भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 888
८६४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सकान्तैर्धार्तराष्ट्रैश्च राजहंसैः सुरप्रियैः ।
कादम्बैश्चक्रवाकैश्च सारसैः कुररैरपि ॥ ६२ ॥
उन सरोवरोंमें अपनी प्रियतमाओंको साथ लिये धार्तराष्ट्र नामक देवप्रिय हंस, कादम्ब (कलहंस), चक्रवाक, सारस और कुरर आदि पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ६२ ॥

विमलस्फटिकाभानि पाण्डुराष्टदलानि च ।
कलहंसोपगीतानि सारिकाभिरुतानि च ॥ ६३ ॥
वे तालाब निर्मल स्फटिक मणिके समान जलसे भरे थे। उनमें श्वेत अष्टदल कमल शोभा पाते थे। कलहंसोंके गीत और सारिकाओंके कलरव वहाँ गूँजते रहते थे ॥ ६३ ॥

गन्धवत्यः शुभास्तत्र पुष्पमञ्जरिधारिणीः ।
दृष्टवान् पादपाग्रेषु नानापुष्पधरा लताः ॥ ६४ ॥
वहाँ वृक्षोंकी शाखाओं तथा शिखाओंपर भगवान्‌ने नाना प्रकारके फूल और मञ्जरी धारण करनेवाली सुन्दर सुगन्धित लताएँ फैली हुई देखीं ॥ ६४ ॥

केतकाशोकसरलाः पुन्नागांस्तिलकार्जुनाः ।
चूता नीपा नागपुष्पाः कदम्बव्वकुला धवाः ॥ ६५ ॥
प्रियङ्गुपाटलीवृक्षाः शाल्मल्यः सहरिद्रकाः ।
शालास्तालाः प्रियालाश्च चम्पकाश्च मनोरमाः ॥ ६६ ॥
तथा चान्ये व्यराजन्त सभायां पुष्पिता द्रुमाः ।
उस सभा-भवनमें केवड़े, अशोक, सरल, पुंनाग (नागकेशर), तिलक, अर्जुन, आम, नीप, नागपुष्प, कदम्ब, बकुल, धव, प्रियङ्गु, पाटल, सेमल, हरिद्रक, साल, ताल, प्रियाल, चम्पा तथा अन्य मनोरम पुष्पित वृक्ष शोभा पा रहे थे ॥ ६५-६६ ½ ॥

वैद्रुमाश्च द्रुमानीका दावाग्निज्वलितप्रभाः ॥ ६७ ॥
स्कन्धवन्तः सुशाखाश्च बहुतालसमुच्छ्रयाः ।
अञ्जनाशोकवर्णाभा भान्ति वञ्जुलका द्रुमाः ॥ ६८ ॥
मूँगेके वृक्षोंके समूह अपनी अरुण कान्तिसे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दावानलकी लपटोंसे जल रहे हों। सुन्दर तने और शाखावाले वञ्जुल नामक वृक्ष (जो अशोककी ही जातिके हैं) वहाँ शोभा पाते थे, उनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर थी और आभा अञ्जन तथा अशोकके समान प्रतीत होती थी ॥ ६७-६८ ॥

वरणा वत्सनाभाश्च पनसाश्चन्दनैः सह ।
नीलाः सुमनसश्चैव पीताम्लाश्चाश्वतिन्दुकाः ॥ ६९ ॥
प्राचीनामलका लोध्रा मल्लिका भद्रदारवः ।
आम्रातकास्तथा जम्बूल्लकुचाः शैलवालुकाः ॥ ७० ॥
सर्जार्जुनाः कन्दुरवाः पतङ्गाः कुटजास्तथा ।
रक्ताः कुरवकाश्चैव नीपाश्चागुरुभिः सह ॥ ७१ ॥
कदम्बाश्चैव भव्याश्च दाडिमीबीजपूरकाः ।
कालीयका दुकूलाश्च हिङ्गवस्तैलपर्णिकाः ॥ ७२ ॥
खर्जूरा नालिकेराश्च पूगवृक्षा हरीतकी ।
मधूकाः सप्तपर्णाश्च विल्वाः पारावतास्तथा ॥ ७३ ॥
पनसाश्च तमालाश्च नानागुल्मलतावृताः ।
लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥ ७४ ॥
एते चान्ये च बहवस्तत्र काननजा द्रुमाः ।
नानापुष्पफलोपेता व्यराजन्त समन्ततः ॥ ७५ ॥
वरण, वत्सनाभ, कटहल, चन्दन, नील, सुमना, पीत, अम्ल, पीपल, तेन्दूक, प्राचीन आँवले, लोध, मल्लिका, भद्रदारु, आम्रातक (अमला), जामुन, लकुच (बड़हर), शैल वालुक, सर्ज (राल), अर्जुन, कन्दुरव, पतंग, कुटज, लाल कुरवक, नीप, अगरु, कदम्ब, भव्य, अनार, बिजौरा नीबू, कालीयक, दुकूल, हिंगु, तैलपर्णिक, खजूर, नारियल, सुपारी, हरें, महुआ, छितवन, बेल, पारावत, पनस, नाना प्रकारकी झाड़ियों और लताओंसे घिरे हुए तमाल, पत्र-पुष्प और फलोंसे युक्त भाँति भाँतिकी वल्लरियाँ— ये तथा और भी बहुत-से जंगली वृक्ष, जो नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे भरे हुए थे, वहाँ सब ओर शोभा पाते थे ॥ ६९-७५ ॥

चकोराः शतपत्राश्च मत्तकोकिलसारिकाः ।
पुष्पितान् फलिताग्रांश्च सम्पतन्ति महाद्रुमान् ॥ ७६ ॥
वहाँके फूली-फली डालियोंवाले विशाल वृक्षोंपर चकोर, शतपत्र, मतवाले कोकिल तथा सारिका आदि पक्षी झुंड-के-झुंड आ-आकर बैठते थे ॥ ७६ ॥

रक्तपीतारुणास्तत्र पादपाग्रगता द्विजाः ।
परस्परमवैक्षन्त प्रहृष्टा जीवजीवकाः ॥ ७७ ॥
वृक्षके अग्रभागपर बैठे हुए लाल-पीले और अरुण रंगके पक्षी और जीव-जीवक वहाँ हर समय एक दूसरेको देख रहे थे ॥ ७७ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे हिरण्यकशिपुसभाभवने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नरसिंहावतारके प्रसंगमें हिरण्यकशिपुकी सभाका वर्णनविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥