हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 506 में से
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की कुल देवता, काम को फिर से जीवित कर देने वाली संजीवन बूटी, प्रेम के समुद्र की तटी, यौवन रूपी चन्द्रोदय की चाँदनी, रति रस के अमृत की महानदी, सुरत वृक्ष की पुष्पोद्गति, वैदग्ध्य की बाल विद्या, कान्ति की कौमुदी, धैर्य की धृति, गौरव की बड़ी शाला, विनय की बीजभूमि, गुणों की गोष्ठी, महानुभावता की मनस्विता और जवानी की तृप्ति थी। उसके साथ एक बड़े अश्व पर बैठी हुई उसकी ताम्बूलकरंकवाहिनी आ रही थी जिसके अंग-अंग मानों फूल से बने थे, क्योंकि कुवलय की माला-सी बड़ी-बड़ी आँखें, पाटल पुष्प-सा अधर, कुन्द की कलियों जैसे दाँत, शिरीषमाला जैसी सुकुमार दोनों भुजाएँ, कमल जैसे हाथ, मौलसिरी की गन्ध जैसी सरस और चम्पा के समान दमकती देह थी। सरस्वती ने दधीच के प्रेम से मालती को दूर से ही मानों मनोरथ द्वारा लूट लिया, कुतू- हल से खींच लिया, मन की तरङ्गों से अगवानी की, उत्कण्ठा से आलिङ्गन किया, हृदय के भीतर रख लिया, आनन्द के आँसू से नहला दिया, स्मित के चन्दन से चर्चित किया, उच्छ्वसितों द्वारा पंखे झलने लगी, आँखों से ढँक दिया, मुख के कमल से पूजा की और आशा से उसे अपनी सखी बना लिया। तब मालती आई और आकर दूर ही से झुककर प्रणाम किया। दोनों से वह अँकवार कर मिली और तब विनयपूर्वक बैठी। सरस्वती ने भी मालती से जब विनयपूर्वक सम्भाषण किया तो उसने अपने आप को धन्यभाग समझा। मालती ने दधीच के सन्देश रूप में 'सिर से हाथ टेककर प्रणाम' को कहा। सावित्री और सरस्वती के मन को उसने अपने अग्राम्य आकार और अतिमधुर बातचीत से हर लिया।
क्रमेण चातीते मध्यन्दिनसमये शोणमवतीर्णायां सावित्र्यां स्नातुमु- त्सारितपरिजना साकूतेव मालती कुसुमशयस्तरशायिनीं समुपसृत्य सर- स्वतीमाबभाषे—'देवि, विज्ञाप्यं नः किंचिदस्ति रहसि। यतो मुहूर्त- मवधानदानेन प्रसादं क्रियमाणमिच्छामि' इति। सरस्वती तु दधीचसं- देशाशङ्किनी किं वक्ष्यतीति स्तननिहितवामकरनखरकिरणदन्तुरितमुद्भि- द्यमानकुतूहलाङ्कुरनिकरमिव हृदयमुत्तरीयदुकूलवल्कलैकदेशेन संच्छादयन्ती, गलतावतंसपल्लवेन श्रोतुं श्रवणेनेव कुतूहलाद्भावमानेनाविरतश्वाससंदोह- दोलायितां जीविताशामिव समासन्तरुणतरुलतामवलम्बमाना, समुत्फु- ल्लस्य मुखशशिनो लावण्यप्रवाहेण शृङ्गाररसेनेवाप्लावयन्ती सकलं जीव- लोकम्, शयनकुसुमपरिमललग्नैर्मधुकरकदम्बकैर्मदनाननलदाहश्यामलै- र्मनोरथैरिव निर्गत्य मूर्त्तैरुत्तप्यमाना, कुसुमशयनीयात्समरशरसंञ्चरिणी, मन्दं मन्दमुदगात्। 'उपांशु कथय' इति कपोलतलप्रतिबिम्बितां लज्जया कर्णमूलमिव मालतीं प्रवेशयन्ती मधुरया गिरा सुधीरमुवाच—'सखि