विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 893, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६९
रूप धारण कर लेते हैं, उसी प्रकार अपने ऊपर फेंके जानेवाले प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बड़े-बड़े अस्त्रोंके समूहोंसे आच्छादित हुए भगवान् नरसिंह अन्धकाराच्छन्न एवं अद्भुत प्रतीत होते थे ॥ २५ ॥
तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालैः सर्वैस्तदा दैत्यगणैः समेतैः ।
नाकम्पताजौ भगवान् प्रतापवान् स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ॥ २६ ॥
उस समय सब दैत्य एकत्र होकर बड़े-बड़े अस्त्रोंके समुदायसे उनपर आघात कर रहे थे, तो भी वे प्रतापी भगवान् नृसिंह उस युद्धस्थलमें कम्पित नहीं हुए। वे स्वभावसे ही हिमालय पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ २६ ॥
संतापितास्ते नरसिंहरूपिणा दितेः सुताः पावकदीप्ततेजसा ।
भयाद् विचेलुः पवनोद्धता यथा महोर्मयः सागरवारिसम्भवाः ॥ २७ ॥
नृसंहरूपधारी भगवान्का तेज अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था, उनसे संतापित हुए दैत्य भयसे विचलित हो उठे, मानो प्रचण्ड वायुके थपेड़े खाकर महासागरके जलमें बड़ी-बड़ी तरंगें उठने लगी हों ॥ २७ ॥
शतैर्धनुर्भिः सुमहातिवेगा युगान्तकालप्रतिमाञ्छरौघान् ।
एकायनस्था मुमुचुर्नृसिंहे महासुराः क्रोधविदीपिताङ्गाः ॥ २८ ॥
वे महान् असुर अत्यन्त वेगशाली थे, उनके सारे अङ्ग क्रोधसे जल रहे थे, अतः वे सौ धनुषोंकी दूरीपर एक स्थानमें खड़े हो उन नृसिंहदेवपर प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी बाणसमूहोंको छोड़ने लगे ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नृसिंहावतारविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
दैत्योंद्वारा किये गये प्रहारों और रची गयी मायाओंकी निष्फलता
वैशम्पायन उवाच
खराः खरमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः ।
ईहामृगमुखाश्चान्ये वराहसदृशाननाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन दानवोंमें कुछ तो मूर्तिमान् गधे ही थे और कुछ दानवोंके केवल मुख ही गधोंके समान थे। कितनोंके मुख मगरों और विषधर सर्पके समान थे। किन्हींके मुख भेड़ियोंके समान और किन्हींके सूअरोंके समान थे ॥ १ ॥
बालसूर्यमुखाश्चैव धूमकेतुमुखास्तथा ।
चन्द्रार्धचन्द्रवक्त्राश्च प्रदीप्ताग्निमुखास्तथा ॥ २ ॥
कितनोंके मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिसे सुशोभित थे। कई दानव धूमकेतुके-से मुखवाले थे। कुछ दैत्योंके मुख पूर्ण चन्द्र, अर्ध चन्द्र तथा प्रज्वलित अग्निके समान थे ॥ २ ॥
हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः ।
पञ्चास्या लेलिहानाश्च काकगृध्रमुखास्तथा ॥ ३ ॥
किन्हींके मुख हंसोंके समान थे तो किन्हींके मुर्गोंके समान। कितने ही दैत्य मुँह बाये रहते थे, अतः बड़े भयङ्कर जान पड़ते थे। किन्हीं-किन्हींके पाँच मुख थे। कोई-कोई लपलपाती जिह्वासे अपने जबड़े चाटते थे और कितने ही दैत्य कौओं तथा गीधोंके समान मुखवाले थे ॥ ३ ॥
विद्युज्जिह्वास्त्रिशीर्षाश्च तथोल्कासंनिभाननाः ।
महाग्राहनिभाश्चान्ये दानवा बलदर्पिताः ॥ ४ ॥
किन्हींकी जिह्वा बिजलीके समान चमकती रहती थी। किन्हींके तीन सिर थे। कोई-कोई उल्काके समान मुखवाले थे तथा बलके घमंडसे भरे हुए दूसरे बहुत-से दानव बड़े-बड़े ग्राहोंके समान मुख धारण करते थे ॥ ४ ॥
कैलासवपुषस्तस्य शरीरे शरवृष्टयः ।
अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथां चक्रुराहवे ॥ ५ ॥
भगवान् नरसिंहका श्रीविग्रह कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल था। वे सर्वथा अवध्य थे। उनके शरीरमें दैत्योंद्वारा की गयी बाणोंकी वर्षाओंने तनिक भी पीड़ा उत्पन्न नहीं की ॥ ५ ॥
एवं भूयोऽपरान् घोरान्सृजन् दानवाः शरान् ।
मृगेन्द्रस्योरसि क्रुद्धा निःश्वसन्त इवोरगाः ॥ ६ ॥
इसी तरह फुफकारते हुए सर्पोंके समान उन कुपित हुए दानवोंने भगवान् नरसिंहकी छातीमें पुनः दूसरे-दूसरे घोर बाणोंका प्रहार किया ॥ ६ ॥
ते दानवशरा घोरा मृगेन्द्राय समीरिताः ।
विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते ॥ ७ ॥
भगवान् नरसिंहपर चलाये गये दानवोंके वे घोर बाण पर्वतमें अदृश्य हो जानेवाले जुगनुओंके समान आकाशमें ही विलीन हो गये ॥ ७ ॥
ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्याः क्रोधसमन्विताः ।
मृगेन्द्रायाक्षिपन्त्याशु प्रज्वलन्तीव सर्वशः ॥ ८ ॥
तब क्रुद्ध हुए दैत्य उन नरसिंहदेवपर बड़ी शीघ्रताके