भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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७६ हर्षचरितम् मर्मरितगर्मुति, तप्तपांशुकुकूलकातरविकिरे, विवरशरणश्वाविधे, तटार्जुन- नकुररकूर्जाज्वरविवर्तमानोत्तानशफरशारपंकशेषपल्वलम्भसि, दावजनित- जगन्नीराजने, रजनीराजयक्ष्मणि, कठोरीभवति निदाघकाले, प्रतिदिश- माटीकमाना इवोषरेषु प्रपावाटकूटीपटलप्रकटलुण्ठकाः, प्रपञ्चकपिकच्छू- न्दूरा इव। लोहितत्वात्। ग्रामस्य ग्रामान्तरेण मर्यादा सीमा। स्यन्दः स्रुतिः। विलि- ख्यमाना विपाट्यमानाः। मर्मरिताः शुष्कत्वेन शब्दायमानाः। गर्मुतो लताः। कुकूलं तुषाग्निः। विकिराः कुक्कुटाद्याः। श्वाविधः शललाः सेहिकाख्या हिंस्त्राः प्राणिनः। तटशब्देन नैकट्यमाह। अर्जुनाः ककुभवृक्षाः। कुरराः क्रौञ्चपक्षिणः। कूजा शब्द एव संतापकारित्वाज्ज्वरस्तेन स्फुरन्तः शफरा मत्सयास्तैः। शारं सितोदरत्वात्। पल्वले नडूवले। कुररास्तटस्था यदा कूजन्ति तदा मत्स्याः पीडिताः सन्तः उत्प्लव- न्तीति वस्तुधर्मोऽयम्। नीराजनमिति। नीराजनं शान्तिकर्म। राजयक्ष्मा क्षयव्याधिः। शनैः शनैरपचयकारित्वात्। मातरिश्वानः कीदृशाः प्रावर्तन्तेत्या- ह—प्रतिदिशमित्यादि। आटीकमाना उच्चैर्भ्रमन्तः। साभिप्रायमेतत्। रजो- वशादेतेषां तथाविधसंनिवेशात। ग्रीष्मे ह्येवंविधा मारुताः प्रावर्तन्तेति कालधर्मः। उन्मत्तपक्षे—आटीकमाना इत्यादि सर्वं वक्ष्यमाणयोग्यतया योजनीयम्। उद्धतभ्र- मणाद्या ह्युन्मादस्यानुभावाः। तदुक्तम्—'अनिमित्तहसितरुदितोत्कृष्टाबद्वप्रलापश- यनोत्थितप्रधावितवृत्तगीतपठितस्मितपांसुववधूनननिर्माल्यचीरघटवक्त्रशरावाभर- णस्पर्शनोपभोगैरन्यैश्चाव्यवस्थितचेष्टानुकरणादिभिरनुभावैरभिनयेत्' इति। ऊषरं सिकताबहुलो रूक्षो देशः। प्रपा सत्रम्। वाटः कुनालम्। पटलं छदिः। कपिकच्छुः चलने लगीं। लताएँ कहीं कहीं बच रही थीं। धातकी के लाल-लाल गुच्छों को रुधिर के भ्रम से शेर के बच्चे चाटने लगे। घाम की गर्मी से उफने हुए हाथी अपनी सूँड़ से गाज उछालकर पर्वत के मध्यभाग को सींचने लगे, गर्मी से सूखती हुई गांजों की काली मदलेखाओं पर भौंरे प्यास के मारे चुप होकर बैठ गए। मन्दार के सिन्दूरिया फूलों से सीमाएँ लाल हो गईं। प्यासे भैंसे पानी के भ्रम से स्फटिक की शिलाओं पर सींग मारने लगे। लताएँ घाम से सूख कर खरखराने लगीं। भूसे की आग के समान तपती धूल से मुर्गे आदि व्याकुल हो उठे। सेही बिल में घुसने लगे। किनारे के अर्जुन वृक्षों पर बैठे हुए क्रौञ्च पक्षी कड़ी आवाज में बोलने लगे, जिससे डरकर सूखते हुए तालाबों की मछलियाँ तड़फड़ा उठती थीं। वनाग्नियाँ इस तरह लगने लगीं जैसे सारे जगत् की आरती उतर रही हो। वह निदाघकाल रात्रि का क्षय रोग बन गया और वह घटने लगी। चारों ओर अंधड़ के रूप में हवा चल पड़ी। बलुहट सीवानों में ऊँची उड़ान भरने लगी। पनसाले और राह की कुटियों की खपड़पोश छातें हवा में उड़ने लगीं।