विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 889, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ८६५
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् नरसिंहका देवता, गन्धर्व, अप्सराओं तथा दैत्योंसे सेवित हिरण्यकशिपुको देखना
वैशम्पायन उवाच
तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुः प्रभुः।
आसीन आसने दिव्ये नल्वमात्रे प्रमाणतः॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस सभामें प्रभावशाली दैत्यराज हिरण्यकशिपु चार हाथ लंबे एक दिव्य सिंहासनपर बैठा हुआ था ॥ १ ॥
दिवाकरनिभे रम्ये दिव्यास्तरणसंवृते ।
रराज सुचिरं राजन् ज्वलत्काञ्चनकुण्डलः ॥ २ ॥
राजन् ! वह सिंहासन सूर्यके समान प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण, रमणीय तथा दिव्य बिछौनोंसे ढका हुआ था। उसपर देरसे बैठा हुआ हिरण्यकशिपु बड़ी शोभा पा रहा था। उसके कानोंमें सोनेके कुण्डल अपनी दिव्य दीप्तिसे दमक रहे थे ॥ २ ॥
तस्य दैत्यपतेर्मन्दं विरजस्कं समन्ततः ।
दिव्यगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥ ३ ॥
दिव्य सुगन्धका भार वहन करनेवाली वायु वहाँ सब ओरसे उस दैत्यराजके सम्मुख आकर मन्द गतिसे बहती थी। उसमें तनिक भी धूलका कण नहीं रहता था ॥ ३ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः।
दिव्यतालेन दिव्यानि जगुर्गीतानि गायनाः ॥ ४ ॥
वहाँ देवता तथा अप्सराओंसे घिरे हुए गन्धर्व गायक बनकर दिव्य तालके साथ दिव्य गीत गाते थे ॥ ४ ॥
विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता।
दिव्या च सौरभेयी च समीची पुञ्जिकस्थला ॥ ५ ॥
मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता ।
चारुनेत्रा घृताची च मेनका चोर्वशी तथा ॥ ६ ॥
एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः ।
उपतिष्ठन्ति राजानं हिरण्यकशिपुं तदा ॥ ७ ॥
विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, दिव्या, सौरभेयी, समीची, पुञ्जिकस्थला, मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका और उर्वशी—ये तथा अन्य सहस्रों अप्सराएँ, जो नृत्य-गीतमें कुशल थीं, उस समय राजा हिरण्यकशिपुकी सेवामें उपस्थित होती थीं ॥ ५-७ ॥
हिरण्यकशिपुस्तत्र विचित्राभरणाम्बरः ।
स्त्रीसहस्रैः परिवृतस्तस्थौ ज्वलितकुण्डलः ॥ ८ ॥
उस सभामें विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और जगमगाते हुए कुण्डलोंसे अलंकृत हिरण्यकशिपु सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बैठा था ॥ ८ ॥
तत्रासीनं महाबाहुं हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ।
उपासन्ति दितेः पुत्राः सर्वे लब्धवराः पुरा ॥ ९ ॥
वहाँ बैठे हुए प्रभावशाली महाबाहु हिरण्यकशिपुकी सेवामें वे सारे दैत्य उपस्थित होते थे, जो पहले वर प्राप्त कर चुके थे ॥ ९ ॥
बलिर्वैरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीजयः ।
प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च गविष्ठश्च महासुरः ॥ १० ॥
चन्द्रहन्ता क्रोधहन्ता सुमनाः सुमतिः खरः ।
घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा ॥ ११ ॥
विश्वरूपश्च रूपश्च विरूपश्च महाद्युतिः ।
दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा महारवः ॥ १२ ॥
कटाभो विकटाभ्रश्च संह्रादश्चेन्द्रतापनः ।
दैत्यदानवसंघाश्च सर्वे ज्वलितकुण्डलाः ॥ १३ ॥
स्रग्विणो वाग्मिनः सर्वे सर्वे सुचरितव्रताः ।
सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ॥ १४ ॥
एते चान्ये च बहवो हिरण्यकशिपुं प्रभुम् ।
उपासन्ते महात्मानं सर्वे दिव्यपरिच्छदाः ॥ १५ ॥
विरोचनकुमार बलि, पृथिवीविजयी नरक, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, महान् असुर गविष्ठ, चन्द्रहन्ता, क्रोधहन्ता, सुमना, सुमति, खर, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, रूप, महातेजस्वी विरूप, दशग्रीव, वाली, मेघवासा, महारव, कटाभ, विकटाभ्र, संह्राद तथा इन्द्रतापन आदि दैत्यों और दानवोंके समस्त समुदाय, जो प्रज्वलित कान्तिवाले कुण्डलोंसे अलंकृत, पुष्पमालाधारी तथा कुशल वक्ता थे और जो सब-के-सब भलीभाँति ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन कर चुके थे, वरदान पाये हुए थे, शूरवीर थे और मृत्युके भयका निवारण कर चुके थे; ये तथा दूसरे भी बहुत-से दैत्य घोर दिव्य उपकरणोंसे युक्त हो प्रभावशाली महामना हिरण्यकशिपुकी उपासना करते थे ॥ १०-१५ ॥
विमानैर्विविधैरग्र्यैर्भ्राजमानैरिवार्चिभिः ।
स्रग्विणो भूषणधरा यान्ति चायान्ति हेलया ॥ १६ ॥
ये नाना प्रकारके श्रेष्ठ तथा किरणोंसे प्रकाशित विमानोंद्वारा लीलापूर्वक आते-जाते थे, पुष्पहार और आभूषण धारणकर सुशोभित होते थे ॥ १६ ॥
विचित्राभरणोपेता विचित्रवसनास्तथा ।
विचित्रशस्त्रकवचा विचित्रध्वजवाहनाः ॥ १७ ॥
वे विचित्र आभूषण और विचित्र वस्त्र धारण करते थे और विचित्र शस्त्र, कवच, ध्वज और वाहनोंका उपयोग करते थे ॥ १७ ॥
महेन्द्रचापसंकाशैर्विचित्रैरङ्गदैर्वरैः ।
भूषिताङ्गा दितेः पुत्रास्तमुपासन्ति नित्यशः ॥ १८ ॥
इन्द्र-धनुषके समान विचित्र रंगवाले श्रेष्ठ अंगदोंसे
म० ह० २८