हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ हर्षचरितम् काल इति पूर्वोक्ते। अन्यथैतत्पुनरुक्तं स्यात्। पक्षपातो अक्षिर्यस्यास्ति सः, पक्षैश्च यो याति सः। द्विजो विप्रः, विधुः, पक्षी च। युगारम्भा अपि चत्वारः। अङ्गा वेदादि, जटा च मङ्गा। सचक्रस्य साधुवृन्दस्य नन्दकास्तोषयितारः। चक्रं सुदर्शनं च। नन्दकः खङ्गश्च। बाहवोऽपि चत्वारः। अचलकुलस्थितिरभिन्नवर्षम- र्यादः। अचलानां गिरीणां कुलैर्वृन्दैः स्थितिर्यस्य। चतुरुदधिवत्सैश्च गम्भीरः। अग्र- जन्मानो द्विजाः। सोमस्तृणभेदः, इन्दुश्च। उपसंपन्ना मृता। निजे धाम्नि स्वे गृहे। इस प्रकार उस वंश में ब्राह्मण उत्पन्न होने गए, संसार-चक्र सरकता गया, युग बीते, कलिकाल आया, साल के साल गुजरे, दिन बीते, समय बहुत चला गया। वात्स्यायन कुल निरन्तर विकसित होता गया। इसी क्रम में गुरु में पक्षपात करने वाले कुबेर नामक ब्राह्मण गरुड़ के समान हुए। उनके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत, जो चार युगारम्भ के समान थे, जिनके ब्राह्म तेज से सन्तति चारों ओर फैल रही थी, जो साधु वृन्द को सन्तुष्ट करते थे। उनमें पाशुपत के एक ही अर्थपति नामक पुत्र हुए जो कुल-मर्यादा को अचल रखने वाले, स्थिर, समुद्र की भाँति गम्भीर, समस्त ब्राह्मणों के चूड़ामणि एवं महात्मा थे। अर्थपति ने रुद्रों के समान ग्यारह पुत्र उत्पन्न किए—भृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस् , चित्रभानु, त्र्यक्ष, महिदत्त और विश्वरूप। जो सोमरस के शीकर से सिक्त मुख वाले और पवित्र थे। उनमें से चित्रभानु ने राजदेवी नामक ब्राह्मणी में बाण नामक पुत्र को पाया। दैवयोग से बाण बाल्यकाल में ही माता के मर जाने से मातृहीन हो गया। पिता ने ही स्नेहपूर्वक बड़े यत्न से उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। वह अपने ही घर पर धीरतापूर्वक रहता हुआ बढ़ा। कृतोपनयनादिक्रियाकलापस्य समावृत्तस्य चास्य चतुर्दशवर्षदेशी- यस्य पितापि श्रुतिस्मृतिविहितं कृत्वा द्विजजनोचितं निखिलं पुण्यजातं कालेनादशमीस्थ एवास्तमगमत्। संस्थिते च पितरि महता शोकेनामी- लमनुप्राप्तो दिवानिशं दह्यमानहृदयः कथंकथमपि कतिपयान्दिवसाना- त्मगृह एवानैषीत्। गते च विरलतां शोके शनैः शनैरविनयनिदानतया स्वातन्त्र्यस्य, कुतूहलबहुलतया च बालभावस्य, धैर्यप्रतिपक्षतया च यौवनारम्भस्य, शैशवोचितान्यनेकानि चापलान्याचरन्नितरो बभूव। अभवंश्चास्य सवयसः समानाः सुहृदः सहायाश्च। तथा च। भ्रातरौ पारशवौ चन्द्रसेनमातृषेणौ, भाषाकविरीशानः परं मित्रम्, प्रणयिनौ रुद्रनारायणौ, विद्वांसौ वारबाणवासबाणौ, वर्णकविर्वेणीभारतः प्राकृतकृ- त्कुलपुत्रो वायुविकारः, बन्दिनावनङ्गबाणसूचीबाणौ, कात्यायनिका चक्र-