भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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८६ हर्षचरितम् चादृष्टपरमेश्वरो बन्धुमध्यमधिवसन्नपि न मे बहुमतः । न च सेवावैषम्य- विषादिना परमेश्वरोपसर्पणभीरुणा वा भवता भवितव्यम् । यतो यद्यपि- स्वेच्छोपजातविषयोऽपि न याति वक्तुं देहीति मार्गणशतैश्च ददाति दुःखम् । मोहात्समाक्षिपति जीवनमप्यकाण्डे कष्टं मनोभव इवेश्वरदुर्विदग्धः ॥ तथाप्यन्ये ते भूपतयः, अन्य एवायम् । न्यक्कृतनृगनलनलनिषधनहुषा- म्बरीषदशरथदिलीपनाभागभरतभगीरथययातिरमृतमयः स्वामी । नास्या- हंकारकालकूटविषदिग्धदुग्धा दृष्टयः, न गर्वगरगुरुगलग्रहगद्गदा गिरः, नातिस्मयोष्मापस्मारविस्मृतस्थैर्याणि स्थानकानि, नोद्दामदर्पदाहज्वर- निष्फलतरुः । स चादृष्टरविस्तरमध्यगो न कस्यचित्प्रियः । स्वेच्छोपजाता विषया मण्डलानि यस्मात्तादृगपि देहि प्रयच्छेति वक्तुं न पार्यते । इतरत्र-स्वेच्छया स्वसं- कल्पेनोपजात उत्पन्नो विषयो गोचरो यस्य । तथा चोच्यते-'काम जानामि ते मूलं संकल्पात्किल जायसे' इति । अथ च स्वेच्छया उपजाता विषया यस्यायं देही च शरीरवानिति वक्तुं न याति । न शक्यत इति विरोधः । कामश्चानङ्गत्वाद्देही शरीरवानिति वक्तुं न युज्यत इत्यन्व्यार्थः । मार्गणा याचकाः, शराश्च मार्गणाः । जीव्यतेऽनेनेति जीवनम्, प्राणादि जीवितं च, ईश्वरो राजा हरश्च । दुर्विदग्धो दुष्टः, दुष्टत्वाद्विशेषेण दग्धश्च । अमृतेत्यादि साभिप्रायम् । यस्मादहंकारादि कालकूटादिना रूपयति, अतश्चा- हंकारादीनामत्यन्ताभावप्रकाशनेच्छयामृतमयत्वमस्य दर्शयति । अमृतमयस्य में पधारिए । सम्राट् से बिना मिले आपका बन्धुओं के बीच निवास करना निष्फल वृक्ष की तरह मुझे अच्छा नहीं लगता । आपको सेवा में झंझट समझ कर उदासीन न होना चाहिए और सम्राट् के पास आने में न डरना चाहिए । यद्यपि (शिव द्वारा भस्म किए गए कामदेव के समान अविवेकी राजा क्लेश का कारण होता है, क्योंकि वह अपनी इच्छा से उपभोग की सामग्री प्राप्त कर लेता है मगर किसी को अर्पित नहीं करता । अगर याचक ने 'देहि' की बार बार आवाज लगाई तो उसे डांट देता है । दोषदोष के बिना जाने ही अपने अनुजीवियों के प्राण हर लेता है । इसी प्रकार कामदेव भी कामी को पीड़ित करता है) तथापि ऐसे राजे कोई दूसरे ही होते हैं, हर्ष तो उनसे भिन्न हैं । इनके सामने नृग, नल, नहुष, निषध, अम्बरीष, दशरथ, दिलीप, नाभाग, भरत, भगीरथ, ययाति आदि क्या हैं ! हर्ष तो साक्षात् देवता हैं, न तो इनकी दृष्टि अहंकार के काल-कूट विष से जली हुई क्रूर है, न इनकी वाणी दर्परोग से गला जकड़ जाने के कारण भर्राई हुई है,