचलैस्तैः
कैलासशृङ्गप्रतिमैर्महद्भिः ॥ ५१ ॥
प्रजग्मुरुग्रायुधचापहस्ता-
श्चर्तुयुगान्ते ज्वलिता इवोल्काः ।
कवच, ध्वज और घुँघुरुओंसे युक्त वायुके समान वेग-शाली घोड़ों तथा कैलासशिखरके समान उज्ज्वल, विशाल-काय एवं महाबली दिग्गजोंद्वारा वे यात्रा कर रहे थे । उनके हाथोंमें भयंकर धनुष थे, जिनसे वे युगान्तकालमें प्रज्वलित होनेवाली उल्काओंके समान प्रतीत होते थे ॥ ५१ १/२ ॥
साध्याश्च देवाः सुमहाप्रभावाः
स्वाधीनचक्राः प्रतिदीप्तवक्त्राः ॥ ५२ ॥
प्रयान्ति जाम्बूनदभूषिताङ्गा
गाङ्घौघमात्रैर्गगनैर्बलौघैः ।
विद्योतयन्तो विदिशो दिशश्च
महाबलास्ते जयतां वरिष्ठाः ॥ ५३ ॥
महान् प्रभावशाली साध्यदेवता सारी सेनाको अपने अधीन करके युद्धके लिये जा रहे थे । उनके मुख दिव्य दीप्ति-से उद्दीप्त हो रहे थे । उन्होंने अपने अङ्गोंको जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था । उनके साथ गङ्गाके जल-प्रवाह और आकाशके समान अनन्त एवं असंख्य सैनिक थे । विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे महाबली साध्यगण अपने तेजसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥
वरिष्ठपुष्टाष्टभुजाः सुदृप्ता
वैश्वानरार्कप्रतिमप्रभावाः ।
ते ब्रह्मविद्भिश्च नमस्यमानाः
सम्पूज्यमानाश्च सुरैः सशक्रैः ॥ ५४ ॥
गन्धर्वसङ्घैरनुगम्यमाना
वधाय तेषामसुराधिपानाम् ।
उनके आठ भुजाएँ थीं, जो श्रेष्ठ एवं पुष्ट थीं । उन्हें अपने बलपर गर्व था । वे अग्नि एवं सूर्यके समान प्रभावशाली थे । ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें नमस्कार करते थे । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनकी पूजा करते थे तथा दैत्येश्वरोंका वध करनेके लिये जाते हुए उन साध्यगणोंके पीछे गन्धर्वोंके समुदाय चलते थे ॥ ५४ १/२ ॥
वैदूर्यवज्रस्फटिकाग्रचित्रै-
र्ध्वजैः सुवर्णैश्च परिष्कृतानाम् ॥ ५५ ॥
रूपं वभौ चोत्कटभूषणानां
दैत्येन्द्रनाशाय विभूषितानाम् ।
वैदूर्य, हीरे और स्फटिकमणिसे जटिल होनेके कारण विचित्र शोभा पानेवाले ध्वजों और सुवर्णमय आभूषणोंसे जिनकी सुन्दर शोभा होती थी, जो उत्कट आभूषण पहने
म० पृ० २९
| ८९८ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
हुए ये तथा दैत्येन्द्रोंके विनाशके लिये ही जिन्होंने अपनेको विभूषित किया था, उन साध्य देवताओंका रूप वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ ५५१/२ ॥
आत्मप्रभाभिश्च रणोत्कटाभि-
वर्मप्रभाभिश्च तमोन्नुदाभिः ॥ ५६ ॥
ध्वजोत्थभाभिः खशरोरुभाभि-
र्महाप्रभाभिश्च महोज्ज्वलाभिः ।
विभान्ति ते देववराः ससाध्याः
प्रध्मातशङ्खस्तनसिंहनादाः ॥ ५७ ॥
महारथस्थास्त्रिदिवौकसस्ते
महाबलाः शत्रुबलं प्रयान्ति ।
महास्त्रहस्ता ययुरुग्रकाया
महासुराणां निधनाय देवाः ॥ ५८ ॥
युद्धके लिये उत्कट प्रतीत होनेवाली अपने शरीरकी प्रभा, अन्धकारको दूर करनेवाली कवचोंकी प्रभा, ध्वजसे उत्पन्न होनेवाली आभा तथा अपने बाणसमूहोंसे उद्गत हुई प्रचुर प्रभा—इन सबके योगसे प्रकाशित होनेवाली परम उज्ज्वल महाप्रभाओंसे वे साध्यगणोंसहित श्रेष्ठ देवता बड़ी शोभा पा रहे थे। वे महाबली देवता अपने विशाल रथोंपर बैठकर शङ्खध्वनि और सिंहनाद करते हुए शत्रु-सेनाकी ओर बढ़ने लगे। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े अस्त्र थे। उनकी काया भयंकर थी; वे देवता उन महादैत्योंका संहार करनेके लिये चल दिये ॥ ५६–५८ ॥
तथैव सर्वे मरुतोऽतिवीर्या
बलोत्कटास्ते समरं प्रतीताः ।
ययुर्महामेघसमानवर्णा-
श्चक्रायुधास्तोयदनादनादाः ॥ ५९ ॥
इसी प्रकार अत्यन्त पराक्रमी और उत्कट बलशाली समस्त मरुद्गण, जो महान् मेघके समान श्याम वर्णवाले तथा चक्रधारी थे, मेघकी भाँति गर्जना करते हुए विजयका दृढ़ विश्वास लिये समरभूमिकी ओर चले ॥ ५९ ॥
महेन्द्रकेतुप्रतिमा महाबलाः
प्रगृह्य सर्वासुरसूदनां गदाम् ।
रणोत्कटा लोहितचन्दनाक्ताः
सहेममाल्याम्बरभूषिताङ्गाः ॥ ६० ॥
वे इन्द्रके ध्वजस्वरूप ऐरावतके समान महान् बलवान् थे। युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे। उनके सारे अङ्ग लाल चन्दनसे चर्चित तथा सोनेके हार और दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित थे। उन्होंने समस्त असुरोंका संहार करनेवाली गदा लेकर युद्धके लिये यात्रा की थी ॥ ६० ॥
ते युद्धशौण्डाः समुजास्त्रवीर्या
बलोत्कटाः क्रोधविलोहिताक्षाः ।
ययुः सजाग्बूनदपद्ममाला
यथेष्टनानाविधकामरूपाः ॥ ६१ ॥
खड्गप्रभाश्यामलित्रांसपीठाः
पुरंदरं वै परिवार्य देवाः ।
वे सब-के-सब युद्धमें कुशल थे। उनमें बाहुबल और अस्त्रबलकी पूर्णता थी। वे उत्कट बलशाली थे। उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वे देवता सुवर्ण तथा कमलोंकी माला धारण करके इच्छानुसार नाना प्रकारके रूप धारण किये देवराज इन्द्रको चारों ओरसे घेरकर रणभूमिकी ओर जा रहे थे। उनके कंधे और पीठ खड्गोंकी प्रभासे साँवले दिखायी देते थे ॥ ६११/२ ॥
वैदूर्यचामीकरचारुरूपा-
ण्याबध्य गात्रेषु महाप्रभाणि ॥ ६२ ॥
वर्माणि दैत्यस्त्रनिवारणानि
प्रयान्ति युद्धाय सपत्नसाहाः ।
शत्रुओंका वेग सहन करनेमें समर्थ वे देवता अपने अङ्गोंमें वैदूर्य और सुवर्णसे जटित होनेके कारण मनोहर रूपवाले परम कान्तिमान् कवचोंको, जो दैत्योंके अस्त्रोंका निवारण करनेवाले थे, बाँधकर युद्धके लिये जा रहे थे ॥
तैरत्थितैः काञ्चनवेदिकाद्यै-
र्वरध्वजैर्भास्कररश्मिवर्णैः ॥ ६३ ॥
ययौ सुराणां पृतनोग्रभासा
समुन्नदन्ती युधि सिंहनादान् ।
सोनेकी वेदिकाओंसे युक्त और सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान् ऊँचे उठे हुए श्रेष्ठ ध्वजोंसे उपलक्षित होनेवाली देवताओंकी वह भयंकर सेना युद्धके लिये जोर-जोरसे सिंहनाद करती हुई जा रही थी ॥ ६३१/२ ॥
इत्येवमुक्तं त्रिदिवेश्वरस्य
सैन्यं तदासीत् सुमहत्प्रभावम् ॥ ६४ ॥
युद्धं प्रयातस्य जयावहस्य
वधाय तेषामसुराधिपानाम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार उन असुरेश्वरोंके वधके लिये युद्धस्थलकी ओर प्रस्थित हुए विजयशाली देवेश्वर इन्द्रकी वह सेना बड़ी प्रभावशालिनी थी। जिसका इस रूपमें वर्णन किया गया है ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामनप्रादुर्भावे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
भविष्यपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९९
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओं और असुरोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवृत्तोऽसुरदेवविग्रह-
स्तदद्भुतो भाति सुरासुराकुलः ।
वेलामतिक्रम्य युगान्तकाले
महार्णवान्योन्यमिवाश्रयन्तः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवताओं और असुरोंका युद्ध आरम्भ हुआ । देवताओं और दैत्योंसे व्याप्त होनेके कारण उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी । जैसे प्रलयकालमें चारों दिशाओंके महासागर अपनी सीमाको लाँघकर एक दूसरेसे मिल जाते हैं (उसी प्रकार देवता और दैत्य उस युद्धमें एक दूसरेसे मिश्रित हो गये) ॥ १ ॥
नानायुधोद्द्योतविदीपिताङ्गा
महाबला व्यायतकार्मुकास्ते ।
रणोत्सुका वारणहस्तहस्ताः
सुदुर्जयस्तोयदनादनादाः ॥ २ ॥
वे महाबली योद्धा बड़े-बड़े धनुष ताने हुए युद्धके लिये उत्सुक हो रहे थे । उनके अङ्ग नाना प्रकारके आयुधोंकी प्रभासे प्रकाशित होते थे । उनकी भुजाएँ हाथियोंकी सूँड़के समान मोटी थीं । उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन था और उनका सिंहनाद मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
विस्फारयन्तः सहसा धनूंषि
चक्राणि चादित्यसमप्रभाणि ।
समुत्क्षिपन्तो ह्यशनींश्च घोरान्
खड्गांश्च ते वज्रमुखांश्च शक्तीः ॥ ३ ॥
वे सहसा धनुषकी टंकार करने लगते थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, भयंकर अशनि, खड्ग तथा वज्रमुखी शक्तियोंका लगातार प्रहार करते थे ॥ ३ ॥
महागदाः काञ्चनपट्टनद्धा-
स्तथायसान् कार्मुकमुद्गरांश्च ।
शूलांश्च वृक्षांश्च विगृह्य दीप्तान्
नदन्ति शूराः शतशो रणस्थाः ॥ ४ ॥
रणभूमिमें खड़े हुए सैकड़ों शूरवीर सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई विशाल गदाओं, लोहेके बने हुए धनुषों, मुद्गरों, चमकीले त्रिशूलों और वृक्षोंको हाथमें लेकर वहाँ गर्जना करते थे ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिनिघ्नताम् ।
द्वन्द्वयुद्धान्यवर्तन्त देवानां दानवैः सह ॥ ५ ॥
इसी बीचमें एक दूसरेपर चोट करते हुए उन सैनिकोंमेंसे देवताओंका दानवोंके साथ द्वन्द्वयुद्ध होने लगा ॥ ५ ॥
मरुतां पञ्चमो यस्तु स बाणेनाभ्ययुध्यत ।
महाबलः सुरवरः सावित्र इति यं विदुः ॥ ६ ॥
मरुद्गणोंमें जो पाँचवें थे और जिनको लोग महाबली सुरश्रेष्ठ सावित्रके नामसे जानते हैं, वे बाणासुरके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु बलो नाम महासुरः ।
सोऽयुध्यत रणेऽत्युग्रो ध्रुवेण वसुना सह ॥ ७ ॥
दनायुषाका पुत्र अत्यन्त भयंकर महान् असुर बल उस रणभूमिमें ध्रुव नामक वसुके साथ युद्ध करने लगा ॥ ७ ॥
नमुचिश्वासुरश्रेष्ठो धरेण सह युध्यत ।
प्रवरौ विश्वकर्माणौ ख्यातौ देवासुरेश्वरौ ॥ ८ ॥
असुरोंमें श्रेष्ठ नमुचि धर नामक वसुके साथ जूझने लगा । जो दोनों श्रेष्ठ विश्वकर्माके रूपमें विख्यात हैं, वे देवेश्वर त्वष्टा और असुरेश्वर मय परस्पर युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥
पुलोमा तु महादैत्यो वायुना सह युध्यत ।
ससैन्यः पर्वताकारो रणेऽयुध्यत दंशितः ॥ ९ ॥
महादैत्य पुलोमाने वायु देवताके साथ युद्ध छेड़ दिया । वह पर्वताकार दैत्य कवच धारण करके अपनी सेनाको साथ लिये रणभूमिमें जूझ रहा था ॥ ९ ॥
हयग्रीवस्तु दितिजः सह पूष्णा त्वयुध्यत ।
शूरेणामितवीर्येण भास्कराकारवर्चसा ॥ १० ॥
हयग्रीव नामक दैत्य सूर्यतुल्य तेजस्वी अमित पराक्रमी शूरवीर पूषाके साथ लड़ने लगा ॥ १० ॥
शम्बरस्तु महादैत्यो महामायो महासुरः ।
भगेनायुध्यत तदा सहितो युद्धदुर्मदः ॥ ११ ॥
महामायावी महान् असुर रणदुर्मद महादैत्य शम्बर भग देवताके साथ युद्ध करने लगा ॥ ११ ॥
शरभः शलभश्चैव दैत्यानां चन्द्रभास्करौ ।
प्रयुद्धौ सह सोमेन शैशिरास्त्रेण धीमता ॥ १२ ॥
शरभ और शलभ ये दोनों वीर दैत्योंमें सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी थे । वे शैशिरास्त्रधारी बुद्धिमान् सोमके साथ जूझने लगे ॥ १२ ॥
विरोचनस्तु बलवान् बलेर्बलवतः पिता ।
विष्वक्सेनेन साध्येन देवेन च स युध्यत ॥ १३ ॥
बलवान् बलिके पिता महाबली विरोचन विष्वक्सेन नामक साध्य देवताके साथ भिड़ गया ॥ १३ ॥
| ९०० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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कुजम्भस्तु महातेजा हिरण्यकशिपोः सुतः।
अंशेनायुध्यत तदा प्रासप्रहरणेन वै ॥ १४ ॥
महातेजस्वी कुजम्भ, जो हिरण्यकशिपुके पुत्रका पुत्र था, उस समय प्रासधारी अंशके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥
असिलोमा तु बलिना मारुतेन समं विभो।
तदायुध्यत दीप्तास्यो विकृतः पर्वतायुधः ॥ १५ ॥
प्रभो ! तेजस्वी मुखवाला विकृताङ्ग दैत्य असिलोमा पर्वतखण्डरूपी आयुध लेकर उस समय बलवान् मारुतके साथ संग्राम करने लगा ॥ १५ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु वृत्रो नाम महासुरः।
अश्विभ्यां देववैद्याभ्यां सह युध्यत संयुगे ॥ १६ ॥
दनायुषाका पुत्र महान् असुर वृत्र युद्धस्थलमें देववैद्य अश्विनीकुमारोंके साथ जूझने लगा ॥ १६ ॥
एकचक्रस्तु दितिजश्चक्रहस्तो दुरासदः।
सहायुध्यत देवेन साध्येन दितिजारिणा ॥ १७ ॥
हाथमें चक्र लिये हुए एकचक्र नामक दुर्जय दैत्यने दैत्योंके शत्रु साध्यदेवके साथ युद्ध किया ॥ १७ ॥
बलस्तु मधुपिङ्गाक्षो वृत्रभ्राता महासुरः।
मृगव्याधेन रुद्रेण सहायुध्यत वीर्यवान् ॥ १८ ॥
वृत्रासुरके भाई, मधुके समान पिङ्गल नेत्रवाले, पराक्रमी महान् असुर बलने मृगव्याध नामक रुद्रके साथ युद्ध किया ॥ १८ ॥
राहुस्तु विकृताकारः शतशीर्षो महोदरः।
अजैकपादेन रणे सहायुध्यत दंशितः ॥ १९ ॥
सैकड़ों सिर और बड़े पेटवाले विकृताकार दैत्य राहुने कवच धारण करके रणभूमिमें अजैकपाद नामक रुद्रके साथ संग्राम छेड़ दिया ॥ १९ ॥
केशी तु दानवश्रेष्ठः प्रावृट्कालाम्बुदप्रभः।
धनेश्वरेण भीमेन सहायुध्यत संयुगे ॥ २० ॥
वर्षाकालके मेघकी भाँति काले रंगवाले दानवशिरोमणि केशीने युद्धस्थलमें धनेश्वर भीमके साथ युद्ध ठाना ॥ २० ॥
वृषपर्वा तु बलिना पावनेन महारणे।
विश्वेदेवेन विश्वेशः सहायुध्यत वीर्यवान् ॥ २१ ॥
पराक्रमी और जगत्के शासक वृषपर्वाने उस महासमरमें पावन नामक बलवान् विश्वेदेवके साथ युद्ध किया ॥ २१ ॥
प्रह्लादस्तु महावीर्यो वीरैः स्वैस्तनयैर्वृतः।
युयुधे सह कालेन रणे काल इवापरः ॥ २२ ॥
अपने वीर पुत्रोंसे घिरे हुए महापराक्रमी प्रह्लाद रणभूमिमें दूसरे कालके समान होकर कालके ही साथ युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥
अनुह्लादः कुबेरेण धनदेन महारणे।
गदाहस्तेन युयुधे क्षोभयन् रिपुवाहिनीम् ॥ २३ ॥
अनुह्लाद शत्रुसेनाको क्षोभमें डालता हुआ उस महासमरमें गदाधारी धनदाता कुबेरके साथ जूझने लगा ॥ २३ ॥
विप्रचित्तिस्तु दैतेयो वरुणेन महात्मना।
प्रवृत्तो वै रणं कर्तुं दैत्यानां नन्दिवर्धनः ॥ २४ ॥
दैत्योंका आनन्द बढ़ानेवाले विप्रचित्ति नामक दैत्यने महात्मा वरुणके साथ युद्ध करना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
बलिस्तु सह शक्रेण सुरेशन महात्मना।
युयुधे देवराजेन बलिना बलवान् रणे ॥ २५ ॥
उस रणभूमिमें बलवान् दैत्यराज बलिने महाबली देवराज सुरेश्वर महात्मा इन्द्रके साथ संग्राम आरम्भ किया ॥ २५ ॥
शेषा देवाश्च दैत्याश्च जघ्नुरन्योन्यमाहवे।
विनर्दन्तो महानादान् प्रासासिशरशक्तिभिः ॥ २६ ॥
शेष देवता और दैत्य युद्धस्थलमें जोर-जोरसे सिंहनाद करते हुए प्रास, खड्ग, बाण और शक्तियोंद्वारा एक दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २६ ॥
अदृश्यन्त महोत्पाता ये प्रोक्ता जगतः क्षये।
मारुताः सप्त ते क्षुब्धा व्यशीर्यन्त महीधराः ॥ २७ ॥
उस समय ऐसे बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देने लगे, जिन्हें प्रलयकालमें प्रकट होने योग्य बताया गया है। प्रवह आदि जो सात प्रकारके वायु हैं, वे क्षुब्ध हो उठे। पर्वत स्वयं ही बिखर-बिखरकर गिरने लगे ॥ २७ ॥
सप्त चैवोत्थिताः सूर्याः शोषयन्तो महार्णवान्।
बहुनाभिद्यत धरा वायुना मथिता यथा ॥ २८ ॥
महासागरोंको सोखते हुए सात सूर्य उदित हो गये। प्रचण्ड वायुने इस पृथिवीको इस प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे इसे मथ डाला हो ॥ २८ ॥
व्युत्थिताश्च महामेघाः शक्रचापाङ्कितोदराः।
प्रणेदुः सर्वभूतानि सर्वाः सतिमिरा दिशः ॥ २९ ॥
आकाशमें बड़े-बड़े मेघोंकी घटा घिर आयी। उसका मध्यभाग इन्द्रधनुषसे अङ्कित हो गया। समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे और सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥ २९ ॥
देवानाम्जयो घोरो दृश्यते कालनिर्मितः।
घोरोत्पातः समुद्भूतो युगान्तसमये यथा ॥ ३० ॥
कालकी प्रेरणासे देवताओंकी घोर पराजय दिखायी देने लगी। जैसा प्रलयकालमें होता है, वैसा ही भयंकर उत्पात प्रकट होने लगा ॥ ३० ॥
न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि-
र्न भास्कराऽदृश्यत रेणुजालैः।
ववुश्च वातास्तुमुलाः सधूमा
दिशश्च सर्वास्तिमिरोपगूढाः ॥ ३१ ॥
न तो अन्तरिक्ष, न दिशाएँ, न भूमि और न सूर्य ही दिखायी देते थे। सबपर धूलका जाल-सा बिछ गया था।