विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 887, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| भविष्यपर्व ]** | एकचत्वारिंशोऽध्यायः | ८६३ |
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उन सर्वव्यापी परमेश्वरने आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए नरसिंह-शरीरसे युक्त हो हिरण्यकशिपुकी वह विस्तृत, रमणीय, मनोरम, समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे युक्त एवं परम उज्ज्वल दिव्य सभा देखी ॥ ४५-४६ ॥
विस्तीर्णां योजनशतं शतमध्यर्धमायताम्।
वैहायसीं कामगमां पञ्चयोजनमुच्छ्रिताम् ॥ ४७ ॥
उस सभा-भवनकी लंबाई डेढ़ सौ योजन और चौड़ाई सौ योजनकी थी। उसकी ऊँचाई पाँच योजनकी थी। वह आकाशमें ही स्थित रहनेवाली और सभासदोंके इच्छानुसार चलनेवाली थी ॥ ४७ ॥
जराशोकक्लमव्यक्तां निष्प्रकम्पां शिवां शुभाम्।
शुभासनवतीं रम्यां ज्वलन्तीमिव तेजसा ॥ ४८ ॥
उसमें बुढ़ापा, शोक और थकावट इन दोषोंका प्रवेश नहीं था। वह अविचल, शिव (सुखद) एवं सुन्दर थी। उसमें सुन्दर सिंहासन सजाकर रखे गये थे। वह रमणीय सभा अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रही थी ॥ ४८ ॥
अन्तःसलिलसंयुक्तां विहितां विश्वकर्मणा।
दिव्यरत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युताम् ॥ ४९ ॥
उसके भीतर जलाशय बना हुआ था। साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित थी ॥ ४९ ॥
नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि।
अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीशतधारिभिः ॥ ५० ॥
उसके भीतर तने हुए चँदोवोंमें नीले, पीले, काले, श्याम, श्वेत और लाल रंगकी झालरें लगी थीं और उन्हींमे गुच्छे लटकाये गये थे, साथ ही उसमे सैकड़ों मञ्जरियाँ जड़ी हुई थीं ॥ ५० ॥
सिताभ्रघनसङ्काशा प्लवन्तीवाप्सु दृश्यते।
धन्यासनवती रम्या ज्वलन्ती इव तेजसा ॥ ५१ ॥
बहुमूल्य आसनोंसे युक्त तथा तेजसे प्रज्वलित होती हुई-सी वह रमणीय सभा आकाशमें श्वेत बादलोंके समान दिखायी देती थी और जलमे तैरती हुई विशाल नौका जान पड़ती थी ॥ ५१ ॥
प्रभावती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा।
न सुखा न च दुःखा सा न शीता न च घर्मदा ॥ ५२ ॥
वह विशेष सौन्दर्यसे सुशोभित तथा अतिशय दीप्तिसे प्रकाशित थी, अपनी दिव्य सुगन्धसे वह मनको मोह लेती थी। वहाँ न सुख था, न दुःख; न तो सर्दीका अनुभव होता था और न गर्मीका ही ॥ ५२ ॥
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्ति हि।
नानारूपैर्विरचिता विचित्रैरतिभास्वरैः ॥ ५३ ॥
स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैः शाश्वती चाक्षता च सा।
अतिचन्द्रं च सूर्यं च पावकं च स्वयम्प्रभा ॥ ५४ ॥
उस सभामें पहुँचकर सदस्यगण भूख, प्यास, ग्लानिका अनुभव नहीं करते थे, वह नाना रूपवाले विचित्र अत्यन्त प्रकाशमान एवं दिव्य मणिमय खंभोंसे निर्मित हुई थी, बहुत टिकाऊ और सुदृढ़ थी। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निसे भी बढ़कर तेजोरराशिसे युक्त तथा अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली थी ॥ ५३-५४ ॥
दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम्।
सर्वे च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ ५५ ॥
स्वर्गके पृष्ठभागपर स्थित हो वह सभा सूर्यदेवको तिरस्कृत करती हुई-सी अपनी दीप्तिसे प्रकाशित होती थी, दिव्य और मानव सभी तरहके भोग वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे ॥ ५५ ॥
रसवन्तः प्रभूताश्च भक्ष्यभोज्यं तथाक्षयम्।
पुण्यगन्धाः स्रजस्तत्र नित्यपुष्पफलद्रुमाः ॥ ५६ ॥
रसीले पदार्थ अधिक मात्रामें सुलभ होते थे। अक्षय भक्ष्य, भोज्य वहाँ सदा प्रस्तुत रहता था। पवित्र गन्धवाले पुष्पहार वहाँ बराबर बनते थे और नित्य फल-फूल देनेवाले वृक्ष उसमे सदा लहलहाते रहते थे ॥ ५६ ॥
उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि सन्ति वै।
पुष्पिताग्रान् महाशाखान् प्रवालाङ्कुरधारिणः ॥ ५७ ॥
लतावितानसंश्छन्नान् सरित्सु च सरःसु च।
मनोहरांश्च विविधान् ददर्श स तदा प्रभुः ॥ ५८ ॥
द्रुमान् बहुविधांस्तत्र मृगेन्द्रो ददृशे द्रुतम्।
गन्धवन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानि च ॥ ५९ ॥
वहाँ गर्मीमें शीतल जल और सर्दीमें गर्म जल सदा सुलभ होता था। उस समय भगवान् नृसिंहने देखा, वहाँ सरिताओं और सरोवरोंके तटपर विविध प्रकारके मनोहर वृक्ष शोभा पाते थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे हुए थे। वे वृक्ष विशाल शाखाओंसे सुशोभित थे। नये-नये पल्लवोंके अङ्कुर धारण करते थे और फैली हुई लता-बेलोंके विस्तारसे आच्छादित हो रहे थे। उनके फूलोंमें मनोहर गन्ध और फलोंमें स्वादिष्ट रस थे ॥ ५७-५९ ॥
तानि शीतानि तोयानि तत्र तत्र सरांसि च।
अपश्यत् सर्वतीर्थानि सभायां शतशो विभुः ॥ ६० ॥
उस सभामें भगवान्ने जहाँ-तहाँ शीतल जल, सरोवर तथा सम्पूर्ण तीर्थ देखे ॥ ६० ॥
नलिनैः पुण्डरीकैश्च शतपत्रैः सुगन्धिभिः।
रक्तैः कुवलयैर्नीलैः कुमुदैः संयुतानि च ॥ ६१ ॥
वे सरोवर नलिन, पुण्डरीक तथा शतदल नामवाले सुगन्धित कमलोंसे सुशोभित थे; लाल और नील कमल तथा कुमुद उनमें छा रहे थे ॥ ६१ ॥