भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 892
८६८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तथा चाप्रतिमां शक्तिं क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च।
अस्त्रं हयशिराश्चैव सौम्यमस्त्रं तथैव च ॥ ११ ॥
पैशाचमस्त्रममितं सार्पमस्त्रं तथाद्भुतम्।
मोहनं शोषणं चैव संतापनविलापने ॥ १२ ॥
जम्भणं प्रापणं चैव त्वाष्ट्रं चैव सुदारुणम्।
कालमुद्गरमक्षोभ्यं क्षोभणं तु महाबलम् ॥ १३ ॥
संवर्तनं मोहनं च तथा मायाधरं परम्।
गान्धर्वमस्त्रं दयितमसिरत्नं च नन्दकम् ॥ १४ ॥
प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम्।
अस्त्रं पाशुपतं चैव यस्याप्रतिहता गतिः ॥ १५ ॥
एतान्यस्त्राणि सर्वाणि हिरण्यकशिपुस्तदा।
चिक्षेप नारसिंहस्य दीप्तस्याग्नेर्यथाहूतिः ॥ १६ ॥

सब अस्त्रोंमें श्रेष्ठ जो अत्यन्त भयङ्कर दण्डास्त्र था, उसको भी चलाया। उसके सिवा अत्यन्त उग्र कालचक्र, विष्णुचक्र, धर्मचक्र, महाचक्र, अजितचक्र, घोर ऐन्द्र चक्र, ऋषिचक्र, ब्रह्मचक्र, जिसकी गड़गड़ाहटकी तीनों लोकोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है, वह विचित्र अशनि, सूखी-गीली दो प्रकारकी अशनि, भयानक रौद्रास्त्र—शूल, कङ्काल, मूसल, ब्रह्मशिरनामक अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ऐषीकास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, आग्नेयास्त्र, शैशिरास्त्र, वायव्यास्त्र, मथनास्त्र, कपालास्त्र, किङ्करास्त्र, अप्रतिम शक्ति, क्रौञ्चास्त्र, हयग्रीवास्त्र, सौम्यास्त्र, अनुपम पैशाचास्त्र, अद्भुत सर्पास्त्र, मोहनास्त्र, शोषणास्त्र, संतापनाव्र, विलापनास्त्र, जृम्भणास्त्र, प्रापणास्त्र, अत्यन्त दारुण त्वाष्ट्रास्त्र, अक्षोभ्य कालमुद्गर, महाबलवान् क्षोभणास्त्र, संवर्तनास्त्र, सम्मोहनास्त्र, मायाधरास्त्र तथा प्रिय गान्धर्वास्त्र, खड्गरत्न नन्दक, प्रस्वापनास्त्र, प्रमथनास्त्र, उत्तम वारुणास्त्र तथा जिसकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती वह पाशुपतास्त्र—इन सभी अस्त्रोंको उस समय हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर बारी-बारीसे चलाया, मानो वह प्रज्वलित अग्निको आहुति दे रहा हो ॥ ६—१६ ॥

अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुराधिपः।
विवस्वान् घर्मसमये हिमवन्तमिवांगुभिः ॥ १७ ॥

असुरेश्वर हिरण्यकशिपुने तेजसे प्रज्वलित हुए अस्त्रोंद्वारा भगवान् नरसिंहको ढक दिया, ठीक वैसे ही, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें भगवान् सूर्य हिमालयको अपनी किरणोंसे आच्छादित कर देते हैं ॥ १७ ॥

स ह्यमर्षानिलोद्भूतो दैत्यानां सैन्यसागरः।
क्षणेनाप्लावयत् सिंहं मैनाकमिव सागरः ॥ १८ ॥

दैत्योंके सैन्यरूपी समुद्रने रोषरूपी वायुके वेगसे उद्वेलित होकर क्षणभरमें भगवान् नरसिंहको उसी तरह आप्लावित-सा कर दिया, जैसे सागर मैनाकको अपने जलसे डुबो देता है ॥ १८ ॥

प्रासैः पाशैस्तथा शूलैर्गदाभिर्मुसलैस्तथा।
वज्रैरशनिकल्पैश्च शिलाभिश्च महाद्रुमैः ॥ १९ ॥
मुद्गरैः कूटपाशैश्च शूलोलूखलपर्वतैः।
शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारुणैः ॥ २० ॥
परिवार्य समन्तात् तु निघ्नन्तैर्हरिः तदा।
क्षतमल्पमप्यस्य न क्षुण्णमूर्जितस्य महात्मनः ॥ २१ ॥

प्रास, पाश, शूल, गदा, मूसल, वज्र, अशनि, शिला, बड़े-बड़े वृक्ष, मुद्गर, कूटपाश, शूल, ओखली, पर्वत, प्रज्वलित शतघ्नी तथा अत्यन्त भयङ्कर दण्ड आदि अस्त्रोंद्वारा दैत्य उन्हें सब ओरसे घेरकर मारने लगे। परंतु उस समय उन तेजस्वी महात्मा नरसिंहके शरीरका थोड़ा-सा भी भाग क्षत-विक्षत नहीं हुआ ॥ १९-२१ ॥

ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता
महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगाः।
समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुशस्त्राः
स्थितास्त्रिशीर्षा इव पन्नगेन्द्राः ॥ २२ ॥

उन दानवोंने अपने हाथोंमें पाश ले रखे थे। उनका वेग इन्द्रके वज्र और अशनिके समान था। वे सब ओर अस्त्र-शस्त्र लिये दोनों बाँहें ऊपर उठाये खड़े थे, इसलिये तीन फनवाले श्रेष्ठ सर्पोंके समान जान पड़ते थे ॥ २२ ॥

सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गा
नानाङ्गदाभोगपिनद्धगात्राः।
मुक्तावलीदामविभूषिताङ्गा
हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः ॥ २३ ॥

उनके अङ्ग स्वर्ण-मालाओंके समुदायसे विभूषित थे, नाना प्रकारके अङ्गद (बाजूबंद) आदि आभूषण उनके विभिन्न अङ्गोंसे जुड़े हुए थे और मोतियोंके हार उनके समस्त अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस अवस्थामें वे दैत्य विशाल पंखवाले हंसोंके समान सुशोभित होते थे ॥ २३ ॥

तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै
केयूरमालावलयोत्कटानि।
तान्युत्तमाङ्गानभितो विभान्ति
प्रभातसूर्यांशुसमप्रभाणि ॥ २४ ॥

उन वायुके समान बलशाली दैत्योंके उत्तम अङ्ग बाजूबंद, हार और वलय (कड़े) आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो प्रभातकालके सूर्यकी किरणोंके समान कान्तिमान् एवं शोभासम्पन्न हो रहे थे ॥ २४ ॥

तैः प्रक्षिपद्भिर्ज्वलितानलोपमै-
र्महास्त्रपूरैः स समावृतो बभौ।
गिरिर्यथा संततवर्षिभिर्घनैः
कृतान्धकारोऽद्भुतकन्दरद्रुमः ॥ २५ ॥

जैसे निरन्तर वर्षा करनेवाले घने बादलोंसे पर्वतपर अन्धकार छा जाता है तथा उसकी कन्दराएँ और वृक्ष अद्भुत