हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें८० हर्षचरितम् स्मीकरणाभिचारचरुपचनचतुराः, रुधिराहुतिभिरिव पारिभद्रद्रुमस्तबक- वृष्टिभिस्तर्पयन्तस्तारवान्वनविभावसून् , अशिशिरसिकताताराकितरंहसः, तप्तशैलविलीयमानशिलाजतु रसलबलिप्रदिशः, दावदहनपच्यमानचटका- ण्डखण्डखचिततरुकोटरकीटपटलपुटपाकगन्धकटवः, प्रावर्त्तन्तोन्मत्ता मातरिश्वानः । सर्वतश्च भूरिभस्त्रासहस्रसंधुक्षणक्षुभिता इव जरठाजगरगम्भीरगल- गुहावाहिवायवः, क्वचित्स्वच्छन्दतृणचारिणो हरिणाः, क्वचित्तरुतलवि- पतन्ति । झांकारभीषणा भ्रमन्ति च ॥ अभिचार उच्चाटनम् । अभिचारिणश्चोच्चा- टनमारणाद्यर्थं चरुपचनं कुर्वन्ति, रक्तेन चाग्मीन्प्रीणयन्ति । पारिभद्रा निम्बाः । मदना इत्यन्ये । उन्मत्ता अपि निर्विवेकतया रक्तादि यत्किंचिदशुचिप्रायमग्नौ निक्षिपन्ति, तत एव विश्वस्य दोषाय पर्यवस्यन्ति । तारकितमिव रंहो वेगो येषां ते । शिलाजतु अश्मसारः । दावदहनेन पच्यमानानि यानि चटकाण्डानि तेषां विदारणवशात्स्फुटिता ये खण्डाः कपालानि तैः । दोलावदुपरिपतितैः खचितानि कषायमानानि यानि तरुकोटरेषु कीटपटलानि कृमिसमूहास्तेषामतिपेशलत्वेन यत एव तस्तैः खण्डैःपर्याच्छादकतया स्थितैः पुटपाकः प्रसवधूमोऽभ्यन्तरपाकस्तद्गन्धेन कटव उत्तेजकाः । अत्राभिपाकेन खण्डत्वं खण्डेभ्यो रसनिःसरणात्खचितत्वं कीटा- नाम् । उन्मत्ता इति । ये चोन्मत्तास्ते सिकताभ्यासाः कर्दमविलिप्तदिशो गन्धकटवः शाटीकराधाः पूर्वोक्ताः क्रियाः प्रायेण कुर्वत इति । सर्वत्रात्र महावाक्ये ध्वनिश्चङ्गा- बान्धेष्या । मातरिश्वानो वायवः । सर्वतश्चेत्यादौ। दावाग्नयः प्रत्यदृश्यन्तेति संबन्धः । भस्त्रा इतिः । संधुक्षणमु- गुफाओं में गंभीर झंकार भर कर हवा ने भयानक भ्रम उत्पन्न कर दिया । संसार को भस्म करने के अभिचार (वेदविहित हिंसात्मक कर्म) में चरु पकाने में चतुर हवा ने नीम के गुच्छों को इस तरह बरसाया मानों रुधिर की आहुति दे रही हो, हवा ने इस प्रकार वृक्षों में लगी हुई आग को तृप्त किया । हवा के वेग में आतप के तेज से बालू तारे की तरह चमकने लगे । गर्म चट्टानों से शिलाजीत का रस बह बह कर फैलने लगा । बन में लगी हुई आग की गर्मी से चिड़ियों के अंडे फूट कर पेड़ों के कोटरो में बिछ गए थे जिनमें झुलसे हुए कीड़ों से मिलकर पकने से पुटपाक की उग्र गन्ध उठ रही थी । चारों ओर भीषण बनाग्नियाँ दिखाई पड़ने लगीं । मानों वे अग्नियों हजारों भैकनियों के चलाने से क्षुमित होकर बढ़ती ही जा रही थीं । पुराने अजगर-साँप के गले की मोटी गुहा से निकलने वाली वायु उन्हें उत्तेजित कर रही थी । कहीं हिरणों की भाँति अति