भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

वेगविक्षुब्धा विकाराः, नाभिमानमहासन्निपातनिर्मिताङ्गभङ्गानि गतानि, न मदार्दितवक्रोकृतौष्ठनिष्ठ्यूतनिष्ठुराक्षराणि जल्पितानि । तथा च—अस्य विमलेषु साधुषु रत्नबुद्धिः, न शिलाशकलेषु । मुक्ताधवलेषु गुणेषु प्रसा- धनधीः, नाभरणभारेषु । दानवत्सु कर्मसु साधनश्रद्धा, न करिकीटेषु । सर्वमग्रेसरे यशसि महाप्रोतिः, न जीवितजरत्तृणे । गृहीतकरास्वाशासु प्रसाधनाभियोगः, न निजकलत्रधर्मपुत्रिकासु । गुणवति धनुषि सहाय- बुद्धिः, न पिण्डोपजीविनि सेवकजने । अपि च,—अस्य मित्रोपकरण- मात्मा, भृत्योपकरणं प्रभुत्वम . पण्डितोपकरणं वैदग्ध्यम् , बान्धवोप- च कालकूटादिभिर्न योगः । गरं विषम् । स्मयो गर्वः । स्थानकानि स्थितयः । अर्दितं वातव्याधिभेदः । तस्मिन्सति मुखं वक्रं भवति । तथा चोक्तम्—'वायुः प्रवृद्धस्तैस्तैश्च वातलरूर्ध्वमाश्रितः । वक्रीकरोति वक्त्रामुक्त्तं सितमीक्षितम् ॥' हङ्कति । निष्ठ्यूतानि निर्गतानि । विमलेष्वपापेषु; अन्यत्र, -सुच्छायाेषु । पद्म- रागादिष्विति वक्तव्ये शिलेत्यादिपदमादरार्थम् । एवमुत्तरत्रापि वाच्यम् । मुक्तावत्तामिश्च धवलास्तेषु गुणेष्वौदार्यादिषु, सूत्रेषु च । प्रसाधनं प्रकृष्टं साध- नम्, अर्जनम्, भूषणं च । दानं धनत्यागः, मदश्च । साधनं संपादनम्, सैन्यं च । साध्यतेऽनेनेति कृत्वा । करो दण्ड., पाणिञ्च । आशा दिशः, चेतः, वाञ्छा च । प्रसाधनं संपादनम्, दण्डश्च । गुणो ज्या, शौर्याद्याश्च गुणाः । उपक्रियन्तेऽनेने- त्युपकरणमुपयोगः । आत्मेति । न हि मित्राणि मित्रव्यतिरेकेण बान्धवादिव न इनकी स्थिति ऐसी है कि घमंड रूप अपस्मार रोग हो जाने से धैर्य बिलकुल समाप्त हो गया है, इनके चित्त के विकार ऐसे नहीं जिसमें उत्कट दर्प के ज्वर की व्यग्रता है, न इनकी चाल ऐसी है कि अभिमान रूप महासन्निपात हो जाने से लड़खड़ाने लगी हो, इनकी बातों में ऐसे निष्ठुर अक्षर जो ओंठ दबोच कर निकाले जाते हैं, नहीं होते । इसी प्रकार—हर्ष निर्मल चित्त वाले सज्जनों को ही रत्न समझता है, पत्थर के टुकड़ों को रत्न नहीं । मोती के समान उज्ज्वल गुणों को वह प्रसाधन समझता है, पत्थर के टुकड़ों को नहीं । श्रद्धा से ऐसे कर्म करता है जिसमें दान हो, बल्कि दानजल बहाने वाले हाथियों का संग्रह नहीं करता । सबसे बढ़े हुए यश की उसमें उत्कंठा है, सूखे तृण के समान प्राणों की नहीं । सब दिशाओं का प्रसाधन करता है जिनका उसने करग्रहण किया है, अपनी कलत्रों की चर्मपुतलियों का बनाव- सिंगार नहीं करता । वह गुण (डोरी) वाले धनुष को अपना सहायक मानता है, पेट पर पलने वाले सेवकों पर आश्रित नहीं रहता । वह अपने आपको मित्रों का उपकारक मानता है, अपने प्रभुत्व को अनुचरों का उपकारक मानता है,