हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ८६ कमलिनीकण्टकक्षतपादपल्लवे पतङ्गे, पुरः परापतति प्रेङ्खदन्धकारलेशल- म्बालके शशिविरहशोकश्याम इव श्यामामुखे, कृतसंध्योपासनः शयनी- यमगात् । अचिन्तयच्चैकाकी—‘किं करोमि । अन्यथा संभावितोऽस्मि राज्ञा । निनिमित्तबन्धुना च संदिष्टमेवं कृष्णेन । कष्टा च सेवा । विषमं भृत्यत्वम् । अतिगम्भीरं महद्राजकुलम् । न च मे तत्र पूर्वजपुरुषप्रवर्तिता प्रीतिः, न कुलक्रमागत गतिः, नोपकारस्मरणानुरोधः, न बालसेवास्नेहः, न गोत्रगौरवम् , न पूर्वदर्शनदाक्षिण्यम् , न प्रज्ञासंविभागोपप्रलोभनम् , न विद्यातिशयकुतूहलम् , नाकारसौन्दर्यादरः, न सेवाकाकुकौशलम् , न विद्वद्गोष्ठीबन्धवैदग्ध्यम् , न वित्तव्ययवशीकरणम् , न राजवल्लभपरिचयः। स्वरूपकथनं क्षतपादपल्लवत्वादुत्प्रेक्षणम् । खजतीवेति । यश्च खञ्जति स शिखर- प्राये विषमे पथि। ये पुनरस्ताचले शिखरस्खलनकारणं खञ्जनमित्युत्प्रेक्षयन्ते तान्प्रति कमलिनीत्यादि निरर्थकम् । खञ्जतीव स्खलतीव । पुरः पूर्वस्यां दिशि । श्यामा रात्रिः, योषिच्च । मुखमारम्भः, वदनं च । निर्निमित्तेत्याद्यभिप्रायेण वक्ष्यति । मानों मुकुलित होते हुए लाल कमलों ने उसे पी लिया हो। वह नवजात कौवे के समान ललछहूँ वर्ण का हो गया था। सूर्य ने अपने घोड़ों के वेग को कम कर दिया और जपा- पुष्प के गुच्छे के समान पाटल होकर अस्ताचल के शिखर पर गिर पड़ा मानों कमलिनी के काँटे उसके पैरों में चुभ गये जिससे वह लड़खड़ाने लगा मानों चन्द्रमा के विरह- जन्य शोक से रात्रि का मुख (आरम्भ) नीला हो गया हो, अन्धकार के लम्बे लम्बे बाल उस पर लहराने लगे। तब बाण ने सन्ध्योपासना की और शय्या पर लेट गये। फिर एकान्त में सोचने लगे—‘मैं क्या करूँ? सम्राट् ने अवश्य ही मुझे कुछ दूसरा समझ लिया है। मेरे अकारणबन्धु कृष्ण ने इस तरह का सन्देश भेजा। राजाओं की सेवा कष्टकरी है, और हाजिरी बजाना और भी टेढ़ा है। राजदरबार में बड़े खतरे हैं। मेरे पुरखों की कभी न तो इसमें रुचि रही है, न मेरा दरबार से पुश्तैनी सम्बन्ध रहा है। न तो राजकुल के द्वारा किए गए उपकार का स्मरण आता है, न बचपन में राजकुल से ऐसी मदद मिली है जिसका स्नेह माना जाय; न अपने कुल का ही ऐसा कोई गौरव रहा है; न पहली मेल-मुलाकात की अनुकूलता है; न यह प्रलोभन है कि बुद्धिसम्बन्धी विषयों में आदान-प्रदान किया जाय; न यह चाह है कि जान-पहचान बढ़ाऊँ; न सुन्दर आकार से मिलने वाले आदर की चाह है; न सेवकों जैसी चापलूसी करने की आदत है; न मुझमें वैसी विलक्षण चतुराई है कि विद्वानों की गोष्ठियों में भाग लूँ; न पैसा खर्च करके दूसरों को वश में करने की आदत है; न राजा के प्रेमी जनों के साथ जान-पहचान