हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ६१ दिब भगवत्या महाश्वेतया मालत्याख्यया कृतसकलगमनमङ्गलः, दत्ता- शीर्वांदो बान्धववृद्धाभिः, अभिनन्दितः परिजनजरतीभिः, वन्दितचर- णैरभ्यनुज्ञातो गुरुभिः, अभिवादितैराघ्रातः शिरसि कुलवृद्धैः, वर्धित- गमनोत्साहः शकुनैः, मौहूतिकमतेन कृतनक्षत्रदोहदः, शोभने मुहूर्ते हरितगोमयोपलिप्ताजिरस्थण्डिलस्थापितमसितेतरकुसुममालापरिक्षिप्तक- ण्ठं दत्तपिष्टपञ्चाङ्गुलपाण्डुरं मुखनिहितनवचूतपल्लवं पूर्णकलशमीक्ष- माणः, प्रणम्य कुलदेवताभ्यः कुसुमफलपाणिभिरप्रतिरथं जपद्भिनिर्जद्वि- जैरनुगम्यमानः, प्रथमचलितदक्षिणचरणः, प्रीतिकूटाद्विनिर्गात् । प्रथमेऽहनि तु घर्मकालकष्टं निरुदकं निष्पत्रपादपविषमं पथिकजन- नमस्क्रियमाणप्रवेशपादपोत्कीर्णकात्यायनीप्रतियातनं शुष्कमपि पल्लवित- मिव तृषितश्वापदकुललम्बितलोलजिह्वालतासहस्रैः पुलकितमिवाच्छभ- त्यन्ये । दत्तंत्यादिभागो बान्धववृद्धाभिप्रायेण समुचित एव । अभिनन्दित इति । प्रतिपदं द्वयमुह्यम् । जरत्यो वृद्धाः । आघ्रातः शिरसि चुम्बितः । मौहूर्तिका गणकाः । नक्षत्रदोहदं प्रतिनक्षत्रप्राशनम्, नक्षत्रविषयोऽभिलाषो वा । अजिर- मङ्गणम् । स्थण्डिलं भूः । परिक्षिप्तो वेष्टितः । पिष्टपञ्चाङ्गुलमाजकोक्ताभिः पञ्च- भिरङ्गुलीभिमङ्कल्याय दीयते । अप्रतिरथं प्रास्थानिकं मन्त्रम् । निजैस्त्यादिना स्वस्य दातृत्वमुक्तम् । उत्कोर्णां निखाता । कात्यायनी दुर्गा । प्रतियातना प्रतिमा । काननत्वात्पह- की छोटी बहन मालती ने जो माता के समान स्नेह॒ भरे हृदयवाली, मानो भगवती महाश्वेता हों, बाण के प्रस्थान-समय के लिये उचित मङ्गलाचार किया। सगी वृद्धाओं ने आशीर्वाद दिया और परिवार की वृद्धाओं ने अभिनन्दन किया । पूजितचरण गुरुओं ने जाने की अनुमति दी और अभिवादित कुलवृद्धों ने मस्तक सूँघा। शकुनों से जाने का उत्साह बढ़ा। फिर ज्योतिषी के अनुसार नक्षत्र-देवताओं को प्रसन्न किया । इस प्रकार शुभ मुहूर्त में हरित गोबर से लिपे हुए आँगन के चौतरे पर स्थापित पूर्ण कलश के दर्शन करके कुलदेवताओं को प्रणाम करके, हाथ में फल-फूल लिए हुए और अप्रतिरथ सूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए अपने पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा अनुगत होकर बाण दाहिना पैर पहले उठाकर प्रीतिकूट से निकले । पहले दिन चण्डिका वन पार किया और मल्लकूट नामक गाँव में पड़ाव किया। चण्डिका वन के मार्ग में घाम हो जाने के कारण बाण को चलने में कष्ट हुआ, क्योंकि