विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 899, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ८७५
निम्नभाग सब ओरसे समुद्रके जलसे आच्छादित है (वह पर्वत भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो उठा था) ॥ ५९-६० ॥
विद्युत्वान् पर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम्।
विद्युतां यत्र संपाता निपात्यन्ते नगोत्तमे ॥ ६१ ॥
ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमानृषभसंस्थितः।
कुञ्जरः पर्वतश्चैव यत्रागस्त्यगृहं महत् ॥ ६२ ॥
विशाखरथ्या दुर्धर्षा सर्पाणामालया पुरी।
तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता ॥ ६३ ॥
शोभाशाली विद्युत्वान् नामक पर्वत सौ योजन लंबा है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर विद्युतपात होते रहते हैं। उसके सिवा, वृषभके आकारमें स्थित ऋषभ पर्वत, जहाँ अगस्त्यजीका विशाल भवन है वह कुञ्जर पर्वत, सर्पोंका निवासस्थान दुर्जय विशाखरथ्या नामक पुरी तथा भोगवतीपुरीको भी उस दैत्यराजने कम्पित कर दिया ॥ ६१–६३ ॥
महामेघगिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वत:।
चक्रवांस्तु गिरि: श्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वत: ॥ ६४ ॥
प्राग्ज्योतिषपुरं चैव जातरूपमयं शुभम्।
यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानव: ॥ ६५ ॥
मेरुश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनि:स्वन:।
षष्टिं तत्र सहस्राणि पर्वतानां विशाम्पते ॥ ६६ ॥
प्रजानाथ ! महामेघगिरि, पारियात्र पर्वत, श्रेष्ठ चक्रवान् गिरि, वाराह पर्वत, स्वर्णमय सुन्दर प्राग्ज्योतिषपुर जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास करता था, मेघकी गम्भीर गर्जनासे युक्त पर्वतश्रेष्ठ मेरु, जहाँ साठ हजार पर्वतोंका निवास है; इन सबको उस दैत्यने विचलित कर दिया ॥
तरुणादित्यसंकाशो महेन्द्रश्च महागिरि:।
देवावास: शुभ: पुण्यो गिरिराजो दिवं गतः ॥ ६७ ॥
बाल-सूर्यके समान अरुण कान्तिसे प्रकाशित महागिरि महेन्द्र जो देवताओंका सुन्दर निवास-स्थान है, वह पवित्र गिरिराज स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ है (वह भी उस दैत्यसे कम्पित हो गया ।) ॥ ६७ ॥
हेमशृङ्गो महाशैलस्तथा मेघसखो गिरि:।
कैलासश्चापि दुष्कम्पो दानवेन्द्रेण कम्पितः ॥ ६८ ॥
महाशैल हेमशृङ्ग, मेघसख नामक पर्वत तथा जिसको कम्पित करना कठिन है वह कैलास भी उस दानवराजके पैरोंकी धमकसे काँप उठा ॥ ६८ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दर:।
श्रीमान् मनोहरश्चैव नित्यं पुष्पितपादप: ॥ ६९ ॥
कैलास वह पर्वत है जिसकी कन्दराओंका यक्ष, राक्षस और गन्धर्व सदा ही सेवन करते हैं, उसके वृक्ष सदा खिले रहते हैं, वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न और मनोहर है ॥ ६९ ॥
हेमपुष्करसंछन्नं तेन वैखानसं सर:।
कम्पितं मानसं चैव राजहंसैर्निषेवितम् ॥ ७० ॥
स्वर्णमय कमलोंसे आच्छादित वैखानस सरोवर तथा राजहंसोंसे सेवित मानस सरोवरको भी उसने क्षुब्ध कर दिया था ॥ ७० ॥
विशृङ्गः पर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा।
तुषारचयसंकाशो मन्दरश्चैव पर्वत: ॥ ७१ ॥
उशीरबीजश्च गिरी रुद्रोपस्थस्तथाद्रिराट्।
प्रजापतेश्च निलयस्तथा पुष्करपर्वतः॥ ७२ ॥
विशृङ्ग पर्वत, सरिताओंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, हिमकी राशि-सदृश मन्दराचल, उशीरबीज नामक पर्वत, गिरिराज रुद्रोपस्थ तथा प्रजापतिको निवासस्थान पुष्कर पर्वत—इन सबको उस दैत्यने कम्पित कर दिया था ॥ ७१-७२ ॥
देवावृत पर्वतश्चैव तथा वै बालुको गिरि:।
क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूमवर्णश्च पर्वत:॥ ७३ ॥
एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा।
नद्यश्च सागराश्चैव दानवेन्द्रेण कम्पिता: ॥ ७४ ॥
देवावृत पर्वत, बालुकगिरि, क्रौञ्च गिरि, सप्तर्षिशैल तथा धूम्रवर्ण पर्वत—ये और दूसरे भी बहुत-से पर्वत, देश, जनपद, नदी और समुद्र उस दानवेन्द्रने कम्पित कर दिये ॥
कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः।
खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलवासिनः॥ ७५ ॥
गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः।
ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः॥ ७६ ॥
इतना ही नहीं, आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखनेवाले जो पातालनिवासी निशाचरवंशज थे, वे महीपुत्र कपिल, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन तथा अन्य भयंकर असुरगण—मेघनाद, अङ्कुशायुध, ऊर्ध्वग और भीमवेग आदि भी—सब-के-सब कम्पित हो उठे ॥ ७५-७६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥