हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[५८] हर्षचरितम्
पुष्पशयन से धीरे धीरे उठो। 'धीरे बोल' यह कहती हुई सरस्वती अपने कपोल पर प्रतिबिम्बित मालती को लज्जा से मानों अपने कानों में पहुँचाती हुई मधुर आवाज से धीरतापूर्वक बोली—'सखी मालती, कैसी बात कर रही है ? मैं क्या अवधान देकर सुनूँ ? शरीर और प्राण पर भी मेरा वश नहीं। प्रार्थना के बिना ही प्रियजन का प्रभुत्व सब पर व्याप्त हो रहा है। तू तो मेरी सब कुछ है, बहन तू, सखी तू, प्रणयिनी तू, और प्राणसमा भी तू। छोटे-बड़े किसी योग्य काम के लिए इस शरीर को नियुक्त कर। मेरा हृदय तेरे प्रति निर्मल और बात पर अटल रहने वाला है। तू प्रेम से मुझे अनुकूल और अपने वश में कर ले। री मालती, कह, क्या कहना चाहती है ?' वह बोली— 'देवि, तू जानती ही है कि विषय मधुर लगते हैं, इन्द्रियाँ लोलुप होती हैं, नई जवानी मतवाली होती है, मन चञ्चल रहता है। काम को रोकना कठिन है यह बात प्रसिद्ध ही है। तो मुझे तू उपालम्भ न देना। मेरी इस वाचालता का कारण मूर्खता, चपलता या धूर्तता नहीं है। स्वामी की भक्ति क्या नहीं कराती ? जब से तुम्हें उन्होंने देखा है तभी से कामदेव उनका आचार्य बन बैठा है, चन्द्रमा उनके प्राणों का अधिपति हो गया, मलयामिल उनके उच्छ्वास का कारण बन गया, मन की व्यथाएँ अन्तरंग बन गईं, सन्ताप परममित्र बन गया, जागरण आत्मीय हो गया, मनोरथ अव्यवस्थित हो गए, निश्वास विरह के आगे चलने लगे, मृत्यु पार्श्वचर हो गई, मानसिक दुःख ही सचारक बने, संकल्प ही बुद्धि के उपदेशक वृद्ध बने। और क्या कहूँ ? अगर कहती हूँ 'देव दधीच सुयोग्य हैं, तो अपने सम्मान की बात होती है; 'वे सुशील हैं' तो बात प्रसंग के विरुद्ध होती है; 'धीर हैं' यह बात मदनावस्था से विपरीत है, 'सुभग हैं' यह तो तुम कह सकती हो; 'उनकी प्रीति स्थिर है' यह चतुरता की बात होती है; 'सेवा करना वे जानते हैं' यह कहना स्वामी के लिए उचित नहीं; 'मरने तक तुम्हारी दासता चाहते हैं' यह प्रलोभन हुआ; 'धन्यभाग नारी ही ऐसे पति को प्राप्त करती है' यह स्वामी के प्रति मेरा पक्षपात करना है; 'तू उसकी मृत्यु है' यह बात अप्रिय होती है; 'तू गुणों को नहीं समझती' यह निन्दा की बात होती है; 'स्वप्न में भी तुमने इस पर बहुत बार प्रसन्नता की' इस बात में कोई साक्षी नहीं; 'अपने प्राणों की भीख माँगता है' यह कातरता है; 'वहाँ जाओ' यह आज्ञा होती है; 'रोकने पर भी हठपूर्वक आता है' यह अनादर की बात है। इस प्रकार तुमसे मैं कुछ नहीं कह पातीं। बस मुझे यही कहना है।' यह कहकर मालती चुप हो गई। अथ सरस्वती प्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा प्रत्यवादीत्—'अयि, न शक्नोमि बहु भाषितुम् । एषास्मि ते स्मितवादिनि वचसि स्थिता । गृह्य- न्ताममी प्राणाः' इति। मालती तु 'देवि, यदाज्ञापयसि, अतिप्रसादाय' इति व्याहृत्य प्रहर्षपरवशा प्रणम्य प्रजविना तुरगेण ततार शोणम्।