भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः ७७ गुच्छक्रूच्छूटालोटनचापलैरेकाण्डकण्डूला इव कर्षन्तः शर्करीला कर्कस्थलीः स्थूलदृषच्चूर्णमुचः, मुचुकुन्दकन्दलदलनदन्तुराः, संततपनतापमुखर- चीरीगणमुखशीकरशीक्यमानतनवः, तरुणतरतरणितापतरले तरन्त इव तरङ्गिणि मृगतृष्णिकातरङ्गिणीनामलोकवारिणि, शुष्यच्छमीमर्मरमारब्ध- मार्गल्लङ्घनलाघवजवजङ्घालाः, रैणवावर्त्तमण्डलीरेचकरासरसरभसारब्ध- नर्तनाम्भारभटीनटाः, दावदग्धस्थलीमषीमिलनमलिनाः, शिक्षितक्षपण- कण्डूदायको द्रव्यभेदः। अत एवाह—कर्षन्त इति। शर्कराः पाषाणकणिका विद्यन्ते यासु ताः शर्करीलाः। पिच्छादित्वादिलच्। कर्करस्थली ऊषरभूः पाषा- णभूः। अत एवाह—स्थूलेत्यादिना। मुचुकुन्दं पुष्पभेदः। कन्दलं नवना- लम्। दन्तुरा इति। कपिकच्छूस्पर्शचालनेन च ये कण्डूलास्तादृशाश्चूर्णमुचः प्रकटदन्ताः परुषं कर्षन्ति। शीक्यमानाः सिच्यमानाः। तरुणतरः प्रौढः। तर- णिरादित्यः। तरन्त इवेति। वालुकावशात्तथा लक्ष्यमाणत्वात्। मृगतृष्णिका मरीचिका। तृषितमृगाणां रविरश्मिखचितासु सिकतासु नीलत्वदर्शनाज्जलबुद्धिः। वारिगीति। सतरङ्गे वारिणि ये सभीकास्ते सतापं देशं तरन्ति। उन्मत्तपवेऽपि विचित्तत्वेनैवंकारित्वम्। शम्योऽग्निगर्भा वह्निभेदाः। लाघवं नैपुण्यम्। सम्बायामान्त्र विषमं मार्गं लाघवेन तरन्ति। जङ्घाला वेगवन्तः। रैणवावर्त्ताः पांसुसंबन्धिन आव- र्तनरूपाः संनिवेशास्तेषां मण्डली समूहः। रेचयति पृथक्क्रोतीति रेचकम्। रैणवावर्त्तमण्डल्या रेचकं तथा रासे रसिते यो रसस्तेन यो रभसस्तद्देशेनारब्धं यन्न- र्तनमिव नर्तनं तदारम्भे विषय आरभटीनटा इव आरभटीनटाः। ईरयन्तीति भराः। भराश्च ते भटा अरभटाः। तेषामियमारभटी नटजातिविशेषो वीररसप्रधानः। उक्तं च—'प्लुष्टावपातप्लुतगर्जितानि च्छेद्यानि मायाकृतमिन्द्रजालम्। चित्राणि यूथानि च यत्र नित्यं तां तादृशीमारभटीं वदन्ति ॥' इति; नृत्तपदे—आवर्ती पके किवांच के गुच्छों के साथ छेड़छाड़ करने की गुस्ताखी के कारण उठी हुई खाज की छटपटाहट से भुइयाँलोट हवा कंकरीली धरती में मानों अपनी देह रगड़ रही थी। पत्थरों के मोटे मोटे कण बरसने लगे। मुचुकुन्द और कन्दल की कलियाँ छँट-छँट कर गिरने लगीं। सूर्य की गर्मी से व्याकुल होकर चिल पक्षी मुँह से गाज गिराने लगे। मृग- तृष्णिका रूपी नदियों के झूठे बहते हुए प्रवाह में मानों निदाघकाल की हवा सूर्य के अधिक ताप के कारण तैर रही थी। शमी के सूखे पत्ते मरुभूमि के मार्गों पर बिछे हुए थे जिन पर मर्मर करती हवा दौड़ लगा रही थी। धूल के बवंडर अगह बदलते हुए ऐसे लगते थे मानों आरभटी नृत्य में नट नाच रहे हों। दाव से जली हुई भूमियों में रगड़ मारने से हवा कुछ स्याह हो गई थी। जैन साधुओं के समान हवा वन-मयूरों के पंख