हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ५७ वश्या । व्यावृणु प्रकटय । वरवर्णिनि वरारोहे । लोलुपतां साभिलाषत्वम् । 'चलार्थको निगद्येते पारिप्लवपरिप्लवौ' । बालिशोऽज्ञः । चारणता धूर्तता । असा- धारगानन्यसदृशी । देवी देवेनेति च परस्परसमगुणयोगित्वमभिव्यनक्ति । गुर्वा- रीयान्, उपदेष्टा वा । तद्वशवर्तित्वात् । यश्च देवस्तस्य गुरुराचार्यः कश्चिदवश्यं सम्भवति । जीवितस्येश्वरः स्वामी जीवितेशः । शिशिरतया मदनदाहप्रशमनहे- तुत्वात् । अमृतमयत्वेन च जीवितसन्धारणशक्तत्वात् । अथ च जीवितेशो मृत्युः । चन्द्रादयो ह्यापातत एव तापं शमयन्ति, अनवरतं सेव्यमानाः पुनः कामोद्दीप- कत्वेन मृत्युं दिशन्ति । राजपक्षे जीवितेशः कश्चित्पुरोहितप्रायः । उच्छ्वसनमुच्छ्वा- सस्तत्र हेतुः । अथ च श्वासोत्क्रान्तौ कारणम्, इतरत्र सचिवप्राया विश्वसनीयाः । आधयश्चित्तपीडाः । अत एवान्तरङ्गमन्तःशरीरं यानि स्थानानि तेषु, इतरत्रान्त- रङ्गान्तर्वशिकास्तत्स्थानेषु विश्वसनीयजनाधिकारेषु । परं प्रकृष्टम् । असुहरोऽमित्रो वा । अभ्यन्त्र-परमसुहृन्मित्रं च । आप्तः प्राप्तो बान्धवप्रायः कश्चित् । सर्वगताश्चारा अपि संस्थाख्याः । विग्रहो विरोधः, देहश्च । मृत्युरिति । त्वदनङ्गीकारेण निश्चितं म्रियते । राज्ञोऽपि पार्श्वे मृत्युस्तिष्ठत्येव । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अत एव संचारक एकत्र नरे सम्भवदितरत्र संचारयति, चरितं वस्तु यः प्रापयते सः । द्विविधा हि चाराः-संस्थाः, संचारकाश्च । वृद्धा महान्तः, स्थविराश्च । अनुरूप इत्यादिनेदमिदं तन्नास्तीति वक्रोक्त्या सातिशयं मालती वैदग्ध्येनाह । प्रक्रम आरम्भः । निपुणोपलेपो बुद्धिमत्प्रक्रमः । धूर्तालापः प्रतारणावचनम् । याग्नि इति । भव्येयेवेत्यर्थात् । बातचीत में दिन चढ़ गया । तब सावित्री उधर शोण में स्नान करने उतरी । इधर मौका पाकर मालती परिजनों को वहाँ से अलग करके फूल के बिस्तर पर लेटी हुई सरस्वती के पास आकर बोली-'देवि, एकान्त में कुछ मुझे आपको सूचित करना है, इसलिए चाहती हूँ कि क्षणभर आप प्रसन्नता से ध्यान देकर सुनें ।' दधीच के संदेश की आशंका से 'न मालूम क्या कहेगी' सरस्वती यह सोचने लगी । छाती पर रखे हुए उसके बायें हाथ के नख की किरणें ऐसी लग रही थीं मानों कुतूहल का अंकुर हृदय से निकल रहा हो । वह ऐसे हृदय को दुकूल वल्कल के अँचरे के खूँट से ढँक रही थी । कान में लगा हुआ पल्लव गिरने लगा, मानों उसका कान ही सुनने के कुतूहल से दौड़ पड़ा हो । निरन्तर साँस के झूले पर बैठी हुई जीविताशा को समीप के तरुण वृक्ष पर मानों अवलम्बित करने के लिए सहारा ले रही थी । खिलखिलाए हुए मुखचन्द्र के लावण्य की धारा से श्रृंगार रस के रूप में प्रवाहित करके मानों समस्त जीवलोक को भरने लगी । शय्या के फूल के रस पीने में लगे हुए, मदनाग्नि से जले उसके मनोरथ के रूप में श्यामवर्ण वाले भौरों ने उसे झटका दिया और कामज्वर से पीड़ित वह अपने