भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 904
८८०श्रीमहाभारते खिलभागे[हरिवंशे

संतुष्ट हुए ब्रह्माजीने भी असुरगणोंके साथ समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सोनेके बड़े-बड़े कलशोंद्वारा विरोचनकुमार बलिको हिरण्यकशिपुके राज्यपर अभिषेक कर दिया २१-२२

जयशब्दं ततश्चक्रुरभिषिक्तस्य दानवाः।
बलेरतुलवीर्यस्य सिंहासनगतस्य वै ॥ २३ ॥
अभिषिक्त होकर जब अनुपम पराक्रमी बलि सिंहासनपर आसीन हुए, तब समस्त दानवोंने उनकी जय-जयकार की ॥

कृत्वेन्द्रं दानवाः सर्वे बलिं बलवतां वरम्।
ततो विज्ञापयामासुः शिरोभिः पतिताः क्षितौ ॥ २४ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिको इन्द्र बनाकर समस्त दानवोंने पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन किया ॥ २४ ॥

दैत्या ऊचुः
विदितं तव दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपोर्यथा।
त्रैलोक्यमासीदखिलं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥
दैत्य बोले—दैत्यराज ! आपको यह ज्ञात ही होगा कि पहले चराचर प्राणियोंसहित यह सारा त्रिभुवन हिरण्यकशिपुके अधिकारमें था ॥ २५ ॥

पितामहं तु हत्वा ते सुरेश्वरनिषूदन ।
हृतं तदैव त्रैलोक्यं शक्रश्चैवाभिषेचितः ॥ २६ ॥
सुरेश्वरनिषूदन ! देवताओंने आपके पितामहका वध करके तत्काल ही तीनों लोकोंका राज्य हर लिया और इन्द्रको उसपर अभिषिक्त कर दिया ॥ २६ ॥

तत् पितामहराज्यं त्वं प्रत्याहर्तुमिहार्हसि ।
अस्माभिः सहितो नाथ त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ २७ ॥
प्रत्यानयस्व भद्रं ते राज्यं पैतामहं प्रभो ॥ २८ ॥
अतः नाथ ! अब आप हमारे साथ चलकर अपने पितामहका राज्य—यह प्रवाहरूपसे सदा बना रहनेवाला त्रिभुवन वापस लौटाइये। प्रभो ! आपका कल्याण हो, आप अपने पितामहके राज्यपर पुनः अधिकार कर लीजिये २७ २८

असुरगणसहस्रसंवृतस्त्वं
जय दिवि देवगणान् महानुभावान्।
अमितबलपराक्रमोऽसि राज-
न्नतिशयसे स्वगुणैः पितामहं स्वम् ॥ २९ ॥
राजन् ! आप अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा अपने गुणोंद्वारा पितामह हिरण्यकशिपुसे भी बढ़ गये हैं; अतः सहस्रों असुरगणोंसे घिरे हुए आप देवलोकमें चलकर महानुभाव देवताओंपर विजय प्राप्त कीजिये ॥ २९ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने बलेरभिषेके अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वामनावतारके प्रसंगमें बलिका अभिषेकविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥


एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

देवताओंके साथ युद्धके लिये दैत्योंकी तैयारी

वैशम्पायन उवाच
निशम्य तेषां वचनं महामति-
र्बलिस्तदा प्रीतमना महाबलः।
आज्ञापयामास स दैत्यकोटिं
त्रैलोक्यमद्यैव जयाथ सर्वम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन दैत्योंकी बात सुनकर महाबली एवं महाबुद्धिमान् बलि मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने करोड़ों दैत्योंको आज्ञा दी कि सारी त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करें ॥ १ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलेर्वैरोचनस्य तु।
उद्योगं परमं चक्रुर्दानवा युद्धदुर्मदाः ॥ २ ॥
विरोचनकुमार बलिको वह उत्साहवर्धक वचन सुनकर रणदुर्मद दानवोंने युद्धके लिये बड़ी भारी तैयारी की ॥ २ ॥

महापद्मो निकुम्भश्च कुम्भकर्णश्च वीर्यवान् ।
काञ्चनाक्षः कपिस्कन्धो मैनाकः क्षितिकम्पनः ॥ ३ ॥

शितकेशोर्ध्ववक्त्रश्च वज्रनाभः शिखी जटी।
सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः प्रियदर्शनः ॥ ४ ॥

एकाक्ष एकपान्मुण्डो विद्युदक्षश्चतुर्भुजः।
गजोधरो गजशिरा गजस्कन्धो गजेक्षणः ॥ ५ ॥

अष्टदंष्ट्रश्चतुर्वक्त्रो मेघनादी जलंधरः ।
करालो ज्वालजिह्वस्यः शताङ्गः शतलोचनः ॥ ६ ॥

सहस्रपादः सुमुखः कृष्णश्चैव महासुरः।
रणोत्कटो दानपतिः शैलकम्पी कुलाकुलिः ॥ ७ ॥

समुद्रो रभसश्चण्डो धूम्रश्चैव महासुरः।
गोव्रजो गोशुरो रौद्रो गोदन्तः स्वस्तिको ध्रुवः ॥ ८ ॥

मांसलो मांसभक्षश्च वेगवान् केतुमाञ्छिभिः ।
पङ्कदिग्धशरीरश्च बृहत्कीर्तिर्महाहनुः ॥ ९ ॥

समप्रभो विकुम्भाण्डो विरूपाक्षो महोदरः ।
श्वेतशीर्षश्चन्द्रहनुश्चन्द्रहा चन्द्रतापनः ॥ १० ॥

विक्षरो दीर्घबाहुश्च मद्यपो मारुताशनः ।
तालजङ्घो महाभागः शरभः शलभः क्रथः ॥ ११ ॥

समुद्रमथनो नादी विततश्च महाबलः।
प्रलम्बो नरको व्याली धेनुकः काललोचनः ॥ १२ ॥

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