विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 886, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें८६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
आश्रमेषु मुनीन् सर्वान् ब्राह्मनान् संशितव्रतान् ।
सत्यधर्मरतान् दान्तान् धर्म्यानान् धीर्यवान् ॥ २९ ॥
उस घमण्डी दैत्यने विभिन्न आश्रमोंमें जाकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सत्य-धर्मपरायण समस्त ऋषियों और ब्राह्मणोंका घोर तिरस्कार किया ॥ २९ ॥
त्रैलोक्यमनुदन्तांश्च पराजित्य महासुरः ।
त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानवः ॥ ३० ॥
तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले समस्त देवताओंको पराजित करके त्रिलोकीके राज्यको अपने अधिकारमें लाकर वह महान् असुर दानवराज हिरण्यकशिपु स्वर्गलोकमें निवास करने लगा ॥ ३० ॥
यदा वरमदेन्मत्तश्चोदितः कालधर्मणा ।
यज्ञियानकरोद् दैत्यान् देवतानप्ययज्ञियान् ॥ ३१ ॥
तथादित्याश्च साध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा ।
रुद्रा देवगणा यक्षा देवद्विजमहर्षयः ॥ ३२ ॥
शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम् ।
देवं वेदमयं यज्ञं ब्रह्मदेवं सनातनम् ॥ ३३ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च प्रजालोकनमस्कृतम् ।
जब वरके मदसे उन्मत्त हो कालधर्मसे प्रेरित हुए उस असुरने दैत्योंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया और देवताओंको उस अधिकारसे वञ्चित कर दिया; तब आदित्य, साध्य, विश्वेदेव, वसु, रुद्र, देवगण, यक्ष, देवता, द्विज और महर्षि शरणागतवत्सल उन महाबली भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। जो देव (प्रकाशमान दिव्यविग्रहधारी), सर्ववेदमय, यज्ञपुरुष, सनातन ब्रह्मदेव, भूत, वर्तमान और भविष्यरूप तथा प्रजाजनोंसे अभिनन्दित हैं ॥ ३१-३३ ॥
देवा ऊचुः
नारायण महाभाग देव त्वां शरणं गताः ॥ ३४ ॥
त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः ।
त्वं हि नः परमो देवो ह्याद्यानां सुरोत्तम ॥ ३५ ॥
देवता बोले—महाभाग नारायणदेव ! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप ही हमारे लिये सबसे उत्कृष्ट धाता (भरण-पोषण करनेवाले) हैं और आप ही हमारे परम गुरु हैं। सुरश्रेष्ठ ! आप ही हम ब्रह्मादि देवताओंके भी परम देवता हैं ॥ ३४-३५ ॥
त्वं पद्मामलपत्राक्ष शत्रुपक्षभयावह ।
शमाय द्विपदंथायाक्षयाय भव नः प्रभो ॥ ३६ ॥
त्रायस्व जहि दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं प्रभो ।
निर्मल कमलपत्रके समान नेत्रवाले नारायण ! आप शत्रुपक्षको भय देते हैं। प्रभो ! आप दैत्यवंशके विनाश और हमारी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहें। भगवन् ! आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मार डालिये और उसके अत्याचारसे हमारी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥
विष्णुरुवाच
भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम् ॥ ३७ ॥
तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपत्स्यथ मा चिरम् ।
भगवान् विष्णु बोले—अमरो ! भय छोड़ो; मैं तुम्हें अभयदान देता हूँ। देवताओ ! तुम पुनः शीघ्र ही पहलेकी भाँति स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लोगे ॥ ३७ ॥
एष तं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम् ॥ ३८ ॥
अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम् ।
मैं अभी वरदानके घमंडमें भरे हुए इस दानवराज दितिकुमार हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये अवध्य बना हुआ है, इसके सहायक गणोंसहित मार डालता हूँ ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् विसृज्य त्रिदिवौकसः ॥ ३९ ॥
वधं संकल्पयित्वा तु हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।
सोऽचिरेणैव कालेन हिमवत्पार्श्वमागतः ॥ ४० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने देवताओंको तो विदा कर दिया और स्वयं हिरण्यकशिपुके वधका संकल्प लेकर वे थोड़े ही समयमें हिमालय पर्वतके पास आ गये ॥ ३९-४० ॥
किं नु रूपं समास्थाय निहन्म्येनं महासुरम् ।
यत् सिद्धिकरमाशु स्याद् वधाय विबुधद्विषः ॥ ४१ ॥
वहाँ आकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस महान् असुरका वध करूँ, जो इस देवद्रोहीके वधके लिये सिद्धि-सफलता प्रदान करनेवाला हो ॥ ४१ ॥
अनुत्पन्नं ततश्चक्रे सोऽत्यन्तं रूपमास्थितः ।
नारसिंहमनाधृष्यं दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उन्होंने जो पहले कभी उत्पन्न नहीं हुआ था ऐसा अत्यन्त विशाल नरसिंहरूप धारण किया। वह रूप दैत्य, दानव और राक्षसोंके लिये अजेय था ॥ ४२ ॥
सहायं तु महाबाहुर्जग्राहोङ्कारमेव च ।
अथोङ्कारसहायोऽसौ भगवान् विष्णुरव्ययः ॥ ४३ ॥
हिरण्यकशिपोः स्थानं जगाम प्रभुरीश्वरः ।
तेजसा भास्कराकारः कान्त्या चन्द्र इवापरः ॥ ४४ ॥
इसके बाद महाबाहु श्रीहरिने ओंकारको अपना सहायक बनाकर साथ ले लिया। ओंकारकी सहायतासे सम्पन्न हुए वे सर्वसमर्थ अविनाशी परमेश्वर भगवान् विष्णु हिरण्यकशिपुके स्थानपर गये, वे तेजसे सूर्यके समान और कान्तिसे दूसरे चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥ ४३-४४ ॥
नरस्य कृत्यार्धतनुं सिंहस्यार्धतनुं विभुः ।
नारसिंहेन वपुषा पाणिं संस्पृश्य पाणिना ॥ ४५ ॥
ततोऽपश्यत विस्तीर्णां दिव्यां रम्यां मनोरमाम् ।
सर्वकामयुतां शुभ्रां हिरण्यकशिपोः सभाम् ॥ ४६ ॥