भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 901

भविष्यपर्व ] सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ८७७


को जाननेवाले विद्वान् पुरुष आपके इसी स्वरूपकी आराधना करेंगे ॥ १७ ॥

मृगेन्द्रत्वं च लोकेषु सर्वसत्त्वेषु वा विभो ।
गायन्ति त्वां च मुनयो मृगेन्द्र इति नित्यशः ।
त्वत्प्रसादात् स्वकं स्थानं प्रतिपन्नाः स्म वै विभो ॥ १८ ॥
प्रभो ! सम्पूर्ण लोकों अथवा समस्त प्राणियोंमें आपका यह मृगेन्द्ररूप विख्यात होगा। मुनि भी सदा 'मृगेन्द्र' कहकर आपके गुणोंका गान करेंगे। प्रभो ! आपकी कृपासे हमें अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया ॥ १८ ॥

एवमुक्तो देवसंघैर्नरसिंहो महामनाः ।
ब्रह्मा च परमप्रीतो विष्णोः स्तोत्रमुदैरयत् ॥ १९ ॥
देव-समुदायके ऐसा कहनेपर महामनस्वी भगवान् नरसिंह बड़े प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने भी बड़े हर्षके साथ भगवान् विष्णुकी स्तुति की ॥ १९ ॥

ब्रह्मोवाच

भवानक्षरमव्यक्तमचिन्त्यं गुह्यमुत्तमम् ।
कूटस्थमकृतं कर्तृ सनातनमनामयम् ॥ २० ॥
ब्रह्मा बोले—भगवन् ! आप अविनाशी, अव्यक्त, अचिन्त्य, गोपनीय परमतत्त्व और कूटस्थ हैं। आपका कोई कर्त्ता नहीं है। आप स्वयं सबके कर्त्ता हैं, आप ही रोग-शोकसे रहित सनातन ब्रह्म हैं ॥ २० ॥

सांख्ययोगे च या बुद्धिस्तत्त्वार्थपरिनिष्ठिता ।
तां भवान् वेद विज्ञात्मा पुरुषः शाश्वतो ध्रुवः ॥ २१ ॥
सांख्ययोगमें जो तत्त्वार्थनिष्ठ बुद्धि है, उसे आप जानते हैं। आप ज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी सनातन एवं ध्रुव परमात्मा हैं ॥

त्वं व्यक्तश्च तथाव्यक्तस्त्वत्तः सर्वमिदं जगत् ।
भवन्मया वयं देव भवानात्मा भवान् प्रभुः ॥ २२ ॥
आप ही व्यक्त जगत् और अव्यक्त कारण हैं। आपहीसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का प्रादुर्भाव हुआ है। देव ! हम आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हमारे आत्मा और आप ही प्रभु हैं ॥ २२ ॥

चतुर्विभक्तमूर्तिस्त्वं सर्वलोकविभुर्गुरुः ।
चतुर्युगसहस्रेण सर्वलोकान्तकान्तकः ॥ २३ ॥
आपकी मूर्ति विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय—इन चार भेदोंसे विभक्त है। आप समस्त जगत्में व्यापक एवं सबके गुरु हैं। एक सहस्र चतुर्युग व्यतीत होनेपर आप ही समस्त लोकोंका अन्त करनेवाले कल्पान्तकारी काल बन जाते हैं ॥

प्रतिष्ठा सर्वभूतानामनन्तबलपौरुषः ।
कपिलप्रभृतीनां च यतीनां परमा गतिः ॥ २४ ॥
आप ही सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं। आपके बल और पौरुष अनन्त हैं। कपिल आदि यतियों (सांख्य-योगियों) की परम गति आप ही हैं ॥ २४ ॥

अनादिमध्यनिधनः सर्वात्मा पुरुषोत्तमः ।
स्रष्टा त्वं त्वं च संहर्ता त्वमेको लोकभावनः ॥ २५ ॥
आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वात्मा पुरुषोत्तम हैं। एकमात्र आप ही सृष्टि, संहार तथा सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करनेवाले हैं ॥ २५ ॥

भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो वरुणो यमः ।
भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभुरव्ययः ॥ २६ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, महेन्द्र, वरुण और यम हैं, आप ही कर्त्ता तथा विकर्त्ता हैं। समस्त लोकोंके अविनाशी प्रभु भी आप ही हैं ॥ २६ ॥

परं च सिद्धिं परमं च देवं
परं च मन्त्रं परमं मनश्च ।
परं च धर्मं परमं यशश्च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २७ ॥
विद्वान् पुरुष आपको ही परम सिद्धि, परम देवता, परम मन्त्र, परम मन, परम धर्म, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २७ ॥

परं च सत्यं परमं हविश्च
परं पवित्रं परमं च मार्गम् ।
परं च होत्रं परमं च यज्ञं
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २८ ॥
ज्ञानीजन आपको ही परम सत्य, उत्कृष्ट हविष्य, परम पवित्र सर्वोत्तम मार्ग (गन्तव्यपद), उत्तम अग्निहोत्र, परम यश तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥ २८ ॥

परं शरीरं परमं च धाम
परं च योगं परमां च वाणीम् ।
परं रहस्यं परमां गतिं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २९ ॥
विद्वानोंका कथन है कि आप ही उत्तम शरीर, परम धाम, परम योग, सर्वोत्तम वाणी, परम रहस्य, परम गति तथा सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष हैं ॥ २९ ॥

परं परस्यापि परं च यत् परं
परं परस्यापि परं च देवम् ।
परं परस्यापि परं प्रभुं च
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३० ॥
परसे भी पर जो परात्पर-तत्त्व है, परसे भी पर जो परम देवता है तथा परसे भी पर जो परम प्रभु है, वह आप ही हैं। आपहीको ज्ञानी पुरुष सर्वश्रेष्ठ पुराण-पुरुष कहते हैं ॥

परं परस्यापि परं प्रधानं
परं परस्यापि परं च तत्त्वम् ।
परं परस्यापि परं च धाता
त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ॥ ३१ ॥
परसे भी पर जो परम प्रधान है, परसे भी पर जो परम तत्त्व है तथा परसे भी पर जो परम धाता है, वह आप ही