भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 885

भविष्यपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः [ ८६१


हिरण्यकशिपु बोला—भगवन् ! देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य तथा पिशाच—ये कोई भी मुझे किसी तरह मार न सकें ॥ १२ ॥
ऋषयो नैव मां क्रुद्धाः सर्वलोकपितामह ।
शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ॥ १३ ॥
सर्वलोकपितामह ! तपस्वी ऋषि कुपित होकर मुझे कभी शाप न दें, यही वर मैंने माँगा है ॥ १३ ॥
न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च ।
न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न चान्येन मे वधः ॥ १४ ॥
न अस्त्रसे न शस्त्रसे, न पर्वतसे न वृक्षसे, न सूखेसे न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो ॥ १४ ॥
न स्वर्गेऽप्यथ पाताले नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यह्नोर्न चाप्यन्येन मे वधः ॥ १५ ॥
न स्वर्गमें न पातालमें, न आकाशमें न भूमिपर, न रातमें न दिनमें और न किसी दूसरे निमित्तसे मेरा वध हो ॥
पाणिप्रहारेणैकेन सभृत्यबलवाहनम् ।
यो मां नाशयितुं शक्तः स मे मृत्युर्भविष्यति ॥ १६ ॥
जो भृत्यों, सेनाओं और वाहनोंसहित मुझे एक ही थप्पड़से मारकर नष्ट कर देनेकी शक्ति रखता हो, वही मेरे लिये मृत्युरूप हो ॥ १६ ॥
भवेयमहमेवार्कः सोमो वायुर्हुताशनः ।
सलिलं चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश ॥ १७ ॥
मैं ही सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, नक्षत्र और दसों दिशाएँ हो जाऊँ ॥ १७ ॥
अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः ।
धनदश्च धनाध्यक्षो यक्षः किंपुरुषाधिपः ॥ १८ ॥
मैं ही काम, क्रोध, वरुण, यम, इन्द्र, धनाध्यक्ष कुबेर, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी हो जाऊँ ॥ १८ ॥
मूर्तिमन्ति च दिव्यानि ममास्त्राणि महाहवे ।
उपतिष्ठन्तु देवेश सर्वलोकपितामह ॥ १९ ॥
सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ! देवेश्वर ! महासमरमें दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् होकर मेरे पास स्वयं आ जायें ॥ १९ ॥

पितामह उवाच
एते दिव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुताः ।
सर्वकामप्रदा वत्स दुर्लभास्त्वतिमानुषाः ।
सर्वान् कामानल्पभावात् प्राप्स्यसि त्वं न संशयः॥२०॥
ब्रह्माजीने कहा—तात ! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुमको दे दिये। वत्स ! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले ये दुर्लभ वर मानव-लोकके लिये अलभ्य हैं (किंतु तुम्हें तपोबलसे प्राप्त हो गये)। थोड़ी-सी इच्छा होते ही तुम सब कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय हीं है ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवाञ्जगामाकाशमेव च ।
वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा आकाशमें ही उस वैराज नामक ब्रह्मधामको चले गये, जो ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित है ॥ २१ ॥
ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा मुनिभिः सह ।
वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः ॥ २२ ॥
हिरण्यकशिपुको वरदान मिलनेका समाचार सुनते ही देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २२ ॥

देवा ऊचुः
वरेनानेन भगवन् वधिष्यति स नोऽसुरः ।
तत्प्रसीदस्व भगवन् वधोऽप्यस्य विचिन्त्यताम्॥ २३ ॥
भवान् हि सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्ध्रुवः ॥ २४ ॥
देवता बोले—भगवन् ! इस वरके प्रभावसे उन्मत्त हुआ असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः हमारे ऊपर प्रसन्न होइये और उसके वधका भी कोई उपाय सोचिये; क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिकर्ता, स्वयं प्रभावशाली, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं ॥ २३-२४ ॥

वैशम्पायन उवाच
सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः ।
आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्वचनाम्बुभिः ॥ २५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! देवताओंका वह लोकहितकारी वचन सुनकर भगवान् प्रजापतिने अपने सुशीतल अमृतवचनोंद्वारा उन सब देवताओंको आश्वासन देते हुए कहा—॥ २५ ॥
अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् ।
तपसोऽन्तेऽस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ॥ २६ ॥
'देवताओ ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब साक्षात् भगवान् विष्णु इस दैत्यका वध करेंगे' ॥ २६ ॥
एतच्छ्रुत्वा सुराः सर्वे वाक्यं पङ्कजन्मनः ।
खानि स्थानानि दिव्यानि प्रतिजग्मुर्मुदान्विताः ॥ २७ ॥
भगवान् नारायणके नाभिकमलसे जन्म-ग्रहण करनेवाले ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर समस्त देवता प्रसन्न हो अपने-अपने दिव्य स्थानोंको लौट गये ॥ २७ ॥
लब्धमात्रे वरे तस्मिन् सर्वाः सोऽबाधत प्रजाः ।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वरदानेन दर्पितः ॥ २८ ॥
उस वरके प्राप्त होते ही दैत्य हिरण्यकशिपु सारी प्रजाको सताने लगा। ब्रह्माजीके वरदानसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया ॥ २८ ॥