विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 900, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८७६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
देवताओंके अनुरोधसे भगवान् नरसिंहद्वारा हिरण्यकशिपुका वध तथा देवताओं और ब्रह्माजीद्वारा उनकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
तत्रादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च मरुतस्तथा ।
रुद्रा देवा महात्मानो वसवश्च महाबलाः ॥ १ ॥
आगम्य ते मृगेन्द्रस्य सकाशं सूर्यवर्चसः ।
ऊचुः संत्रस्तमनसो देवा लोकक्षयार्दिताः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! लोक-संहारकी आशङ्कासे पीड़ित और भयभीत चित्तवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी देवता—आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, महात्मा रुद्रगण तथा महाबली वसुगण वहाँ भगवान् नरसिंहके निकट आकर इस प्रकार बोले—॥ १-२ ॥
जहि देव दितेः पुत्रं दानवं लोकनाशनम् ।
दुर्वृत्तमसदाचारं सह सर्वैर्महासुरैः ॥ ३ ॥
'देव ! आप सम्पूर्ण जगत्का विनाश करनेवाले, दुर्वृत्त, दुराचारी दानव दितिपुत्र हिरण्यकशिपुका समस्त बड़े-बड़े असुरोंसहित वध कर डालिये ॥ ३ ॥
त्वं ह्येषामन्तकृच्छक्तो दैत्यानां दैत्यनाशन ।
तन्नाशय हितार्थाय लोकानां स्वस्ति वै कुरु ॥ ४ ॥
'दैत्यनाशन ! आप ही इन दैत्योंका अन्त कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं । अतः आप संसारके हितके लिये इन दैत्योंका नाश और सब लोगोंका कल्याण कीजिये ॥ ४ ॥
त्वं गुरुः सर्वलोकानां त्वमिन्द्रस्त्वं पितामहः ।
ऋते त्वदन्यच्छरणं न भूतं न भविष्यति ॥ ५ ॥
'आप ही समस्त लोकोंके गुरु, इन्द्र और पितामह हैं, आपके सिवा दूसरा कोई न तो इस जगत्के लिये शरणदाता हुआ है और न होगा ही' ॥ ५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं देवो देवानामादिसम्भवः ।
ननाद सुमहानादमतिगम्भीरनिःस्वनम् ॥ ६ ॥
देवताओंका यह वचन सुनकर सबके आदिकारण भगवान् नरसिंहने अत्यन्त गम्भीर स्वरमें बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६ ॥
पाटितान्यसुरेन्द्राणां मृगेन्द्रेण महात्मना ।
सिंहनादेन महता हृदयानि मनांसि च ॥ ७ ॥
उन महात्मा मृगेन्द्रने अपने महान् सिंहनादसे समस्त असुरेन्द्रोंके हृदय विदीर्ण कर दिये । मनमें क्षोभ उत्पन्न कर दिये ॥ ७ ॥
गणः क्रोधवशो नाम कालकेयस्तथा परः ।
वेगश्च वैगलेयश्च सैंहिकेयश्च वीर्यवान् ॥ ८ ॥
संहादीयो महानादो महावेगस्तथा परः ।
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः ॥ ९ ॥
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलचारिणः ।
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः ॥ १० ॥
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च भीमकर्मार्कलोचनः ।
वज्री शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्ततः ॥ ११ ॥
जीमूतघनसंकाशो जीमूत इव वेगवान् ।
जीमूतघनसंनादो जीमूतसदृशद्युतिः ॥ १२ ॥
देवारिर्दितिजो दृप्तो नृसिंहं समुपाद्रवत् ॥ १३ ॥
दैत्योंका क्रोधवश नामक गण, दूसरा कालकेय नामक गण, वेग, वैगलेय, पराक्रमी सैंहिकेय (सिंहिकापुत्र राहु), संह्लादीय, महानाद, महावेग, महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन आदि आकाश और पातालमें विचरनेवाले निशाचरवंशज तथा अन्य भयंकर दैत्यगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग, भीमवेग, भीमकर्मा, अर्कलोचन, वज्री, शूली और कराल—इन सबके साथ मेघके समान रूपवान्, मेघतुल्य वेगवान्, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला तथा मेघके ही सदृश कान्तिमान् बलाभिमानी देवद्रोही दैत्य हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर धावा किया ॥ ८—१३ ॥
समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः ।
तत्रोङ्कारसहायेन विदार्य निहतो युधि ॥ १४ ॥
तब युद्धस्थलमें ॐकारसहित भगवान् नरसिंहने उछलकर अपने तीखे और बड़े-बड़े नखोंद्वारा उस असुरका वक्षःस्थल विदीर्ण करके उसे मार डाला ॥ १४ ॥
मही च लोकश्च शशी नभश्च
ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः ।
नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च
गताः प्रकाशं दितिपुत्रनाशात् ॥ १५ ॥
उस दैत्यके विनाशसे पृथ्वी, लोक, चन्द्रमा, आकाश, ग्रह, सूर्य, समस्त दिशाएँ, नदी, पर्वत और महासागर—इन सबमें प्रकाश (उल्लास) छा गया ॥ १५ ॥
ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैरादिदेवं सनातनम् ॥ १६ ॥
तब आनन्दमग्न हुए देवता तथा तपोधन ऋषि नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सनातन आदिदेव भगवान् नरसिंहकी स्तुति करने लगे ॥ १६ ॥
देवा ऊचुः
यत् त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः ।
एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः ॥ १७ ॥
**देवता बोले—**देव ! आपने जो यह नरसिंह रूप धारण किया है, कार्य और कारण अथवा भूत और वर्तमान-