भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

६० हर्षचरितम् जब भगवान् सूर्य अस्त हो गए, धीरे धीरे अन्धकार भी उतरने लगा और चन्द्रमा जैसे सिंह गुफा से निकलता है वैसे ही हँसती हुई उज्ज्वल पूर्व दिशा को छोड़ने लगा, तब सरस्वती पवित्र चीनांशुक के समान कोमल, और तरंगों के चिन्ह वाली मानों चादर से युक्त कोमल शय्या के सदृश सोन की रेत पर आकर बैठी और प्रतीक्षा करने लगी। वह ललाट का आभूषण धारण कर रही थी, मानों वह स्वप्न में प्रार्थना करने के लिए पैरों पर गिरने से दधीच के नखों की ज्योत्स्ना हो। उसके गालों के आइने में चन्द्रमा प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वह उसके कान के पास आकर काम का यह संदेश उसे सुना रहा था कि 'हे चारुहासिनी, देख, मैंने तेरे हृदय दयित दधीच को तेरे पास पहुंचा दिया।' हाथ के नखों की किरणें चारों ओर फैल रही थीं, मानों उसने चन्द्र की कलाओं को ही चंवर बना दिया हो, ऐसे हाथ को वह पसीने से तर अपने गालों पर झल रही थी वह अपने स्तनों पर किसी प्रकार बाल मृणालिकाओं को धारण किए थी। 'यहाँ दधीच के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रवेश न करे' इसलिए काम ने मानों अपनी वेत्रलता वहाँ छोड़ दी थी। उसने मन में सोचा-'सरस्वती होकर भी मैं जब इस काम द्वारा सब कुछ समझते हुए भी परवश कर दी गई, तो उन बेचारी अतिचपल स्वभाव वाली तरुण नारियों की क्या गणना ?' आजगाम च मधुमास इव सुरभिगन्धवाहः, हंस इव कृतमृणाल- धृतिः, शिखण्डीव घनप्रीत्युन्मुखः, मलयानल इवाहितसरसचन्दनधव- लतनुलतोत्कम्पः, कृष्यमाण इव कृतकचकचग्रहेण ग्रहपतिना, प्रेर्यमाण इव कंदर्पोद्दीपन्ददक्षेण दक्षिणानिलेन, उह्यमान इवोत्कलिकाबहुलेन रति- रसेन, परिमलसंपातिना मधुपपटलेन पटेनेव नीलेनाच्छादिताङ्गयष्टिः, अन्तःस्फुरता मन्मदनकरिकर्णशङ्खायमानेन प्रतिमेन्दुना प्रथमसमागम- विलासविलक्षस्मितेनेव धवलीक्रियमाणैककपोलोदरो मालतीद्वितीयो दधीचः। आगत्य च हृदयगतदयितानूपुररवविमिश्रयेव हंसगद्गदया गिरा कृतसंभाषणो यथा मन्मथः समाज्ञापयति, यथा यौवनमुपदिशति, यथा विदग्धताध्यापयति, यथानुरागः शिक्षयति, तथा तामभिरामां राममूर- मयत्। उपजातविश्रम्भा चात्मानमकथयदस्य सरस्वती। तेन तु सार्ध- मेकदिवसमिव संवत्सरमधिकमनयत्। आजगामेत्यादौ आजगामेति सम्बन्धः। सुरभिगन्धवाहो वातः सुरभिगन्धं च यो वहति। धृतिर्धारणम्, प्राणयात्रा च। घनः। सरसं सान्द्रं यच्चन्दनं तेन धवलया तनुलतयाहितश्च उत्कम्पः कामधर्म्मो यस्य। अन्यत्र-चन्दनांश्च धवांश्च