भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 506 में से

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पृष्ठ 99

५४ हर्षचरितम् विशाल सिंह पर आरूढ़ गौरी की भाँति लग रही थी। लीला से उसने अपने चरण रकाब पर रखे थे; जब पैर के नूपुर बजते तो उसका घोड़ा कान खड़े करके गर्दन टेढ़ी किए सुनता। आलते से उसके पैर रञ्जित थे। तलवे में कुंकुम लगा हुआ था। उसके पैरों की टहाका लाल कान्ति दोनों ओर फैल रही थी, मानों वह ताड़न की अभिलाषा से रक्ता- शोक के हरे-भरे वनों को खींचती आ रही थी। उसके कटि प्रदेश में करधनी बज रही थी, मानों वह जीवलोक के सारे लोगों के मन को हठपूर्वक हरने के लिए घोषणा कर रही हो। उसका सारा शरीर धुले सफेद रेशम के पैरों तक लटकते हुए झीने, साँप की केंचुल की तरह हल्के और बारीक कंचुक से ढँका हुआ था। झीने कंचुक के भीतर चन्दन के सूख जाने से उसके उज्ज्वल अंग दिखाई पड़ रहे थे जैसे सरसी के निर्मल जल के भीतर मृणाल की डंठल झलकती दिखाई देती है। झीने कंचुक के नीचे कुसुंभी रंग का लाल लहँगा झलक रहा था जिस पर रंग-बिरंगी बुंदकियाँ पड़ी हुई थीं, मानों स्फटिक की जड़ाव में मोतियाँ जड़ी हों। आँवले-जैसे बड़े बड़े मोतियों का हार गले में लटक रहा था, वह तारों भरे शरत्काल के आकाश जैसी लग रही थी जिसमें कहीं कहीं सफेद मेघ के टुकड़े घिरे रहते हैं। उसके स्तन रूपी कलश पर रत्नों की प्रालम्ब माला लटक रही थी, मानों किसी पुण्यवान् के हृदय में प्रवेश करने के स्वागत में मङ्गलार्थ घट में वनमाला बँधी हो। उसके एक हाथ की कलाई में सोने का कड़ा था जिसके ग्राहमुखी सिरों पर पन्ने जड़े हुए थे, उनकी हरित किरणें दिशाओं में फैल रही थीं, मानों स्थल-कमलिनियाँ उसे लक्ष्मी समझ कर पीछे लग गई थीं। उसके अधर पर पान चबाने से काली रेखा पड़ गई थी, मानों उसका मुखचन्द्र पिए हुए संध्याराग के सहित अन्धकार को उगल रहा हो। भौंरे उसके नेत्रों को खिले हुए कुवलय समझ कर छा रहे थे मानों उसका मुख नीले अंशुक की नकाब से ढँका हुआ था। उसके बायें कान का दन्तपत्र नीली राग द्वारा रँग कर नीला कर दिया गया था, उसका वर्ण मयूर की गर्दन की तरह था। मानों विस्तृत नीले मेघ में बिजली के समान मालती शोभ रही थी। मौलसिरी के फल जैसे लम्बोतरे तीन मोती वाली उसके कानों में एक एक बाली थी, जो नीचे लटक कर अपने आलोक के जल से भुज रूपी लता को सींच रही थी। उसके दाहिने कान पर केतकी का नुकीला टौंसा लगा हुआ था, मानों उसके लावण्य का लोभी चन्द्र अपनी जीभ से उसके कपोल को चाट रहा था। माथे पर कस्तूरी का तिलकबिन्दु तमाल की भाँति श्याम था। कामदेव का सर्वस्व होने के कारण उसके मुँह पर तिलक रूप में जैसे राजकीय मोहर लगी थी। ललाट पर सामने माँग से लटकती हुई चट्टला तिलक नामक मणि ऊपर उठती हुई किरणों के रूप में मानों उसके सिर पर लाल अंशुक की पगड़ी बँधी थी। उसके बालों का जूड़ा पीठ पर ठीक से न बाँधने के कारण ढीला होकर लटक रहा था। नीले कमल के समान चूड़ामणि मकरिका उसके सामने केशों में लगी हुई थी। वह कामदेव की पताका, चन्द्रमा