भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः ८५ त्वयि तु बिना कारणेनादृष्टेऽपि प्रत्यासन्ने बन्ध्वाविव बद्धपक्षपातं किमपि स्निह्यति मे हृदयं दूरस्थेऽपीन्दोरिव कुमुदाकरे । यतो भवन्तमन्तरेणा- न्यथा चान्यथा चायं चक्रवर्ती दुर्जनैर्ग्राहित आसीत् । न च तत्तथा । न सन्त्येव ते येषां सतामपि सतां न विद्यन्ते मित्रोदासीनशत्रवः । शिशुचापलापराचीनचेतोवृत्तितया च भवतः केनचिदसहिष्णुना यत्किं- चिदसद्दशमुदीरितम् । इतरो लोकस्तथैव तद्गृह्णाति वक्ति च । सलिलानीव गतानुगतिकानि लोलानि खलु भवन्त्यविवेकिनां मनांसि । बहुमुखश्र- वणनिश्चलीकृतनिश्चयश्च किं करोतु पृथिवीपतिः । तत्त्वान्वेषिभिश्चास्मा- भिर्दूरस्थितोऽपि प्रत्यक्षीकृतोऽसि । विज्ञप्तश्चक्रवर्ती त्वदर्थम्-यथा प्रायेण प्रथमे वयसि सर्वस्यैव चापलैः शैशवमपराधीति । तथेति च स्वामिना प्रतिपन्नम् । अतो भवता राजकुलमकृतकालक्षेपमागन्तव्यम् । अवकेशी- अन्यथा चान्यथा चेति। एतेन किंचिदेव संभवतीति दर्शयति। अत एवाह—न च तत्त- थेति । तथास्थे तु बाणस्य दुर्वृत्तता प्रसज्येत । कृष्णस्यापि तादृशः पक्षपातः स्वामि- प्रतारणादि च दोषायैव भवेत् । अत एव वक्ष्यति—तत्त्वान्वेषिभिरित्यादि । ग्राहित इत्येतावति वक्तव्य आसीदित्यनेन दुर्जनाः संप्रति निरवकाशा इति प्रतिपादितम् । अत एव वक्ष्यति—तथेति च प्रतिपन्नं स्वामिनेति । सतां साधूनामपि । सतां भव- ताम् । उदासीनो मध्यस्थः । अपराचीनापराङ्मुखी चेतोवृत्तिर्यस्याः । अवकेशी परोक्ष में उपकार करना, शील में समान होना ये सब स्नेह के हेतु हैं, पर तुममें तो अकारण ही मेरा हृदय भाई के समान स्नेह का पक्षपाती हो गया है। तुम दूर हो फिर भी चन्द्रमा जैसे कुमुद में स्नेह करता है उसी प्रकार मेरा हृदय भी अकारण स्नेह से भर गया है। तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के कान भर दिए हैं, पर यह सत्य नहीं है। सज्जनों में भी कोई ऐसा नहीं है जिसके मित्र, उदासीन और शत्रु न हों। किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं से चिढ़ कर कुछ उल्टा-पुल्टा कह दिया है। अन्य लोग भी वैसा ही समझते हैं और कहते रहते हैं। मन्दबुद्धियों का चित्त अस्थिर और दूसरों के कहे पर चलता है। बहुतों के मुँह से सुन कर सम्राट् ने अपना मत स्थिर कर लिया। तत्त्व को पहचानने वाले हम लोग दूर रहने वाले भी तुमको अच्छी तरह जान गए हैं। तुम्हारे लिए सम्राट् तक सिफारिश पहुँचाई गई है कि इस तरह की चपलता प्रायः सबकी आयु के प्रथम भाग में हो जाती है। सम्राट् ने इस बात को स्वीकार किया। इसलिए समय-यापन न करके आप राजकुल