भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 902
८७८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

हैं। विद्वान् पुरुष आपको ही सर्वश्रेष्ठ पुराण पुरुष कहते हैं॥ ३१॥

परं परस्यापि परं रहस्यं परं परस्यापि परं परं यत्।
परं परस्यापि परं तपो यत् त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥
परसे भी पर जो परम रहस्य है, परसे भी पर जो परात्पर तत्त्व है तथा जो परसे भी पर परम तप है, वह आप ही हैं। आपको ही ऋषि-मुनि श्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं॥ ३२॥

परं परस्यापि परं परायणं परं च गुह्यं च परं च धाम।
परं च योगं परमं प्रभुत्वं त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३३॥
परसे भी पर जो परम परायण (उत्कृष्ट आश्रयदाता) है, वह आप ही हैं। ज्ञानीजन आपको ही परम गुह्य, परम धाम, परम योग, परम प्रभुत्व तथा श्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं॥ ३३॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् सर्वलोकपितामहः।
स्तुत्वा नारायणं देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः॥ ३४॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ऐसा कहकर तथा नारायणदेवकी स्तुति करके सर्वलोकपितामह सर्वसमर्थ भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये॥ ३४॥

ततो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु च।
क्षीरोदस्योत्तरं कूलं जगाम प्रभुरीश्वरः॥ ३५॥
तदनन्तर बाजे बजने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। उस समय सबके स्वामी भगवान् श्रीहरि क्षीरसागरके उत्तर तटपर चले गये॥ ३५॥

नारसिंहीं तनुं त्यक्त्वा स्थापयित्वा च तद् वपुः।
पौराणं रूपमास्थाय ययौ स गरुडध्वजः॥ ३६॥
नरसिंहरूपको त्यागकर उसकी प्रतिमा स्थापित करके भगवान् गरुड़ध्वज पुराण-प्रसिद्ध चतुर्भुजरूपका आश्रय ले अपने धामको चले गये॥ ३६॥

अष्टचक्रेण यानेन भूतियुक्तेन शोभिना।
अव्यक्तप्रकृतिर्देवः संस्थानमगमत् प्रभुः॥ ३७॥
सर्वसमर्थ भगवान् श्रीहरि अव्यक्त प्रकृतिवाले हैं। वे पञ्चभूतनिर्मित अथवा ऐश्वर्ययुक्त आठ चक्रवाले शोभाशाली रथसे अपने स्थानको पधारे॥ ३७॥

एवं महात्मना तेन नृसिंहवपुषा तथा।
देवेन निहतः पूर्वं हिरण्यकशिपुश्च सः॥ ३८॥
इस प्रकार उस समय नरसिंहरूपधारी उन परमात्मा भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हिरण्यकशिपुका वध किया था॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहप्रादुर्भावे हिरण्यकशिपुवधकथने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारके प्रसङ्गमें हिरण्यकशिपुके वधका वर्णनविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥


अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

वामनावतारका उपक्रम, बलिको अभिषेक तथा दैत्योंका उनसे त्रैलोक्यविजयके लिये अनुरोध

वैशम्पायन उवाच
नृसिंह एष कथितो भूयोऽयं वामनोऽपरः।
यत्र वामनमास्थाय रूपं रूपविदां वरः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह नृसिंहावतारकी कथा कही गयी। अब दूसरे वामन-अवतारका वर्णन किया जाता है। इस अवतारमें रूपवेत्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने वामन रूप धारण करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया था॥ १॥

बलेर्बलवतो यज्ञे वलिना विष्णुना पुरा।
विक्रमैस्त्रिभिराक्रम्य त्रैलोक्यमखिलं हृतम्॥ २॥
पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु (वामनरूप धारण करके) बलवान् बलिके यज्ञमें गये। वहाँ उन्होंने अपने तीन ही पगोंसे नापकर सारी त्रिलोकीका राज्य हर लिया॥ २॥

समुद्रवसना चोर्वी नानानगविभूषिता।
हृत्वा दत्ता सुरेन्द्राय शक्राय प्रभविष्णुना॥ ३॥
प्रभावशाली श्रीहरिने नाना प्रकारके पर्वतोंसे विभूषित तथा समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित यह पृथ्वी बलिसे लेकर देवराज इन्द्रको दे दी॥ ३॥

जनमेजय उवाच
अत्र मे संशयो ब्रह्मंस्तत्र कौतूहलं महत्।
कथं नारायणो देवो वामनत्वमुपागतः॥ ४॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! इस विषयमें मुझे संदेह है, साथ ही महान् कौतूहल भी है। भगवान् नारायणदेव वामन कैसे हो गये?॥ ४॥

यः पुराणे पुराणात्मा भूत्वा नारायणः प्रभुः।
पद्मनाभो महाबाहुर्लोकानां प्रकृतिर्ध्रुवः॥ ५॥