हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ६१ म्लान्ति श्रयन्ति यास्तमभ्यो लतास्तासामाहित उत्कम्पः कम्पनं येनेति । क्षुभ्यमाण इत्युद्दीपनकारणत्वात् । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । हस्तस्य कर्षणं समुचितम् । ग्रहपतिश्चन्द्रः । प्रेर्यमाण इति । अनिलस्योचितमेतत्कर्म । उह्यमान इति । जलस्यो- चितमेतत् । उत्कलिका रहुरुहिका, ऊर्मयश्च । रसोऽभिलाषः, जलं च । परिमल आमोदः । पटलं समूहः । प्रतिमा प्रतिच्छन्दकम् । यथा मन्मथ इति । मन्मथस्य प्रभवनशीलत्वेनाज्ञादानमुचितम् । एवं सर्वत्रोपदिशतीति । इत्थमित्थं वर्तस्वेत्यु- पदेशः । देवताविषयं सम्भोगशृङ्गारवर्णनममुचितमिति न तत्र विस्तरः प्रवर्तते । कुमारीत्वे च गान्धर्वविवाहो विस्तरेण न तथा वर्णितः शापनिर्वाहणमात्रपरत्वा- दिति । वृत्तस्यान्यथा निजभर्तृत्यागो दोषावहः किमर्थं कृत इत्यादिकाः कुविकल्पा उत्पद्येरन्निति । तब वसन्त के समान सुगन्धि से भरे हुए, हंस के समान मृणाल धारण किए हुए, मयूर के समान घन ( दृढ़ या मेघ में ) प्रीति करने वाले, मलयानल के समान सरस चन्दन के लेप से उज्ज्वल काँपते हुए शरीर वाले दधीच मालती के साथ आए। मानों चन्द्र उन्हें किरण रूपी हाथों से बाल पकड़ कर खींच लाया हो। काम को उद्दीत करने वाले दक्षिणानिल ने मानों उन्हें प्रेरित किया हो । अभिलाषाओं की तरंगों से भरा रतिरस मानों उन्हें ढो लाया हो । सुगन्ध पर लुझते हुए भौंरे उन पर छा रहे थे, मानों उनके अङ्ग नीले वस्त्र से ढँक रहे हों। उनके एक कपोल के भीतर चन्द्र प्रतिबिम्बित होकर चमक रहा था, मानों मतवाले मदन रूपी हाथी के कान का वह शङ्ख हो। या प्रथम मिलन के विलास स्वरूप स्मित से उनके कपोल के मध्यभाग की कान्ति और भी निखर गई थी। आकर उन्होंने हृदय में पहुंची हुई प्रिया के नूपुर की आवाज से मिली हुई हंस के समान गद्गद वाणी से बातचीत की। काम जो आज्ञा देता, यौवन जो उपदेश देता, अनुराग जो शिक्षा देता, विदग्धता जो समझाती, उसी प्रकार अपनी प्रियतमा के साथ वे बिहार करने लगे। जब पूरा विश्वास हो गया तब सरस्वती ने अपने आपको उनसे स्पष्ट कह दिया (कि मैं दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर मर्त्यलोक में आई हुई सरस्वती हूं)। दधीच ने सरस्वती के साथ-साथ रह कर एक वर्ष से अधिक समय को एक दिन के समान व्यतीत किया । अथ दैवयोगात्सरस्वती बभार गर्भम् । असूत चानेहसा सर्वलक्षणा- भिरामं तनयम् । तस्मै च जातमात्रायैव 'सम्यक्सरहस्याः सर्वे वेदाः सर्वाणि च शास्त्राणि सकलाश्च कला मत्प्रभावात्स्वयमाविर्भविष्यन्ति' इति वरमदात् । सद्भर्तृश्लाघया दर्शयितुमिव हृदयेनादाय दधीचं पिता- महादेशात्समं सावित्र्या पुनरपि ब्रह्मलोकमारुरोह । गतायां च तस्यां