विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 903, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८७९
अनादिमध्यनिधनस्त्रैलोक्यादिः सनातनः।
देवदेवः सुराध्यक्षः कृष्णो लोकनमस्कृतः ॥ ६ ॥
हव्यकव्यवहः श्रीमान् हव्यकव्यभुगव्ययः।
अदित्या देवमातृश्च कथं गर्भेऽभवत् प्रभुः।
स्रष्टा यो वासवस्यापि स कथं वासवानुजः ॥ ७ ॥
प्रसूतो देवदेवेशो विष्णुत्वं प्राप्तवान् कथम्।
एतदाचक्ष्व मे विप्र प्रादुर्भावं महात्मनः ॥ ८ ॥
जिन्हें पुराणमे पुराणात्मा ( पुरातन पुरुष एवं अन्तर्यामी आत्मा ) कहा गया है, जो सर्वसमर्थ होकर एकार्णवके जलमें नारायणके रूपमें शयन करते हैं, जिनकी नाभिसे ब्रह्माण्ड-कमल प्रकट हुआ, जो समस्त लोकोंकी प्रकृति ( उपादानकारण ) हैं, जिन्हें ध्रुव ( नित्य ) कहा गया है, जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, तीनों लोकोंके आदिकारण हैं, सनातन, देवाधिदेव और सुराध्यक्ष हैं, सच्चिदानन्दस्वरूप और विश्ववन्दित हैं, हव्य और कव्यको वहन करनेवाले, श्रीसम्पन्न, यज्ञ और श्राद्धके भोक्ता तथा अविनाशी परमात्मा हैं, वे सर्वव्यापी भगवान् विष्णु देवमाता अदितिके गर्भमें कैसे आये ? तथा जो इन्द्रके भी स्रष्टा हैं, वे इन्द्रके छोटे भाई कैसे हुए ? यदि वे देवदेवेश्वर अदितिके गर्भसे उत्पन्न हो ही गये, तब उन वामनदेवको विष्णुत्व ( व्यापकत्व ) कैसे प्राप्त हुआ ? मेरे इस प्रश्नका उत्तर देते हुए आप परमात्मा नारायणदेवके वामनावतारकी कथा मुझसे कहिये ॥ ५—८ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यामर्चितामृषिपुङ्गवैः।
पुराणैः कविभिः प्रोक्तां ब्रह्मोक्तां ब्राह्मणैरिताम् ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! यह दिव्य कथा बड़े-बड़े ऋषियोंद्वारा पूजित है। पुराणों तथा त्रिकालदर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित है। वेदमन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित तथा ब्राह्मणोंद्वारा कथित है। तुम ध्यान देकर इसे सुनो ॥ ९ ॥
मारीचस्य सुरेशस्य कश्यपस्य प्रजापतेः।
अदितिर्दितिश्चैव भार्ये भगिन्यौ जनमेजय ॥ १० ॥
जनमेजय ! मरीचि-पुत्र देवेश्वर प्रजापति कश्यपकी भार्याओंमेंसे दो प्रधान थीं—अदिति और दिति। वे दोनों आपसमें सगी बहनें थीं ॥ १० ॥
अदित्यां जज्ञिरे देवाः कश्यपस्य महात्मनः।
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोऽशो भगस्तथा ॥ ११ ॥
इन्द्रो विवस्वान् पूषा च पर्जन्यो दशमस्तथा।
तथैकादशमस्त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते ॥ १२ ॥
अदितिके गर्भसे महात्मा कश्यपसे देवता उत्पन्न हुए। धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, दसवें पर्जन्य, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
दित्यां जातो हि बलवान् हिरण्यकशिपुः प्रभुः।
तस्यानुजश्च दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षः प्रतापवान् ॥ १३ ॥
दितिके गर्भसे बलवान् एवं सामर्थ्यशाली हिरण्यकशिपु तथा उसका छोटा भाई प्रतापी दैत्यराज हिरण्याक्ष—ये दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राः पञ्च घोरपराक्रमाः।
प्रह्लादश्चैव संह्लादस्तथानुह्लाद एव च।
ह्रदश्चैव तु विक्रान्तः पञ्चमोऽनुह्रदस्तथा ॥ १४ ॥
हिरण्यकशिपुके पाँच पुत्र हुए, जो भयंकर पराक्रमी थे, उनके नाम इस प्रकार हैं—प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, पराक्रमी ह्रद और पाँचवाँ अनुह्रद ॥ १४ ॥
विरोचनश्च प्राह्लादिस्तस्य पुत्रो बलिः स्मृतः।
पुत्रपौत्रं च बलवत् तेषामक्षयमव्ययम् ॥ १५ ॥
प्रह्लादका पुत्र विरोचन और विरोचनका पुत्र बलि हुआ। उन सबके पुत्र-पौत्र बड़े बलवान्, अक्षय और अविनाशी परम्परावाले थे ॥ १५ ॥
तेजस्विनां सुरारीणां दैत्येन्द्राणां मनस्विनाम्।
गणाः सुबहुशो राजन् देशे देशे सहस्रशः ॥ १६ ॥
राजन् ! उन तेजस्वी और मनस्वी देवद्रोही दैत्यराजोंके सहस्रों समुदाय देश-देशमें विद्यमान हैं ॥ १६ ॥
ते दृष्ट्वा नारसिंहेन हिरण्यकशिपुं हतम्।
दैत्या देववधार्थाय बलिमिन्द्रं प्रचक्रिरे ॥ १७ ॥
भगवान् नृसिंहने हिरण्यकशिपुका वध कर दिया, यह देख दैत्योंने देवताओंका वध करनेके लिये राजा बलिको अपना इन्द्र बनाया ॥ १७ ॥
दृष्ट्वा धर्मपरं नित्यं सत्यवाक्यं जितेन्द्रियम्।
शौर्याध्ययनसम्पन्नं सर्वज्ञानविशारदम् ॥ १८ ॥
परावरगृहीतार्थं तत्त्वदर्शिनमव्ययम्।
तेजस्विनं सुररिपुं हिरण्यकशिपुं यथा ॥ १९ ॥
अभिषेकेन दिव्येन बलिं वैरोचनिं तथा।
दैत्याधिपत्ये दितिजास्तदा सर्वेऽभ्यपूजयन् ॥ २० ॥
बलि सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, शौर्य और स्वाध्यायसे सम्पन्न, सर्वज्ञानविशारद, परावर-तत्त्वके ज्ञाता, तत्त्वदर्शी, अविनाशी, तेजस्वी तथा हिरण्यकशिपुके समान ही शक्तिशाली दैत्य थे, उनके इन गुणोंको देखकर उस समय समस्त दैत्योंने विरोचनकुमार बलिको दिव्य अभिषेकके द्वारा दैत्येन्द्रपदपर प्रतिष्ठित करके उनका पूजन किया ॥ १८-२० ॥
अभिषिक्तस्तदा दैत्यैर्बलिर्बलवतां वरः।
ब्रह्मणा चैव तुष्टेन हिरण्यकशिपोः पदे ॥ २१ ॥
अभिषिक्तोऽसुरगणैर्बलिर्वैरोचनिस्तदा ।
काञ्चनैः कलशैः स्फीतैः सर्वतीर्थाम्बुसंवृतैः ॥ २२ ॥
दैत्योद्वारा बलवानोंमें श्रेष्ठ बलिका अभिषेक हो जानेपर