भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः ६५ भी मुनिवृत्ति रखने वाले असाधारण ब्राह्मण उत्पन्न हुए। श्रौत आचारों का उन्होंने आश्रय लिया था। झूठ और छल-छद्म को पास न आने देते थे। कुक्कुट के अंडे की मात्रा के अनुसार भोजन करते थे। उनमें बैडाली वृत्ति (अर्थात् हिंसा की भावना) न थी। उन्होंने समाज के व्यवहार या पंक्ति भोजन को छोड़ रखा था। कपट, कुटिलता और शेखी बघारने की आदत उनमें न थी। पापों से वे बचते थे। शठता को दूर करके अपने स्वभाव को प्रसन्न रखते थे। उनमें किसी तरह का विकार न था। दूसरे की निन्दा करने में उनकी चित्तवृत्ति पराङ्मुख रहती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीनों वर्णों से अलग स्वयंपाकी होकर विशुद्ध भोजन करते थे। उनमें धीरता थी, अतः किसी से याचना नहीं करते थे। स्वभाव के मृदु और प्रणयिजनों में अनुकूल थे। अपने दर्शन के अतिरिक्त अन्य दर्शनों में भी जो शंकाएँ उठाई जाती थीं उनका समाधान भी वे करते थे। समस्त ग्रन्थों में जो अर्थ की ग्रन्थियाँ थीं उनको उद्घाटित करते थे। वे कवि, वाग्मी, सरस भाषण में प्रीति रखने वाले, विदग्धों के अनुरूप हास-परिहास में चतुर, मिलने-जुलने में कुशल, नृत्य गीत-वादित्र को अपने जीवन में स्थान देने वाले, इतिहास में अतुल रुचि रखने वाले, दयावान्, सत्य से निखरे हुए, साधुओं को इष्ट, सब तत्त्वों के प्रति सौहार्द और करुणा से द्रवित, रजोगुण से अस्पृष्ट, क्षमावन्त, कलाओं में विज्ञ, दक्ष एवं अन्य सब गुणों से युक्त थे। तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु, संसरति च संसारे, यात्सु युगेषु, अवतीर्णे कलौ, वहत्सु वत्सरेषु, व्रजत्सु वासरेषु, अतिक्रामति च काले प्रसवपर- म्पराभिरनवरतमापतति विकाशिनि वात्स्यायनकुले, क्रमेण कुबेरनामा वैनतेय इव गुरुपक्षपाती द्विजो जन्म लेभे। तस्याभवन्नच्युत ईशानो हरः पाशुपतश्चेति चत्वारो युगारम्भा इव ब्राह्मतेजोजन्यमानप्रजाविस्तारा नारायणबाहुदण्डा इव सञ्चक्रनन्दकास्तनयाः। तत्र पाशुपतस्यैक एवा- भवद्भूभार इवाचलकुलस्थितिः स्थिरश्चतुरुदधिगम्भीरोऽर्थपतिरिति नाम्ना समग्राग्रजन्मचक्रचूडामणिर्महात्मा सूनुः। सोऽजनयद्भृगुं हंसं शुचिं कविं महीदत्तं धर्मं जातवेदसं चित्रभानुं त्र्यक्षं महिदत्तं विश्वरूपं चेत्येका- दश रुद्रानिब सोमामृतरसशीकरच्छुरितमुखान्पवित्रान्पुत्रान्। अलभत च चित्रभानुस्तेषां मध्ये राजदेव्यभिधानायां ब्राह्मण्यां बाणमात्मजम्। स बाल एव बलवतो विधेर्वशादुपसंपन्नया व्ययुज्यत जनन्या। जातस्ने- हस्तु नितरां पितैवास्य मातृतामकरोत्। अवर्धत च तेनाधिकतरमाद्रीय- मानधृतिर्वाभिर् निजे। ५ ह० च०