विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 890, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८६६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अपनी भुजाओंको विभूषित करके आये हुए दैत्य प्रतिदिन हिरण्यकशिपुकी उपासना करते थे ॥ १८ ॥
तस्यां सभायां दिव्यायामसुरराः पर्वतोपमाः ।
हिरण्यमुकुटाः सर्वे दिवाकरसमप्रभाः ॥ १९ ॥
उस दिव्य सभामें बैठे हुए वे सभी पर्वताकार असुर मस्तकपर सोनेके मुकुट धारण किये सूर्यके समान प्रकाशित होते थे ॥ १९ ॥
कनकमणिविचित्रवेदिकाया-
मुपहितरत्नसहस्रवीथिकायाम् ।
स ददर्श मृगाधिपः सभायां
सुरुचिरदन्तगवाक्षसंवृतायाम् ॥ २० ॥
कनकविमलहारभूषिताङ्गं
दितितनयं स मृगाधिपो ददर्श।
दिनकरकरप्रभं ज्वलन्त-
मसुरसहस्रगणैर्निषेव्यमाणम् ॥ २१ ॥
जहाँ सोने और मणियोंकी विचित्र वेदिकाएँ बनी थीं, जिसकी गली-गलोंमें सहस्रों रत्न संचित थे तथा जो रुचिर हाथीदाँतके बने झरोखोंसे आवृत्त थी, उस सभामें मृगराज भगवान् नरसिंहने दितिनन्दन हिरण्यकशिपुको देखा। उसका अङ्ग सोनेके निर्मल हारोंसे विभूषित था। उसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्भासित होती थी, जिससे वह प्रज्वलित-सा जान पड़ता था और सहस्रों असुरोंके गण उसकी सेवामें लगे हुए थे ॥ २०-२१ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि नारसिंहे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें नरसिंहावतारके प्रसङ्गमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
प्रह्लादको नरसिंह-विग्रहमें समस्त त्रिलोकीका दर्शन
वैशम्पायन उवाच
ततो दृष्ट्वा महाबाहुं कालचक्रमिवागतम् ।
नारसिंहवपुश्छन्नं भस्माच्छन्नमिवानलम् ॥ १ ॥
विकुञ्चितसटं तस्य नारसिंहस्य भारत ।
रूपौदार्यं बभौ तत्र सहस्रशशिसंनिभम् ॥ २ ॥
अहो रूपमिदं चित्रं शङ्खकुन्देन्दुसंनिभम् ।
अब्रुवन् दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर राखसे ढकी हुई आगकी भाँति नरसिंह-शरीरमें छिपे हुए महाबाहु भगवान् विष्णुको वहाँ कालचक्रके समान आया देख समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आपसमें कहने लगे—'अहो ! यह शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके समान विचित्र रूप दिखायी दे रहा है !' भारत ! भगवान् नरसिंहके मुख और गर्दनके बाल घुँघराले थे। उनका रूप-सौन्दर्य सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित होता था ॥ १-३ ॥
एवं हि ब्रुवतां तेषां निर्दग्धानां महात्मनाम् ।
नारसिंहेन चक्षुर्भ्यां चोदिताः कालधर्मणा ॥ ४ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो नाम वीर्यवान् ।
दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम् ॥ ५ ॥
भगवान् नरसिंहारूपी मृत्युसे प्रेरित और उनकी नेत्राग्निसे दग्ध होते हुए वे विशालकाय दानव जब आपसमे उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उस समय हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लाद नामक पराक्रमी दैत्यने वहाँ पधारे हुए नरसिंह भगवान्को दिव्य दृष्टिसे देखा ॥ ४-५ ॥
तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमास्थितम् ।
विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ॥ ६ ॥
सोनेके पर्वतकी भाँति अपूर्व शरीर धारण किये भगवान्को देखकर समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आश्चर्यचकित हो रहे थे ॥ ६ ॥
प्रह्लाद उवाच
महाराज महाबाहो दैत्यानामादिसम्भव ।
न श्रुतं नैव दृष्टं च नारसिंहमिदं वपुः ॥ ७ ॥
उस समय प्रह्लादजी बोले—महाराज ! महाबाहो ! दैत्योंके आदिसम्भव (पूर्वपुरुष) ! मैंने ऐसा नरसिंह रूप न तो कभी देखा है और न सुना ही है ॥ ७ ॥
अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमद्भुतम् ।
दैत्यान्तकरणं घोरं शंसन्तीव मनांसि नः ॥ ८ ॥
जिसकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है, ऐसा यह दिव्य अद्भुत रूप क्या है ? हमारा मन तो ऐसा कहता है कि यह कोई दैत्योंका विनाश करनेवाला भयङ्कर भूत है ॥ ८ ॥
अस्य देवाः शरीरेऽस्याः सागरा सरितस्तथा ।
हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ॥ ९ ॥
इसके शरीरमें समस्त देवता, समुद्र तथा सरिताएँ दिखायी देती हैं, हिमवान्, पारियात्र तथा अन्य जो कुल-पर्वत हैं, वे भी यहाँ दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ९ ॥
चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्याश्चाश्विनौ तथा ।
धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः ॥ १० ॥
मरुतो देवगन्धर्वा मुनयश्च तपोधनाः ।
नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥ ११ ॥
ब्रह्मदेवः पशुपतिर्ललाटस्था विभान्ति वै ।
नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा, आदित्य, अश्विनीकुमार, कुबेर, वरुण, यम, शचीपति इन्द्र, मरुद्गण, देवता, गन्धर्व, तपो-