भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 506 में से

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पृष्ठ 117

७२ हर्षचरितम् नानि, सेकसुकुमारसोमके दारिकाहरितायमानप्रघनानि, कृष्णाजिनवि- कीर्णशुष्यत्पुरोडाशीय श्यामाकतण्डुलानि, बालिकाविकीर्यमाणनीवारब- लीनि, शुचिशिष्यशतानीयमानहरितकुशपूली पलाशसमिन्धि, इन्धनगो- मयपिण्डकूटसंकटानि, आमिक्षोयक्षीरक्षारिणीनामग्निहोत्रधेनूनां खुरवल- यैर्विलिखिताजिरवितर्दिकानि, कमण्डलव्यमृत्पिण्डमर्दनव्यग्रयतिजनानि, वैतानवेदीशङ्कव्यानामौदुम्बरीणां शाखानां राशिभिः पवित्रितपर्यन्तानि वैश्वदेवपिण्डपाण्डुरितप्रदेशानि, हविर्धूमधूसरिताङ्गणविटपिकिसलयानि, वत्सीयबालकलालितललत्तरलतर्णकानि, क्रीडत्कृष्णसारच्छागशावकप्र- प्रघनान्यङ्गणानि। 'उशन्ति प्रघनामभ्य्यामेकदेशे तु वेश्मनः'। पुरोडाशीयेत्यादि सहितेत्यर्थे ईयंः। बालिकाः कुमार्यः। नीवारा अकृष्टपच्या व्रीहयः। कूटो राशिः। आमिक्षीयमिति। तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवामिक्षा। 'आमिक्षा सा शृतोष्णं या क्षीरे स्याद्दधियोगतः' इति। तस्यै हितमामिक्षीयम्। आमिक्षाप्रकृतित्वमस्य च योग्यत्वात्। अग्निहोत्रेषु तस्या अनाम्नातत्वात्, यद्वा,-यदन्नस्य जुहुयादिति। नस्या अपि हबनं भवत्येव। वलयैः समूहैः वितर्दिका वेदिका। कमण्डलुर्मुनिकरदस्तस्मै हिताः कमण्डलव्याः। 'उगवादिभ्यो यत्'। यतीनां निष्किञ्चनत्वादादरस्वाच्च स्वयंक रणम्। वितानो यज्ञः, तत्र भवा वैतानी यज्ञाग्निकार्यभूः। शङ्कुः कीलकः, तस्मै हितः शङ्कव्यः। औदुम्बरीणामिति। तासां यज्ञियत्वात्। वत्सेभ्यो हिता वत्सीयाः वत्सपरिचर्याचतुराः। तर्णकाः सद्योजाता वत्साः। कृष्णसारेति छाग- सुख से रहने लगा। ब्राह्मणों के वे घर निरन्तर अध्ययन की ध्वनि से मुखरित हो रहे थे। त्रिपुण्ड भस्म से मस्तक को उज्ज्वल किए हुए सोमयज्ञों के लोभी वटु वहाँ इकट्ठा थे जो कपिल वर्ण वाली ज्वाला की जटाओं से शोभित अग्नि के समान प्रतीत होते थे। घरों के सामने सोम की क्यारियाँ सींचने से हरी हो रही थीं। बिछे हुए कृष्णाजिन पुरोडाश बनाने के लिए साँवा पसार कर सुखाया जा रहा था। कुमारी कन्याएँ बिना जोत के पके हुए नीवारों की बलि से पूजा कर रही थीं। सैकड़ों शिष्य पवित्र होकर कुशा की हरी आंटियों और पलाश की समिधाएँ इकट्ठी कर रहे थे। जलावन के लिए गोबर के कंडों का ढेर लगा था। आमिक्षा बनाने के योग्य दूध देने वाली गौएँ अपने खुरों से आँगन की बेदियाँ कोड़ रही थीं। यती लोग कमण्डलुओं को मिट्टी से मलने में व्यग्र थे। वैतान अग्नियों की वेदी में लगाए जाने वाले शंकुओं के लिए गूलर की शाखाएँ किनारे रखी थीं। स्थान-स्थान पर वैश्वदेवों के उजले पिण्डे रख दिए गए थे। आँगन के पेड़ के पत्ते यज्ञ- धूम से बिलकुल धूमिल हो रहे थे। देख-रेख करने वाले लड़के उचकते हुए सद्योजात

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