भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६२ हर्षचरितम् दधीचोऽपि हृदये ह्रादिन्येवाभिहतो भार्गववंशसंभूतस्य भ्रातुर्ब्राह्मणस्य जायामक्षमालाभिधानां मुनिकन्यकामात्मसूनोः संवर्धनाय नियुज्य विर- हातुरस्तपसे वनमगात् । यस्मिन्नेवावसरे सरस्वत्यसूत तनयं तस्मिन्ने- वाक्षमालापि सुतं प्रसूतवती । तौ तु सा निर्विशेषं सामान्यस्तन्यादिना शनैः शनैः शिशू समवर्धयत् । एकस्तयोः सारस्वताख्य एवाभवत् , अपरोऽपि वत्सनामासीत् । आसीच्च तयोः सोदर्ययोरिव स्पृहणीया प्रीतिः । अनेहसा कालेन । रहस्यं ज्ञानभागः । ह्रादिनी वज्रम् । तत्पश्चात् दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया और समय से सब लक्षणों वाले सुन्दर पुत्र को उत्पन्न किया । जन्म लेते ही सरस्वती ने उसे वर दिया—'मेरे प्रभाव से इसमें सम्यक् प्रकार से रहस्यों के साथ वेद, समस्त शास्त्र, समस्त कलाएँ स्वयं आविर्भूत हों ।' उत्तम पति के गौरव से दिखाने के लिए हृदय में दधीच को रख कर ब्रह्मा जी के आदेश के अनुसार फिर सरस्वती सावित्री के साथ ब्रह्मलोक को चली गई । उसके चले जाने से दधीच के हृदय पर गहरा वज्रपात-सा हुआ । तब दधीच ने अपने पुत्र को पालने-पोसने के लिए भार्गववंश में उत्पन्न किसी ब्राह्मण भाई की पत्नी अक्षमाला नामक मुनिकन्या के पास रख दिया और स्वयं सरस्वती के विरह में आतुर होकर तपस्या करने के लिये वन में चले गए । जब सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था तभी अक्षमाला को भी एक पुत्र हुआ था । उन दोनों को एक भाव से दूध पिलाकर उसने पाला पौसा और बढ़ाया । उनमें से एक का नाम सारस्वत रखा गया और दूसरे का नाम वत्स । दोनों में भाई के समान प्रेम भाव स्पृहणीय रहा । अथ सारस्वतो मातुर्महिम्ना यौवनारम्भ एवाविर्भूताशेषविद्यासंभा- रस्तस्मिन्सवयसि भ्रातरि प्रेयसि प्राणसमे सुहृदि वत्से वाङ्मयं समस्त- मेव संचारयामास । चकार च कृतदारपरिग्रहस्यास्य तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रीत्या प्रीतिकूटनामानं निवासम् । आत्मनाप्याषाढी, कृष्णाजिनी, अक्ष- वलयी, वल्कली, मेखली, जटी च भूत्वा तपस्यतो जनयितुरेव जगा- मान्तिकम् । वाक्प्रस्तुता यत्र तद्वाङ्मयम् । 'आषाढसंज्ञो दण्डः स्यात्पालाशो व्रतचारिणाम् । वृक्षत्वङ्निर्मितं वस्त्रं वल्कलं समुदाहृतम् ॥' मेखला मुञ्जतृणादिरचितं कटिसूत्रम् । जटा रूक्षसंहतकेशाः । माता के प्रभाव से सारस्वत में यौवन के आरम्भ होते ही सारी विद्याएँ प्रकट हो गईं तो उसने प्राण के समान प्रिय अपने समवयस्क भाई और मित्र वत्स में भी समस्त